Friday, July 23, 2021

तीरंदाज हो गए 

हम मोह में जिनके बंधे उन्ही के दर्शन को मोहताज हुये 
 जाने क्या बात हुई ऐसी , वो हमसे है नाराज हुये 
हमने जिन से रिश्ता जोड़ा, वो बीच राह में छोड़ गए, 
 चलता न किसी पर भी बस है,हम इतने बेबस आज हुये
हम प्यार में जिनके पागल हैं, नित मानमनौव्वल करते है ,
हर बात पर आपा खो देते, वो इतने तुनक मिजाज हुये 
हम बड़ी शान से पहन रहे, है तार तार हो रही जींस, 
तन दिखलाऊऔर फटे वस्त्र,अब फैशन के आगाज हुये 
मॉडर्न बनने के चक्कर में ,हमने ऐसा यू-टर्न लिया  
हम भूल संस्कृति को अपनी अब पश्चिम के मोहताज हुऐ 
जिनके दादा और परदादा ,ना मार सके एक भी मेंढक, 
क़िस्मत देखो उनके बेटे अब तीखे तीरंदाज हुये
साबुन जैसी उनकी यादें ,घिसघिस के झाग में बदल गई,
कुछ मन का मैलापन निकला ,कुछ साफ पुराने राज हुऐ
 घोटू ठोकर खा सब गिरते,हम ठोकर खाकर संभल गए, 
जीवन में सफलता पाने के, हम सीख गए अंदाज नये

मदन मोहन बाहेती घोटू

हम मियां बीवी 

हम कितने ही लड़े और क़िस्मत को कोसे 
पर रहना है एक दूजे के सदा भरोसे 
अपना दिल से दिल का रिश्ता  बहुत करीबी 
हमें बनाया है ईश्वर ने मियां बीबी

सुनते हैं कि सभी जोड़ियां, पति पत्नी की ,
बना भेजता, आसमान से ,स्वयं विधाता 
उसे निभाया करते हैं हम पूरा जीवन ,
जब आपस में यह प्यारा बंधन बंध जाता 
अब तुम चाहे रहो प्यार से या फिर झगड़ो,
सुलह अंत में पर होती ही होती अक्सर 
जरा प्यार की गर्मी मिलती , पिघला देती, 
भले बर्फ से जमे हुए हो, तीखे तेवर 
एक दूजे हम साथ ,हमारी खुश ये नसीबी 
हमे बनाया है ईश्वर ने मियां बीबी

जब दो बर्तन साथ रहे टकराते ही हैं ,
पर उनकी खटपट का है संगीत निराला 
कभी रूठना, कभी मनाना ,टोका टाकी ,
अच्छा लगता नोकझोंक का चाट मसाला 
बिन तकरार, प्यार का पूरा मजा ना आता,
 कुछ नमकीन ,जरूरी होती ,मीठे संग है 
 समझौते की ताजी चटनी, स्वाद बढ़ाती,
 और जीवन के भोजन में आती उमंग है 
 इस जीवन का स्वाद बदल पाए न कभी भी 
 हमे बनाया है ईश्वर ने भी मियां बीबी

मदन मोहन बाहेती घोटू

Thursday, July 22, 2021

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Wednesday, July 21, 2021

कोविड में

 कोविड में कुछ कर न सके हम,दूरी रखनी थी कायम ,
  चुपके-चुपके, इनसे उनसे,नैन लड़ाना सीख गए
 मुख पर उनके मास्क,हमारे मुख पर भी था मास्क चढ़ा 
बातचीत तो हो ना पायी, बात बढाना सीख गए 
 अब जब मुख से मास्क हटा तो यह पहचान नहीं होती
 थे वे कौन रसीले नैना, जिनसे नयन लड़ाए थे ,
 निश्चित शोख हसीना होगी, अच्छा टाइम पास हुआ,
 लॉकडाउन में दिल पर अपने लॉक लगाना सीख गए

मदन मोहन बाहेती घोटू
माता रानी के भक्त हो गए

बंधे हुए रहते थे मोह माया बंधन में 
दुनियादारी से वह आज विरक्त हो गए 
कल तक रहते लिप्त भोग में और लिप्सा में,
 वह देखो माता रानी के भक्त हो गए

 तन पर नहीं लुनाई रही, आई जर्जरता,
 निर्बलता में अंकपाश में घेर लिया है 
 चिकने तन पर लगी झुर्रियां झलक मारने ,
 धीरे-धीरे यौवन ने मुंह फेर लिया है 
 अपनो  का अपनापन भी है लुप्त हो रहा,
 घर में हम अनचाहे से अब फक्त हो गए 
 कल तक रहते लिप्त भोग में और लिप्सा में 
 अब देखो मातारानी के भक्त हो गए
 
 मन तो बहुत चाहता पर तन साथ ना देता,
 सांप छछूंदर गति हुई कुछ कर ना सकते 
  फूल महकते हैं गुलशन में सुंदर सुंदर,
  मन मसोसकर अपना केवल उनको तकते
  कल तक हरे भरे थे छाया ,फल देते थे 
  पातहीन अब  सूखे हुए दरख़्त हो गए
  कल तक रहते लिप्त भोग मेंऔर लिप्सा में,
  अब देखो माता रानी के भक्त हो गए
    
    ऐसा ना है कि उनमें कुछ कमी नहीं है ,
    रस्सी भले जल गई, लेकिन बट न गया है 
    अब भी सब पर रौब पुराना दिखलाते हैं ,
    बात बनाने का अपनी पर हठ गया है 
    जिद्दी, अड़ियल, नहीं किसी की कोई सुनते,
     अपने थोथे सिद्धांतों में सख्त हो गए 
     कल तक रहते लिप्त भोग में और लिप्सा में,
     वह देखो माता रानी के भक्त हो गए

मदन मोहन बाहेती घोटू

Tuesday, July 20, 2021

मिलन यात्रा

तुम भी थोडी पहल करोगे 
मैं भी थोड़ी पहल करूंगा 
बात तभी तो बन पाएगी 
धीरे हो या जल्दी-जल्दी 
पास हथेली जब आएगी 
तब ही ताली बज पाएगी 

तुम भी चुप चुप, मैं भी चुप चुप 
कोई कुछ भी नहीं बोलता 
तो फिर बात बनेगी कैसे 
तुम उस करवट मैं इस करवट
 दोनों में बनी दूरियां
 तो फिर रात कटेगी कैसे 
 यूं ही शर्म हया चक्कर में 
 मिलन रात में मिलन न होगा 
 यूं ही रात निकल जाएगी 
  तुम भी थोड़ी पहल करोगे
   मैं भी थोड़ी पहल कर लूंगा 
   बात तभी तो बन पाएगी
   
   दीवारे जब तलक हिचक की ,
   खड़ी रहेगी बीच हमारे 
   कैसे मिल पाएंगे तुम हम 
   गंगा और जमुना की धारा 
   अगर बहेगी दूर-दूर ही 
   तो फिर कैसे होगा संगम
    कैसे मैं  मधुपान करूंगा
    यदि चेहरे पर चंदा से 
    यूं ही बदली अगर छाएगी 
    तुम भी थोड़ी पहल करोगे 
    मैं भी थोड़ी पहन कर लूंगा 
    बात तभी तो बन पाएगी

   मदन मोहन बाहेती घोटू
जीवन चर्या 

होती भोर,निकलता सूरज ,धीरे-धीरे दिन चढ़ता है  
हर पंछी को दाना चुगने, सुबह निकलना ही पड़ता है

बिना प्रयास सांस ही केवल ,जब तक जीवन, आती जाती
 किंतु उदर में जब कुछ पड़ता , तब ही जीवन ऊर्जा आती
 चाहे चींटी हो या हाथी, सबको भूख लगा करती है इतने संसाधन प्रकृति में, सबका पेट भरा करती है लेकिन अपना हिस्सा पाने ,सबको कुछ करना पड़ता है 
  हर पंछी को दाना चुगने ,सुबह निकलना ही पड़ता है
  
 कितने ही भोजन के साधन, विद्यमान है ,आसपास है अपने आप नहीं मिलते पर ,करना पड़ता कुछ प्रयास है ज्यादा उर्जा पाने ,थोड़ी उर्जा करना खर्च जरूरी बैठे-बैठे नहीं किसी की ,कोई इच्छा होती पूरी 
 भूख लगे ,मां दूध पिलाएं, बच्चे को रोना पड़ता है 
 हर पंछी को दाना चुगने, सुबह निकलना ही पड़ता है 

     मदन मोहन बाहेती घोटू