Tuesday, April 13, 2021

मैं अस्सी का
 
अब मैं बूढ़ा बाईल हो गया ,नहीं काम का हूँ किसका
आज हुआ हूँ  मैं अस्सी का ,जन्मा सन बय्यालीस का

धीरे धीरे  बदल गए सन ,और सदी भी बदल गयी
बीता बचपन,आयी जवानी ,वो भी हाथ से निकल गयी
गयी लुनाई ,झुर्री  छायी ,बदन मेरा बेहाल  हुआ
जोश गया और होश गया और मैं बेसुर ,बेताल हुआ
सब है मुझसे ,नज़र बचाते ,ना उसका मैं ना इसका
आज हुआ मैं हूँ अस्सी का ,जन्मा सन बय्यालीस का

 अनुभव में समृद्ध वृद्ध मैं ,लेकिन मेरी कदर नहीं
मैंने जिनको पाला पोसा ,वो भी  लेते खबर नहीं
नहीं किसी से कोई अपेक्षा ,किन्तु उपेक्षित सा बन के
काट रहा ,अपनी बुढ़िया संग ,बचेखुचे दिन जीवन के
उन सब का मैं आभारी हूँ ,प्यार मिला जब भी जिसका
आज हुआ हूँ मैं अस्सी का ,जन्म सन बय्यालीस का

बढ़ी उमरिया ,चुरा ले गयी ,चैन सभी मेरे मन का
अरमानो का बना घोंसला ,आज हुआ तिनका तिनका
यादों के सागर में मन की ,नैया डगमग करती है
राम भरोसे ,धीरे धीरे ,अब वो तट को बढ़ती है
मृत्यु दिवस तय है नियति का,कोई नहीं सकता खिसका
आज हुआ हूँ मैं अस्सी का ,जन्मा सन बय्यालीस का

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
खिचड़ी और हलवा

दाल लेते ,चावल लेते , पकाते  दोनों  अलग ,
मिला कर दोनों को खाने का निराला ढंग है  
मिलते पर जब दाल चावल ,तो है बनती खिचड़ी ,
स्वाद देती है अनोखा ,जब भी पकती संग है
चावल जैसी तुम अकेली ,दाल सा तनहा था मैं ,
जब मिले संयोग से  तो  बात फिर आगे  बढ़ी  
जिंदगी के ताप में जब  पके संग संग ,एक हो ,
स्वाद अच्छा ,पचती जल्दी,बने ऐसी खिचड़ी
वो ही गेंहूं ,वो ही आटा ,सान कर रोटी बनी ,
कभी सब्जी साथ खायी ,कभी खायी दाल संग
मगर उस आटे को भूना घी जो देशी डाल कर,
चीनी डाली ,बना हलवा ,छा गए स्वादों के रंग
अब ये हम पे है कि कैसे , जियें अपनी जिंदगी ,
दाल चावल सी अलग या खिचड़ी बन स्वाद ले    
आटे की बस  सिर्फ रोटी बना  खायें  उमर भर ,
या कि फिर हलवा बना कर ,नित नया आल्हाद लें

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
नव  वर्ष की शुभकामना

ऐसा  यह  नूतन वर्ष रहे  
खुशियां बरसे और हर्ष रहे

ना रहे कोरोना धरती पर
आ जाए जिंदगी पटरी पर
सबका दुःख और संताप घटे
हर चेहरे पर से मास्क हटे
फिर रौनक हो बाज़ारों में
फिर मस्ती हो त्योंहारों में
फिर से पनपे भाईचारा
खुशहाल रहे ये जग सारा
हर जीवन में ,उत्कर्ष रहे
ऐसा यह नूतन वर्ष रहे

मियां बीबी में प्यार बढे
पत्नीजी तुमसे नहीं लड़े
कोई ना बोले बड़े बोल
हो परिवार में मेलजोल
तन स्वस्थ रहे मन मस्त रहे
अच्छे दिन को आश्वस्त रहे
छोटे  बुजुर्ग का ध्यान रखे
उनके अनुभव का मान रखे
जीवन में कम संघर्ष रहे
ऐसा यह नूतन वर्ष रहे

घोटू 
नव  वर्ष की शुभकामना

ऐसा  यह  नूतन वर्ष रहे  
खुशियां बरसे और हर्ष रहे

ना रहे कोरोना धरती पर
आ जाए जिंदगी पटरी पर
सबका दुःख और संताप घटे
हर चेहरे पर से मास्क हटे
फिर रौनक हो बाज़ारों में
फिर मस्ती हो त्योंहारों में
फिर से पनपे भाईचारा
खुशहाल रहे ये जग सारा
हर जीवन में ,उत्कर्ष रहे
ऐसा यह नूतन वर्ष रहे

घोटू 

Monday, April 12, 2021

दबदबा पत्नी का

रखती तू मुझको दबाकर ,तुझसे दब कर रहता मैं ,
किन्तु जब सर दर्द करता ,तो दबाती है तू ही
थके पावों को दबा कर ,देती है राहत मुझे ,
मानसिक सब दबाबों में ,मुझको समझाती तू ही
अपनी बाहों में दबा कर , देती सुख की नींद है ,
बाँध कर निज बाजूवों  में  लगा लेती  जब गले  
प्यार का दबदबा  तेरा ,देता परमानन्द है ,
अच्छा लगता ,दब के रहना  तेरे अहसानो  तले
दबा कर के दर्द पीड़ा और आंसूं आँख में ,
मुस्करा कर ,मिलती जुलती ,काम में रहती फंसी
कभी ममतामयी माँ तू ,तो सुशीला बहू भी ,
कभी घर की व्यवस्थापक ,कभी पति की प्रेयसी
छोटी छोटी बात में ,कितना ही झगड़े रात में ,
प्यार से बस तू ही देती ,सुबह प्याला चाय का
तेरा मेरा रिश्ता सच्चा ,लबालब है प्यार से ,
जिसने चख्खा, वो ही जाने ,दबदबे का जायका
लोग कहते ,तुझसे डरता ,दब्बू और डरपोक मैं ,
मानता हूँ ,सच है ये ,पर मुझे इसका गम नहीं
झांकअपने गिरेबां में देखेगा तो पायेगा
बीबी से दबने में कोई भी किसी से कम नहीं  
पत्नी से दब कर के रहने  का मज़ा ही और है ,
जिसने पाया,सुख उठाया ,ना मिला ,वो बदनसीब
आपकी हर एक  हरकत पे नज़र बीबी की है ,
वो ही सुख दुःख बुढ़ापे में ,आपके रहती करीब

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुम मुझे मंजूर हो

चाँद का टुकड़ा नहीं ,जन्नत की ना तुम हूर हो
यार तुम ,जैसी भी हो,जो हो,मुझे मंजूर हो

रूप परियों सा नहीं तो मेरे मन में गम नहीं
सच्चे दिल से चाहती हो ,तुम मुझे ये कम नहीं
तुममे अपनापन है ,मन में समर्पण का भाव है
गरिमा व्यक्तित्व में  है , सोच में ठहराव है
ना सुरा ना जाम तुम पर नशे से भरपूर हो
यार तुम जैसी भी हो ,जो हो ,मुझे मंजूर हो

 गुलाबों की नहीं रंगत बदन में ,पर महक तो है
लरजते इन लबों पर पंछियों  जैसी ,चहक तो है
तेरी आँखों में तारों सी ,चमक है ,जगमगाहट है
छुवन में प्यार, उल्फत की ,गर्मजोशी की आहट है
तुम बसी हो दिल में मेरे , मेरे मन का नूर हो
यार तुम ,जैसी भी  हो ,जो हो ,मुझे मंजूर हो
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू '

Friday, April 9, 2021

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