Friday, November 13, 2020

प्रकृति का चक्र -बुढ़ापा

यह प्रकृति का चक्र बुढ़ापा ,इसको कोई रोक ना पाया
लाख कोशिशें की ना आये ,पर जब आना था ,ये आया

प्राणायाम किया कसरत की ,सुबह शाम ,मैं भागा ,दौड़ा
खान पान  पर किया नियंत्रण मीठा और तला सब छोड़ा
रोज रोज जिम में जाकर के ,बहा पसीना ,ये कोशिश  की ,
मेरे तन पर ,चढ़ ना पाए ,चर्बी और मोटापा  थोड़ा
मैंने सभी प्रयास कर लिए
भूखे रह उपवास कर लिए
तरह तरह के योगआसन कर ,अपने तन को बहुत सताया
लाख कोशिशें की ,ना आये, पर जब आना था ये आया

कामनियों की संगत छोड़ी ,भले कामनाएं ना छूटी
मैं अब भी जवान हूँ,मन को ,देता रहा तसल्ली झूंठी
लेकिन तन में धीरे धीरे ,पैठ बनाता रहा बुढ़ापा ,
किया भले ही च्यवनप्राश का सेवन ,खाई जड़ी और बूटी
मैंने स्वर्ण भस्म भी खाई
खिली न पर काया मुरझाई
किये सभी उपचार लगन से ,लोगों ने जो भी बतलाया
लाख कोशिशें की ना आये ,पर जब आना था ,ये आया

अब जल्दी आती थकान है ,बात बात होती झुंझलाहट
कंचन काया पिघल रही है ,तनी त्वचा में है कुम्हलाहट
तन का जोश हुआ सब गायब ,और व्याधियां आसपास सब ,
याददाश्त कमजोर हो रही ,वृद्धावस्था की ये आहट
मन में रहती सदा विकलता
अब बच्चों पर रौब न चलता
इतनी जल्दी भूल गए सब ,मेरा इतना करा कराया
लाख कोशिशें की ना आये ,पर जब आना था ये आया

बेहतर होगा खुल्ले दिल से ,करें बुढ़ापे का हम स्वागत
बहुत कर लिया सब के खातिर ,अब अपने से करें मोहब्बत
काम धाम की तज चिंताएं ,मस्ती काटें ,मौज मनाएं
सैर सपाटा करके देखें ,दुनिया में है कितनी रंगत
अपनी मनचाही सब करले
जीवन को खुशियों से भर लें
अपने पर भी खर्च करें हम ,जीवन में इतना जो कमाया
लाख कोशिशें की ना आये ,पर जब आना था ये आया

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

 

Tuesday, November 10, 2020

घर की रोटी

आप भले माने ना माने ,पर ये सच्ची ,खरी बात है
कितना इधरउधर मुंह मारो ,घर की रोटी लगे स्वाद है

यूं तो इस सारी दुनिया में ,पकवानो की कमी नहीं है
कई दावतें हमने खाई ,लेकिन उतनी जमी नहीं है
बाकी सब तो ललचाते है ,पर जो रोज रोज मुंह लगती
घर की रोटी ही सच पूछो ,तो है पेट हमारा  भरती
खालो तुम पकवान सैंकड़ो ,पर मिलता आल्हाद नहीं है
दुनिया में घर की रोटी से  ,बढ़ कर कोई स्वाद नहीं है
नरम नरम हाथों से बीबी ,देती गरम गरम जब फुलके
बिना कोई संकोच ,सलीके ,हम खाया करते है खुल के
घर के भोजन में मिलता है ,स्वाद प्यार का ,अपनेपन का
तन मन को तृप्ति देता है ,क्या कहना घर के भोजन का
सुख मिलता जब मियां बीबी ,मिल कर खाते साथ साथ है
कितना इधर उधर मुंह मारो ,घर की रोटी लगे स्वाद है

इसी तरह गोरी या काली ,दुबली पतली हो या हथिनी
इस दुनिया में प्यारी लगती सबको अपनी अपनी पत्नी
क्योंकि एक वो ही जो तुमको ,प्यार करे है सच्चे दिल से
इतना अधिक चाहने वाला ,नहीं मिल सकेगा मुश्किल से
जो निर्जल रह कर व्रत करती ,करवा चौथ ,तुम्हारे खातिर
ताकि सुहागन बनी रहे वो ,लम्बी उम्र तुम्हे हो हासिल
तुम्हारे सुख दुःख में शामिल ,साथ निभाती जो जीवन भर
जो तुम्हारी पूजा करती ,तुम्हे मान कर  पति परमेश्वर
ऐसा सच्चा जीवन साथी ,पा सबको होता गरूर है
मिले ना मिले जन्नत में पर, इस जीवन में वही हूर है
सुन्दर लोग कई दिखते है ,पर पत्नी की अलग बात है
प्यारी लगती घरवाली ज्यों ,घर की रोटी लगे स्वाद है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 
आयुष की प्रेम गाथा

सीधा सादा हमारा ,यह आयुष कुमार
बैंगलोर में  जा हुए  ,इसके नयना चार
इसके नयना चार ,किसी ने ऐसा लूटा
मन में पहली बार ,प्रेम का लड्डू फूटा
दिल को भायी दीपिका काजू कतली जैसी
इन्दौरी पोहे संग  आयी  गरम जलेबी

आयुष के मन में खिले ,फूलझड़ी के फूल
प्रेम पटाखा बज गया ,मौसम के अनुकूल
मौसम के अनुकूल ,आयी ऐसी दीवाली
दिल मे दीप  प्रेम का जला गयी दिलवाली
प्रेम रश्मि से किया दीपिका ने दिल रोशन
'घोटू 'जगमग आज हो रहा मन का आंगन

मंजू मन उल्लास है ,बनी बहू की सास
बेटा घोड़ी चढ़ेगा ,आया मौका ख़ास
आया मौका ख़ास ,बहुत जगदीश प्रफुल्लित
बेटे का घर बसा ,बहुत मन है आनंदित
रितू ने भाभी पायी ,रिया ने पायी मामी
हर्षित चाचा ,ताऊ ,और खुश नाना नानी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

Friday, November 6, 2020

नेताजी और कुर्सी

मैं  बोला  यह  नेताजी से
कब तक चिपकोगे कुर्सी से
देखो अपनी बढ़ी उमर को
किसी और को भी अवसर दो

बात सुनी ,बोले नेताजी
इससे चिपक ,रहूँ मैं राजी
मुझे सुहाती इसकी संगत
चेहरे पर रहती है  रंगत

इसके कारण ,सांझ सवेरे
चमचे मुझको रहते घेरे
ये छूटी ,सब मुंह फेरेंगे
मुझको बिलकुल भाव न देंगे

परम भक्त हूँ ,मैं कुर्सी का
इसी भावना से हूँ चिपका
इससे मुझको बहुत मोहब्बत
मुझे चिपकने की है आदत

बचपन चिपक रहा मैं  माँ से
और जवानी ,मेहबूबा से
अब कुर्सी से रहता चिपका
ये ही माँ ,ये ही मेहबूबा

चिपक रहूंगा ,इससे तब तक
हो जाता तैयार न जब तक
मेरा बेटा ,वारिस बन कर
जो बैठेगा ,इस कुर्सी पर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, November 4, 2020

प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना

प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना
हलवा पूरी गटक सकूं और चबा सकूं मैं चना चबैना
प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना

मेरे तन की शुगर ना बढे ,रहे मिठास जुबाँ की कायम
तन का लोहा ठीक रहे और मन में लोहा लेने का दम
चलूँ हमेशा ही मैं तन कर ,मेरी कमर नहीं झुक पाये
यारों के संग,हंसी ठिठौली ,मिलना जुलना ना रुक पाये
जियूं मस्त मौला बन कर मैं ,काटूँ अपने दिन और रैना
प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना

भले आँख पर चश्मा हो पर टी वी और अखबार पढ़ सकूं
जवाँ हुस्न ,खिलती कलियों का,छुप छुप कर दीदार कर सकूं
चाट पकोड़ी ,पानी पूरी ,खा पाऊं ,लेकर चटखारे
बिमारियां और कमजोरी ,फटक न पाये पास हमारे
सावन सूखा ,हरा न भादौ ,रहे हमेशा मन में चैना
प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना

मेरी  जीवन की शैली पर ,नहीं कोई प्रतिबंध लगाये
जीवनसाथी साथ रहे और संग संग हम दोनों मुस्काये
नहीं आत्म सन्मान से कभी ,करना पड़े कोई समझौता
बाकी तो फिर ,लिखा भाग्य में ,जो होना है ,वो ही होता
करनी ऐसी करूँ ,गर्व से ,मिला सकूं मैं सबसे नैना
प्रभु ,बुढ़ापा ऐसा देना

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
करारापन लिए तन है
भरा मिठास से मन है
सुनहरी इसकी रंगत है
बड़ी माशूक तबियत है
नज़र पड़ते ही ललचाती
हमारे मन को  उलझाती
बहुत ही प्रिय ये सबकी है
गरम हो तो गजब की है
बड़ा इसमें है आकर्षण
लुभा लेती है सबका मन
हसीना ये बड़ी दिलकश
टपकता तन से यौवन रस
बड़ी कातिल ,फरेबी है
मेरी दिलवर ,जलेबी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Tuesday, November 3, 2020

थोंपा गया नेता

पिताश्री के नाना की ,आखिरी विरासत
बार बार जनता नकारती ,मैं हूँ आहत
जो भी मेरे मन में आता ,मैं बक देता
थोंपा गया पार्टी पर जो, मैं वह  नेता

 कुछ चमचे है ,भीड़ सभा में जुड़वा  देते
कुछ चमचे है ,जो ताली है ,बजवा देते
कुछ चमचे ,क्या कहना है ,ये सिखला देते
कुछ चमचे ,टी वी पर खबरे ,दिखला देते
कुछ चमचे ,मस्जिद और दरगाहें ले जाते
कुछ चमचे मंदिर में है जनेऊ पहनाते
मैं पागल सा ,जो वो कहते ,सब करता हूँ
भरी धूप  और गरमी में ,पैदल चलता हूँ
मुझको कैसे भी रहना 'लाइम लाईट 'में
किन्तु हारता ही आया हूँ ,मैं  'फाइट'  में
आज इससे गठजोड़ और कल और किसी से
आज जिसे दी गाली ,कल है प्यार उसीसे
राजनीती में ,ये सब तो रहता है चलता
जब तक मन में है सत्ता का सपना पलता
कहता कोई अनाड़ी ,कोई पप्पू  कहता
लोगो का क्या ,जो मन चाहे ,कहता रहता  
किया नहीं है ब्याह ,अभी तक रहा छड़ा हूँ
कुर्सी खातिर ,घोड़ी पर भी नहीं चढ़ा हूँ
रोज रोज मैं कार्टून ,बनवाता अपना
मुझको पूरा करना है ,मम्मी का सपना
जब तक ना प्रधान बन जाऊं ,देश का नेता
तब तक कोशिश करता रहूँ ,चैन ना लेता
राजवंश में जन्म लिया  ये  ,मेरा हक़  है
क़ाबलियत पर मेरी लोगो को क्यों शक है
लोग मजाक उड़ाते,पर ना मन पर लेता
थोंपा गया पार्टी पर  जो , मैं वह नेता  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '