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Alex Peters
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Wednesday, October 21, 2020
Friday, October 16, 2020
देशप्रेम
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
तपना है मुझे ,जलना है मुझे
जननी और जन्मभूमि पर ,
खुद को अर्पण करना है मुझे
मैं जो पर्वत माथे पर ,हिम के किरीट का चमक रहा
पर मेरे देश का हर वासी ,है बूँद बूँद को तरसः रहा
अब समय आ गया ,गर्व त्याग ,
पानी बन कर गलना है मुझे
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
राजनीती के दल दल से , बाहर आ,सबसे मिलजुल कर
दुश्मन का दमन हमें करना ,लोहा लेना ,उससे खुल कर
भारत की आनबान खातिर ,
दुश्मन दल को दलना है मुझे
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
तपना है मुझे ,जलना है मुझे
जननी और जन्मभूमि पर ,
खुद को अर्पण करना है मुझे
मैं जो पर्वत माथे पर ,हिम के किरीट का चमक रहा
पर मेरे देश का हर वासी ,है बूँद बूँद को तरसः रहा
अब समय आ गया ,गर्व त्याग ,
पानी बन कर गलना है मुझे
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
राजनीती के दल दल से , बाहर आ,सबसे मिलजुल कर
दुश्मन का दमन हमें करना ,लोहा लेना ,उससे खुल कर
भारत की आनबान खातिर ,
दुश्मन दल को दलना है मुझे
उठना है मुझे ,चलना है मुझे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
आओ हम तुम लड़े
बहुत प्यार कर लिया उमर भर
थोड़ा छुप कर ,थोड़ा खुल कर
वृद्ध हुए अब ,दिनचर्या में ,कुछ परिवर्तन करें
आओ हम तुम लड़े
सिर्फ प्यार ही प्यार ,एकरसता ले आता है जीवन में
कहते है कि नए स्वाद का ,अनुभव होता परवर्तन में
मन में दबी शिकायत सारी ,उगल हृदय हल्का होता है
और झगड़ने बाद ,प्यार का ,मज़ा यार दूना होता है
इसीलिये हम ढूंढ बहाना
कभी कभी बस,ना रोजाना
गलती कोई करे ,दोष पर ,एक दूजे पर मढ़ें
आओ हम तुम लड़ें
घर में हम तुम बूढ़े ,बुढ़िया ,मुश्किल होता समय काटना
वक़्त कटेगा ,चालू कर दें ,एक दूजे को अगर डाटना
झगड़ा कर ,मुंह फेरे सोयें ,अच्छी निद्रा हमें आयेगी
सुबह उठें ,फिर नयी दोस्ती ,बात रात की भूल जायेगी
मात्र दिखावे की हो अनबन
जीयें हम ,सच्चे हमदम बन
यूं हँसते और खेलते ,जीवन पथ पर बढ़ें
आओ हम तुम लड़े
मदन मोहन बाहेती ;घोटू '
बहुत प्यार कर लिया उमर भर
थोड़ा छुप कर ,थोड़ा खुल कर
वृद्ध हुए अब ,दिनचर्या में ,कुछ परिवर्तन करें
आओ हम तुम लड़े
सिर्फ प्यार ही प्यार ,एकरसता ले आता है जीवन में
कहते है कि नए स्वाद का ,अनुभव होता परवर्तन में
मन में दबी शिकायत सारी ,उगल हृदय हल्का होता है
और झगड़ने बाद ,प्यार का ,मज़ा यार दूना होता है
इसीलिये हम ढूंढ बहाना
कभी कभी बस,ना रोजाना
गलती कोई करे ,दोष पर ,एक दूजे पर मढ़ें
आओ हम तुम लड़ें
घर में हम तुम बूढ़े ,बुढ़िया ,मुश्किल होता समय काटना
वक़्त कटेगा ,चालू कर दें ,एक दूजे को अगर डाटना
झगड़ा कर ,मुंह फेरे सोयें ,अच्छी निद्रा हमें आयेगी
सुबह उठें ,फिर नयी दोस्ती ,बात रात की भूल जायेगी
मात्र दिखावे की हो अनबन
जीयें हम ,सच्चे हमदम बन
यूं हँसते और खेलते ,जीवन पथ पर बढ़ें
आओ हम तुम लड़े
मदन मोहन बाहेती ;घोटू '
दादी की यादें
मुझे याद है बचपन में ,
जब शैतानियां करने पर ,
झेलनी पड़ती थी पिताजी की मार
तब एक दादी ही होती थी जो ,
मुझे आकर के बचाती थी ,
और लुटाती थी मुझ पर ढेर सा प्यार
मैं सिसकियाँ भरता हुआ ,रोता था
और दादी की गोद में सर रख कर सोता था
वह मुझ पर ढेर सारा प्यार लुटाती थी
अपनी बूढी उँगलियों से ,मेरा सर सहलाती थी
और पता नहीं ,मुझे कब नींद आ जाती थी
आज भी कई बार
जब मैं होता हूँ बेकरार ,
परेशानियां मुझे तंग करती है
तो मेरी दादी की अदृश्य उँगलियाँ ,
मुझे थपथपाते हुए ,
मेरा सर सहलाया करती है
मैं उनके बूढ़े हाथों का प्रेम भरा स्पर्श ,
और उनकी उँगलियों को अपना सर
सहलाता हुआ पाता हूँ
और उनकी मधुर यादों में खो जाता हूँ
मदन मोहन बाहेती ;घोटू ;
मुझे याद है बचपन में ,
जब शैतानियां करने पर ,
झेलनी पड़ती थी पिताजी की मार
तब एक दादी ही होती थी जो ,
मुझे आकर के बचाती थी ,
और लुटाती थी मुझ पर ढेर सा प्यार
मैं सिसकियाँ भरता हुआ ,रोता था
और दादी की गोद में सर रख कर सोता था
वह मुझ पर ढेर सारा प्यार लुटाती थी
अपनी बूढी उँगलियों से ,मेरा सर सहलाती थी
और पता नहीं ,मुझे कब नींद आ जाती थी
आज भी कई बार
जब मैं होता हूँ बेकरार ,
परेशानियां मुझे तंग करती है
तो मेरी दादी की अदृश्य उँगलियाँ ,
मुझे थपथपाते हुए ,
मेरा सर सहलाया करती है
मैं उनके बूढ़े हाथों का प्रेम भरा स्पर्श ,
और उनकी उँगलियों को अपना सर
सहलाता हुआ पाता हूँ
और उनकी मधुर यादों में खो जाता हूँ
मदन मोहन बाहेती ;घोटू ;
वही ढाक के तीन पात
मैंने अपने रहन सहन में काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
कल की बात याद ना रहती ,नाम भूल जाता लोगों के ,
बातें बचपन वाली , सारी ,लेकिन अब भी मुझे याद है
भरे हुए अनुभव की गठरी ,अब मेरा मष्तिष्क हो गया ,
इसको खोल ,किसे मैं बांटू ,लेने वाला कोई नहीं है
प्रेशर कुकर और ओवन के, युग में मिटटी की हंडिया में ,
पकी दाल के स्वाद और गुण ,चाहने वाला कोई नहीं है
सब अपने अपने चक्कर में ,इतना ज्यादा व्यस्त हो गए ,
भले काम की हो कितने ही ,कोई सुनता नहीं बात है
मैंने अपने रहन सहन में ,काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
तेज बहुत था तेजपान सा ,पर पुलाव की हांडी में पक ,
अपनी खुशबू सभी लुटा दी ,और रह गया फीका पत्ता
खाते वक़्त कोई ना खाता ,फेंक दिया जाता बेचारा ,
हाल बुढापे में सबका ही ,ऐसा हो जाता अलबत्ता
घटा नज़र का तेज ,घट गया ,खानपान और पाचन शक्ति ,
उमर बढ़ रही ,जीवन घटता ,देखो कैसी करामात है
मैंने अपने रहन सहन में ,काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मैंने अपने रहन सहन में काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
कल की बात याद ना रहती ,नाम भूल जाता लोगों के ,
बातें बचपन वाली , सारी ,लेकिन अब भी मुझे याद है
भरे हुए अनुभव की गठरी ,अब मेरा मष्तिष्क हो गया ,
इसको खोल ,किसे मैं बांटू ,लेने वाला कोई नहीं है
प्रेशर कुकर और ओवन के, युग में मिटटी की हंडिया में ,
पकी दाल के स्वाद और गुण ,चाहने वाला कोई नहीं है
सब अपने अपने चक्कर में ,इतना ज्यादा व्यस्त हो गए ,
भले काम की हो कितने ही ,कोई सुनता नहीं बात है
मैंने अपने रहन सहन में ,काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
तेज बहुत था तेजपान सा ,पर पुलाव की हांडी में पक ,
अपनी खुशबू सभी लुटा दी ,और रह गया फीका पत्ता
खाते वक़्त कोई ना खाता ,फेंक दिया जाता बेचारा ,
हाल बुढापे में सबका ही ,ऐसा हो जाता अलबत्ता
घटा नज़र का तेज ,घट गया ,खानपान और पाचन शक्ति ,
उमर बढ़ रही ,जीवन घटता ,देखो कैसी करामात है
मैंने अपने रहन सहन में ,काफी कुछ बदलाव कर दिया ,
लेकिन फिर भी मेरा जीवन ,वही ढाक के तीन पात है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
Wednesday, October 14, 2020
【SEAnews:India Front Line Report】October 12, 2020 (Mon) No. 3946
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Sunday, October 11, 2020
निमंत्रण और नियंत्रण की फाइटिंग -डाइटिंग
जब दो प्रेमी होते है दूर दूर
मिल न पाने को मजबूर
तब उन्हें काटता है विछोह का कीड़ा
और होने लगती है विरह की पीड़ा
पर इससे भी ज्यादा कठिन
होता है विरह का वो सीन
जब आपकी प्रेमिका हो आपके सामने
आप लगते है दिल थामने
क्योंकि आप उसे देखने को तो स्वच्छंद है
पर छूने या मिलने पर प्रतिबंध है
जी हाँ ,आजकल मैं भी ऐसे ही दौर से गुजर रहा हूँ
क्योंकि वजन घटाने के लिए डाइटिंग कर रहा हूँ
रस भरी कढ़ाई में करते हुए किलोल
गुलाबी ,सुन्दर और गोल गोल
गुलाबजामुन देख कर लार तो टपकाता हूँ
पर उन्हें छू नहीं पाता हूँ
स्वर्णिम आभा लिये रसीली
दुबली पतली और छरहरी
अलबेली स्वाद की देवी
मेरी परमप्रिया जलेबी
गरम गरम तन की ऊष्मा लिए
पूरे सोलह श्रृंगार किये
जब देती है प्यार का आमंत्रण
तो मुझे रखना पड़ता है खुद पर नियंत्रण
क्योंकि वो मेरी सच्ची चाह है
पर आजकल उसे छूना गुनाह है
अब आप ही बताओ ,मुझ पर क्या गुजरती होगी
जब प्यास तो जगती होगी पर भूख मरती होगी
मुझे ललचाते तो है गरम गरम समोसे
पर मैं ठंडी आह भरता हूँ ,मन मसोसे
तरह तरह के पकवानो की खुशबू और रंग
करते रहते है मुझे बहुत तंग
एक तरफ मेरा स्वनियंत्रित कायाकल्प
करके सुडोल होने का संकल्प
और दूसरी तरफ चटोरी जिव्हा का स्वाद
करने लगते है आपस में विवाद
जो बार बार ,एक दूसरे पर हावी नजर आता है
और मुझे तरसा तरसा कर तड़फाता है
बिचारा नीचे वाला होठ ,ऊपर वाले होठ को चूम कर
संतोष करता है झूम कर
क्योंकि आजकल तो चुंबन के लाले पड़े है
और हम भारी दिल से ,हल्का होने के लिए ,
डाइटिंग की जिद पर अड़े है
कारण श्रीमती जी को लगता है ,हमारा वजन भारी है
और बस ये ही डाइटन्ग की वजह सारी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जब दो प्रेमी होते है दूर दूर
मिल न पाने को मजबूर
तब उन्हें काटता है विछोह का कीड़ा
और होने लगती है विरह की पीड़ा
पर इससे भी ज्यादा कठिन
होता है विरह का वो सीन
जब आपकी प्रेमिका हो आपके सामने
आप लगते है दिल थामने
क्योंकि आप उसे देखने को तो स्वच्छंद है
पर छूने या मिलने पर प्रतिबंध है
जी हाँ ,आजकल मैं भी ऐसे ही दौर से गुजर रहा हूँ
क्योंकि वजन घटाने के लिए डाइटिंग कर रहा हूँ
रस भरी कढ़ाई में करते हुए किलोल
गुलाबी ,सुन्दर और गोल गोल
गुलाबजामुन देख कर लार तो टपकाता हूँ
पर उन्हें छू नहीं पाता हूँ
स्वर्णिम आभा लिये रसीली
दुबली पतली और छरहरी
अलबेली स्वाद की देवी
मेरी परमप्रिया जलेबी
गरम गरम तन की ऊष्मा लिए
पूरे सोलह श्रृंगार किये
जब देती है प्यार का आमंत्रण
तो मुझे रखना पड़ता है खुद पर नियंत्रण
क्योंकि वो मेरी सच्ची चाह है
पर आजकल उसे छूना गुनाह है
अब आप ही बताओ ,मुझ पर क्या गुजरती होगी
जब प्यास तो जगती होगी पर भूख मरती होगी
मुझे ललचाते तो है गरम गरम समोसे
पर मैं ठंडी आह भरता हूँ ,मन मसोसे
तरह तरह के पकवानो की खुशबू और रंग
करते रहते है मुझे बहुत तंग
एक तरफ मेरा स्वनियंत्रित कायाकल्प
करके सुडोल होने का संकल्प
और दूसरी तरफ चटोरी जिव्हा का स्वाद
करने लगते है आपस में विवाद
जो बार बार ,एक दूसरे पर हावी नजर आता है
और मुझे तरसा तरसा कर तड़फाता है
बिचारा नीचे वाला होठ ,ऊपर वाले होठ को चूम कर
संतोष करता है झूम कर
क्योंकि आजकल तो चुंबन के लाले पड़े है
और हम भारी दिल से ,हल्का होने के लिए ,
डाइटिंग की जिद पर अड़े है
कारण श्रीमती जी को लगता है ,हमारा वजन भारी है
और बस ये ही डाइटन्ग की वजह सारी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
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