Saturday, June 22, 2019

अनोखा प्यार

प्यार लैला ने मजनू से  किया
शीरी ने फरहाद से किया
सोहनी ने महिवाल से किया
इन सबका प्यार था लाजबाब
फिर भी ये मिलने में रहे नाकामयाब
एक दुसरे से सदा के लिए दूर हो गए
पर उनके प्यार के किस्से मशहूर हो गए
प्यार राधा ने कृष्ण से किया ,
पर पूरी नहीं हो पायी उसकी चाह
कृष्णजी ने उसे छोड़ ,
आठ आठ पटरानियों से किया विवाह
और सभी के साथ ,
कुशलता से किया था निर्वाह
एक पति द्वारा कई पत्नियों को रख पाना
राजा रजवाड़ों का प्रचलन है पुराना
मुस्लिम धर्म में भी वाजिब है तीन निकाह
पर हिन्दू कानूनन कर सकते है एक ही विवाह
क्योंकि हमने जन्म से पाए है ऐसे संस्कार
चाहते न चाहते हुए भी ,
एक पत्नी के साथ जिंदगी देते है गुजार
पर एक पत्नी के कई पति होना ,
ऐसा किंचित ही होता पाया था
वो तो महाभारत काल में ,
एक मात्र द्रौपदी थी ,
जिसने पांच पांच पतियों का साथ ,
बखूबी निभाया था
पर हमारे जीवन में आज भी एक अद्भुत मिसाल है
एक नाजुक सी मुलायम पत्नी ,
जिसे अपने बत्तीस पतियों से प्यार है
सभी पति सख्त है ,बाँध कर रखते है ,
उसे अपने घेरे में  
बेचारी मुश्किल से ही निकल पाती है ,
कभी नहीं रह पाती अकेले में
पर फिर भी उनका प्यार है  बेमिसाल
ये सब रखते है एक दुसरे का कितना ख्याल
आप यकीन कीजिये मेरी बातों का
ये किस्सा है आपकी जिव्हा और बत्तीस दाँतों का


ये बत्तीस पति बेचारे ,
मेहनत कर ,खाना चबाने के बाद
अपनी नाजुक पत्नी जिव्हा को ,
देते है खाने का पूरा स्वाद
अपनी प्यारी पत्नी को खिलाते है ,
खुद नहीं चखते है
देखो अपनी पत्नी का कितना ख्याल रखते है
नाजुक से प्यारी पत्नी के प्रति
बहुत प्रीत है उनके मन में
पत्नी चंचल और बातूनी है ,
रखते है उसे अपने नियंत्रण में
ख्याल रखते है उसका पल पल
सख्त है ,औरों को चुभते भी है ,
पर बीच में रहती हुई पत्नी को ,
कभी भी नहीं करते घायल
पत्नी भी अपने पतियों पर ,
लुटाती है ढेर सारा प्यार
सभी का रखती है पूरा पूरा ख्याल
कहीं से भी कोई कतरा दाँतों में यदि फंसता है
तो वह जिव्हा के मन को बहुत खटकता है
बार बार जा जा कर ,धकेलती है उसे बाहर
कैसे भी निकल जाय ,करती है कोशिश जी भर
ये उसका ,अपने पतियों के प्रति ,
सच्चे प्रेम का परिचायक  है
पति और पत्नी ,दोनों ही कितने लायक है
हम पति पत्नियों को भी ,
इनसे कुछ सबक लेना चाहिए
एक दुसरे की तरफ पूरा ध्यान देना चाहिए

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
तुझको छूकर

तुझको छूकर सारे दर्द भुला देता मैं
तुझको छूकर ,मौसम सर्द भुला देता मैं
तुझको छूकर ,मन मेरा हो जाता चंचल
तुझको छूकर ,तन में कुछ हो जाती हलचल
तुझको छू कर ,मुझे सूझती है शैतानी
तुझ छूकर ,करने लगता ,मैं मनमानी
मादक तेरी नज़रें जब मुझसे मिलजाती
हो जाता है मेरा मन ज्यादा  उन्मादी
और छुवन जब ,मिलन अगन बन लगती जलने
साँसों के स्वर ,जोर जोर से लगते चलने
पहुंच शिखर पर ,जब ढल जाती ,सब चंचलता
छा जाती है तन में मन में एक शिथिलता
थम जाता सारा गुबार ,उफनाते तन का
ऐसे ही तो होता है बस  अंत छुवन का

घोटू    
         राजनीती का चलन

मैं  रख्खुँ  ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो
तारीफ़ करे जो अपनी ,कुछ चमचे पाल रखो
हम राजनीती चमकायें ,रह कर के अलग दलों में
टोपी सफ़ेद मैं पहनू ,तुम टोपी लाल  रखो

हम एक दुसरे दल के ,हो खुले आम आलोचक
पर आपस में मिल जाएँ ,यदि सिद्ध हो रहा मतलब
पाँचों ऊँगली हो घी में ,जब ऐसा मौका  आये ,
तुम आधा माल मुझे दो खुद आधा माल रखो        
मैं रख्खुँ ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो

हम तुम दोनों के दल में ,कोई भी हो पावर में
लोगों का काम करा कर ,बरसायें लक्ष्मी घर में
कोई भी घोटाले में ,ना आये नाम किसी का ,
ये लूटपाट का धंधा ,कुछ सोच सम्भाल रखो
मैं रख्खुँ ख्याल तुम्हारा ,तुम मेरा ख्याल रखो

है कमी कौन इस दल की उस दल की भी कमजोरी
थोड़ी तुमको मालुम है ,मालुम है मुझको थोड़ी
हम इसका लाभ उठायें ,ऊँचे पद पर चढ़ जाये ,
जब जरूरत हो मैं सीधी ,तुम उलटी चाल  रखो
मैं  रख्खुँ ख्याल तुहारा ,तुम मेरा ख्याल रखो

मदन मोहन बाहेती ;घोटू ' 
एक ऐसा भी हो रविवार

एक ऐसा भी हो रविवार
दिन भर हो मस्ती ,प्यार प्यार
रत्ती भर भी ना काम करें
बस हम केवल आराम करें
इतनी सी इस  दिल की हसरत
पूरा दिन फुरसत ही फुरसत
जब तक इच्छा ,तब तक सोयें
सपनो की दुनिया  में  खोयें
हों चाय ,पकोड़े ,बिस्तर पर
घर  बैठें मज़ा करें  दिन भर
ना जरुरत जल्द नहाने की
ना फ़िक्र हो दफ्तर जाने की
रख एक रेडियो ,सिरहाने
बस सुने पुराने हम गाने
या बैठ धूप में हम छत पर
हम खाये मूंगफली तबियत भर
या बाथरूम में चिल्ला कर
गाना हम गायें ,जी भर कर
मस्ती में गुजरे दिन सारा
मिल जाय प्यार जो तुम्हारा
सोने में सुहागा  मिल जाए
हमको मुंह माँगा मिल जाए
तुम मुझमे ,मैं तुम में खोकर  
बस  एक दूसरे के होकर
हम उड़े एक नयी दुनिया में
एक दूजे की बाहें थामे
जो इच्छा हो, खाये  पियें
एक दिन खुद के खातिर जियें
कम से कम महीने में एक बार
एक ऐसा भी हो रविवार
भूलें सब चिंता और रार
दिन भर बरसे बस प्यार प्यार

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '





 



Friday, June 21, 2019

ये प्यार बुढ़ापे वाला भी

ये प्यार बुढ़ापे वाला भी
करता हमको मतवाला भी
कहते देती दोगुना मज़ा ,
हो अगर पुरानी हाला भी

इतने दिन यौवन की संगत
लाती है बुढ़ापे में रंगत
आ जाता  रिश्तों में मिठास,
दिन दिन दूनी बढ़ती चाहत
 
कर रोज रोज  भागादौड़ी
कौड़ी  कौड़ी माया  जोड़ी
बच्चे घर बसा दूर जाते ,
सब उम्मीदें जाती तोड़ी

वो भरा हुआ घर ,चहल पहल
होता है खाली एक एक कर
सब सूना होता ,बचते है ,
घर में पति पत्नी ही केवल

जो साथ निभाते जीवन भर
रहते है आपस में निर्भर
अपने मन का सब बचा प्यार ,
देते उंढेल ,एक दूजे पर

थे बहुत व्यस्त ,जब था यौवन
संग रहने मिलते थे कुछ क्षण
अब पूरा समय समर्पित है,
हम रहते एक दूजे के बन

संग बैठो ,मिल कर बात करो
बीते किस्सों को याद करो
अपने ढंग से जीवन जियो ,
मस्ती ,खुशियां ,आल्हाद करो

ये साथ समर्पण वाला भी
सब अर्पण करने वाला भी
हम तुम मिल कर गप्पे मारे ,
हो हाथ चाय का प्याला भी

घोटू 

Monday, June 17, 2019

दीवाली के उपहार

दीवाली पर दिये जाने वाले उपहार
के होते है चार प्रकार
एक त्वरित खानेवाले
दूसरे  अलमारी में जानेवाले
तीसरे काम में  आनेवाले
और चौथे निपटानेवाले
त्वरित खानेवाली श्रेणी में
आते है फल और मिठाई
जो दो तीन दिन में जाना चाहिए खाई
वर्ना आसपास पड़ोसियों को देकर
जा सकती है निपटाई
सिर्फ सोहनपपड़ी का डब्बा इसका अपवाद है
जो काम में आ सकता काफी समय बाद है
दूसरी श्रेणी में चाँदी के सिक्के या बर्तन
या लक्ष्मी गणेश की मूर्तियां आती है
जो सीधी अलमारी में जाती है
और कोई ख़ास मौकों पर
जरुरत पड़ने पर काम में आती है
पुष्पगुच्छ ,मोमबत्तियां ,दीपक ,
रंगोली बंदरवार आदि तीसरी श्रेणी में आती है
जो दिवाली पर ही साजसजावट के काम में आती है
इस श्रेणी में कुछ रसोई के उपकरण ,बर्तन
और क्रॉकरी आदि भी आते है
जिन्हे लोग इसलिए बचाते है कि ये बाद में
कभी भी काम में आ जाते है  
चौथी श्रेणी याने निपटानेवाली श्रेणी के उपहार
होते है बेशुमार
बेचारे कई वर्षों से इसी श्रेणी में पाए जाते है
और तीन चार घर घूम कर आपके यहाँ आते है
आपकी कोशिश होती है कि इनमे से ,
जितने भी निकल सके,निकालो
और जल्दी से छुटकारा पा  लो
जब न चाहते हुए भी किसी को उपहार देना पड़े
ये काम आते है बड़े
पर ऐसे अटपटे उपहार देकर ,
आप इनसे छुटकारा तो पा लेते है
पर अक्सर ये आपको ,
उपहास का पात्र बना देते है
जैसे एक बच्चे के जन्मदिन पर ,
एक टोकरी में मोमबत्ती और कुछ सूखा मेवा ,
अगर है उपहार दिया जाता
तो ये कहीं से भी उपहार का ओचित्य नहीं बताता
तो ऐसे निपटाने वाले उपहारदाता बंधू जन ,
आपसे है मेरा एक नम्र निवेदन
ऐसे उपहार देने की औपचारिता मत पालो
अटपटे उपहार के बदले ,
एक गुलाब के फूल से ही काम चलालो
क्योकि आपके ऐसे निपटाने वाले उपहार
नहीं दर्शाते है आपका प्यार
बल्कि एक बला टालना कहलाता है
उपहार पानेवाले को किँचित ही प्रसन्नता दे पाता है
लोग आपके उपहार और मनोवृत्ति का मजाक उड़ाते है
उपहार देकर आप उपहास के पात्र बन जाते है
इसलिए आप समझदार बन
बंद करो ये निपटाने वाले उपहार का चलन

घोटू 
आत्मअवलोकन
 
मेरे मन में पूरे जीवन भर ये ही संताप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा

मेरे दो दो ,काबिल बेटे ,होनहार और पढ़ेलिखे
मैंने लाख करी कोशिश पर दोनों घर पर नहीं टिके
शादी करके फुर्र हो गये ,नीड़ बसा अपना अपना
मैं तन्हा रह गया अकेला ,टूट गया मेरा सपना
भूले भटके याद न करते ,ऐसा मुझको भुला दिया
तोड़ दिया उनने मेरा दिल अंतर्मन से रुला दिया
मैं फिर भी वो सुखी रहें यह ,करता प्रभु से जाप रहा
या तो  बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा

मेरी एक नन्ही गुड़िया सी प्यारी प्यारी है बेटी
मन उलझाया एक विदेशी को अपना दिल ,दे बैठी
बड़ा चाव था धूमधाम से उसका ब्याह रचाऊँगा
मुझको छोड़ विदेश जा बसी ,कैसे मन समझाऊंगा
संस्कार जो मैंने डाले ,सारे यूं ही फिजूल गये
उड़ना सीख ,उड़ गए सारे ,बच्चे मुझको भूल गए
उनका यह व्यवहार बेगाना ,सहता मैं चुपचाप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा

कई बार रह रह कर है एक हूक उठा करती मन में
कुछ ना कुछ तो कमी रह गयी ,मेरे लालन पोषण में
वर्ना आज बुढ़ापे में है ये एकाकीपन ना रहता
मेरे सारे अरमानो का ,किला इस तरह ना ढहता
फिर भी लेखा मान विधि का ,खुश हूँ मैं जैसा भी हूँ
सदा रहा उनका शुभचिंतक ,चाहे मैं कैसा भी हूँ
हरेक हाल में ,ख़ुशी ढूंढता ,मैं तो अपनेआप रहा
या तो बच्चे नालायक या मैं नालायक बाप रहा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '