Friday, January 25, 2019

हमें डायबिटीज  हो गयी है

तुम्हारे वादे गुलाबजामुन की तरह है
जिनमे न गुलाब की खुशबू है
न जामुन का स्वाद
सिंथेटिक मावे के बने गुलाबजामुन
हमें अब रास नहीं आयेगे
गुल हो गयी है भावनायें जिस मन की , ,
उसे  गुलाबजामुन कहाँ भायेगे
तुम्हारे आश्वासनों के सड़े हुए ,
मैदे के खमीर से बनी
वादों की कढ़ाई में तली हुई
और टूटे हुए सपनो की चासनी में डूबी हुई
ये टेढ़ी मेढ़ी जलेबियाँ
इतने सालों से खिलाते आ रहे हो
अब नहीं खा पायेगे
क्योंकि हमारे लिये मीठा खाना वर्जित है 
और मीठी मीठी बाते सुन सुन कर ,
हमें डायबिटीज हो गयी है 
हमें खस्ता कचोडी खिलाने का वादा मत करो
हमारी हालत यूं ही खस्ता हो गयी  है
तुम्हारे भाषण,प्याज के छिलकों की तरह
हर बार परत दर परत खुलते है
पर स्वाद कम ,आंसू ज्यादा लातें है
अब हमें मत बरगलाओ 
तुम्हारा तो पेट भर चुका है
हो सके तो हमें
दो गिलास शुद्ध पानी मुहैया कराओ
क्योंकि पेट तो अब पानी से ही भरना पड़ेगा
अच्छे दिनों की आशा में हमें,
रोज यूं ही ,हंस हंस कर जीना और मरना पड़ेगा 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Monday, January 21, 2019

क्यों ?


मुझे याद है वह दिन ,

जब तुमने ,

मेरी नाजुक सी पतली  ऊँगली में,

सगाई की अंगूठी पहनाई थी ,

और मेरे कोमल से हाथों को ,

धीरे से दबाया था

प्यार से दुलराया था

और फिर एक दिन ,

मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर ,

पवित्र अग्नि की साक्षी में ,

अपना जीवनसाथी बनाया था

सुख दुःख में साथ निभाने का वादा था किया

पर शादी के बाद ,घर बसाते ही,

मेरी उन नाजुक उँगलियों को,

आटा गूंथने में लगा दिया

रोटी बेलने के लिए ,बेलन थमा दिया

गरम गरम तवे पर ,

रोटियां सेकते सेकते ,

कितनी ही बार ,इन नाजुक उँगलियों ने ,

तवे की विभीषिका झेली है

तुम्हारे प्यार के परशाद से ,

मेरी कमसिन सी काया ,

देखलो कितनी फैली है

जिस तरह आजकल ,

मेरी मोटी हुई अँगुलियों में ,

सगाई की अंगूठी नहीं आती

उस तरह तुम्हारे प्यार में भी,

वो पुरानी ताजगी नहीं पायी जाती

हमारा प्यार ,

एक दैनिक प्रक्रिया बन कर ,रह गया है

कुछ भी नहीं नया है

क्या हमारा गठबंधन ,

कुछ इतना ढीला था ,

दो दिन में खुल गया

क्या हमारा प्यार ,

शादी  की मेंहदी सा था ,

चार दिन रचा ,फिर धुल  गया

तुम भी वही हो ,मै  भी वही हूँ ,

बताओ ना फिर क्या बदल गया है

हमे साथ साथ रहते हो गए है बरसों

फिर ऐसा हो रहा है क्यों ?


मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, January 17, 2019

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Sunday, January 6, 2019

धूप 

कुछ गरम गरम सी धूप 
कुछ नरम नरम सी धूप 
कुछ बिखरी बिखरी धूप 
कुछ निखरी निखरी धूप 

कुछ तन सहलाती धूप 
कुछ मन बहलाती धूप 
कुछ छत पर छाती धूप 
कुछ आती जाती धूप 

कुछ जलती जलती धूप 
कुछ ढलती ढलती  धूप 
कुछ चलती चलती  धूप 
कुछ यूं ही मचलती धूप 

कुछ चुभती चुभती धूप 
कुछ बुझती बुझती धूप 
कुछ उगती उगती धूप 
कुछ मन को रुचती धूप 

कुछ सर पर चढ़ती धूप 
कुछ पाँवों पड़ती   धूप 
कुछ आँखों गढ़ती धूप 
कुछ रूकती ,बढ़ती धूप 

कुछ रूपहरी सी धूप 
कुछ सुनहरी सी धूप 
कुछ दोपहरी सी धूप 
तो कुछ ठहरी सी धूप 

कुछ सुबह जागती धूप 
कुछ द्वार लांघती  धूप 
खिड़की से झांकती धूप 
संध्या को भागती  धूप 

कुछ शरमाती सी धूप 
कुछ मदमाती सी धूप 
कुछ गरमाती सी धूप 
कुछ बदन तपाती धूप 

कुछ भोली भोली धूप 
कुछ रस में घोली धूप 
सब की हमजोली धूप
करे आंखमिचोली धूप 

कुछ केश सुखाती धूप 
मुँगफलिया खाती धूप 
कुछ मटर छिलाती धूप 
कुछ गप्प लड़ाती  धूप 

कुछ थकी थकी सी धूप 
कुछ पकी पकी सी धूप 
कुछ छनी छनी सी धूप 
कुछ लगे कुनकुनी धूप 

कुछ खिली खिली सी धूप  
मुश्किल से मिली सी धूप 
कुछ चमकीली  सी धूप 
सत रंगीली  धूप सी धूप 


मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Saturday, January 5, 2019

फोकटिये 

हम तो फोकटिये है यार,हमको माल मुफ्त का भाता 

धूप सूर्य की ,मुफ्त कुनकुनी ,खाते है सर्दी में 
और बरगद की शीतल छैयां ,पाते है गर्मी में 
बारिश में रिमझिम का शावर है हमको नहलाता 
हम तो फोकटिये है यार ,हमको माल मुफ्त का भाता 

जब वृक्षों पर कुदरत देती ,मीठे फल रस वाले 
पत्थर फेंक तोड़ते उनको ,खाते खूब मज़ा ले 
 माल मुफ्त का देख हमारे मुंह में पानी आता 
हम तो फोकटिये है यार ,हमको माल मुफ्त का भाता 

हम उस मंदिर में जाते ,परशाद जहाँ पर मिलता 
मुफ्त सेम्पल चखने वाला ,स्वाद जहाँ पर मिलता 
भंडारे और लंगर छखना ,हमको बहुत सुहाता 
हम तो फोकटिये है यार हमको माल मुफ्त का भाता 

श्राद्धपक्ष में पंडित बन कर ,मिले दक्षिणा ,खाना 
शादी में बाराती बन कर, मुफ्त में मौज उड़ाना 
उस रैली में जाते ,फ्री में जहाँ खाना मिल जाता    
हम तो फोकटिये है यार ,हमको माल मुफ्त का भाता 

घोटू 
धूप 

कुछ गरम गरम सी धूप 
कुछ नरम नरम सी धूप 
कुछ बिखरी बिखरी धूप 
कुछ निखरी निखरी धूप 

कुछ तन सहलाती धूप 
कुछ मन बहलाती धूप 
कुछ छत पर छाती धूप 
कुछ आती जाती धूप 

कुछ जलती जलती धूप 
कुछ ढलती ढलती  धूप 
कुछ चलती चलती  धूप 
कुछ यूं ही मचलती धूप 

कुछ चुभती चुभती धूप 
कुछ बुझती बुझती धूप 
कुछ उगती उगती धूप 
कुछ मन को रुचती धूप 

कुछ सर पर चढ़ती धूप 
कुछ पाँवों पड़ती   धूप 
कुछ आँखों गढ़ती धूप 
कुछ रूकती ,बढ़ती धूप 

कुछ रूपहरी सी धूप 
कुछ सुनहरी सी धूप 
कुछ दोपहरी सी धूप 
तो कुछ ठहरी सी धूप 

कुछ सुबह जागती धूप 
कुछ द्वार लांघती  धूप 
खिड़की से झांकती धूप 
संध्या को भागती  धूप 

कुछ शरमाती सी धूप 
कुछ मदमाती सी धूप 
कुछ गरमाती सी धूप 
कुछ बदन तपाती धूप 

कुछ भोली भोली धूप 
कुछ रस में घोली धूप 
सब की हमजोली धूप
करे आंखमिचोली धूप 

कुछ थकी थकी सी धूप 
कुछ पकी पकी सी धूप 
कुछ छनी छनी सी धूप 
कुछ लगे कुनकुनी धूप 

कुछ खिली खिली सी धूप  
मुश्किल से मिली सी धूप 
कुछ  रंगरंगीली  धूप 
है कई रूप की धूप 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '  
 

Tuesday, January 1, 2019

बालिग़ उमर -प्यार रस डूबो 

बालिग़ हो गयी सदी बीसवीं ,लगा उसे उन्नीस बरस है 
निखरा रूप,जवानी छायी, हुई अदा ज्यादा दिलकश है  
बात बात पर किन्तु रूठना ,गुस्सा होना और झगड़ना ,
बच्चों सी हरकत ना बदली ,रहा बचपना जस का तस है 
तन के तो बदलाव आ गया ,किन्तु छिछोरापन कायम है ,
नहीं 'मेच्यूअर 'हो पाया मन ,बदल नहीं पाया, बेबस है 
बाली उमर गयी अब आयी ,उमर प्यार छलकाने वाली ,
कभी डूब कर इसमें देखो ,कितना मधुर प्यार का रस है 

घोटू