Thursday, August 26, 2021

तू मेरी तकदीर बन गई 

मैं सीधा सा भोला भाला 
पर तूने घायल कर डाला 
गई चीर जो मेरे दिल को ,
नजर तेरी शमशीर बन गई 

मैं स्वच्छंद विचरता रहता 
अपने मनमाफिक था बहता
 तूने प्यार जाल में बांधा,
 जुल्फ तेरी जंजीर बन गई 
 
मैं रेतीला राजस्थानी 
मिला प्यार का तेरे पानी 
तन मन में हरियाली छाई 
मेरी छवि कश्मीर बन गई 

मैं एक पत्ता हरा भरा था
 तूने छुआ रंग निखरा था 
 मेहंदी हाथ रचाई तूने,
 लाल मेरी तस्वीर बन गई 
 
मैं चावल का अदना दाना
 पाया तेरा साथ सुहाना 
 तूने अपने साथ उबाला,
 स्वाद भरी फिर खीर बन गई
 
 हाथों में किस्मत की रेखा 
 लेकिन जब से तुझको देखा 
 तू और तेरी वर्क रेखाएं 
 ही मेरी तकदीर बन गई

मदन मोहन बाहेती घोटू

Wednesday, August 25, 2021

मिलन पर्व

 रूप तुम्हारा मन को भाया, 
 तुमने भी कुछ हाथ बढ़ाया
  बंधा हमारा गठबंधन और ,
  मिलन पर्व हैअब जब आ 
  सांसो से सांसे टकराई
 और प्रीत परवान चढ़ गई 
 यारां, मेरी नींद उड़ गई 
 
 तुमने जब एक अंगड़ाई ली, 
 फैला बांह ,बदन को तोड़ा 
 देखा उस सुंदर छवि को तो,
  सोया मन जग गया निगोड़ा
 फिर जो तेरे अलसाये से ,
 तन की मादक खुशबू महकी 
 मेरे तन मन और बदन में, 
 एक चिंगारी जैसी दहकी
 पहले वरमाला, बांहों की,
 माला फिर थी गले पड़ गई
यारां, मेरी नींद उड़ गई 

 मैंने जब तुमको सहलाया ,
 प्यार तुम्हारा भी उमड़ाया 
 बात बड़ी आगे, अधरों ने ,
 जब अधरों का अमृत पाया 
 हम तुम दोनों एक हो गए, 
 बंध बाहों के गठबंधन में 
 सारा प्यार उमड़ कर आया 
 और सुख सरसाया जीवन में 
 मैं न रहा मैं, तुम न रही तुम, 
 ऐसी हमने प्रीत जुड़ गई 
 यारां, मेरी नींद उड़ गई

मदन मोहन बाहेती घोटू

Tuesday, August 24, 2021

शाश्वत सच 

मैं चौराहे पर खड़ा हुआ 
क्योंकि मुश्किल में पड़ा हुआ 
मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं,
 यह प्रश्न सामने खड़ा हुआ 
 एक तरफ जवानी के जलवे
  जिनमें मैं डूबा था अब तक 
  एक तरफ बुढ़ापा बुला रहा
   देता है बार-बार दस्तक
   मैं किधर जाऊं, क्या निर्णय लूं
   मन में उलझन, शंशोपज है
  आएगा बुढ़ापा निश्चित है 
  क्योंकि ये ही शाश्वत सच है 
  कोई चिर युवा नहीं रहता 
  यह सत्य हृदय को खलता है 
  दिन भर जो सूरज रहे प्रखर,
  वह भी संध्या को ढलता है 
  रुक पाता नहीं क्षरण तन का,
   मन किंतु बावरा ना माने 
   इसलिए लगा हूं बार-बार 
   मैं अपने मन को समझाने
    तू छोड़ मोह माया सारी 
    अब आया समय विरक्ती का 
    जी भर यौवन में की मस्ती,
     अब वक्त प्रभु की भक्ति का 
     एक वो ही पार लगाएंगे,
     तेरा बेड़ा भवसागर में 
     तू भूल के सांसारिक बंधन 
     अब बांधले बंधन ईश्वर से

   मदन मोहन बाहेती घोटू
मिलन पर्व

 रूप तुम्हारा मन को भाया, तुमने भी कुछ हाथ बढ़ाया 
बंधा हमारा गठबंधन और मिलन पर्व हैअब जब आया 
सांसो से सांसे टकराई और प्रीत परवान चढ़ गई 
 यारां, मेरी नींद उड़ गई 
 तुमने जब एक अंगड़ाई ली, फैला बांह ,बदन को तोड़ा 
देखा उस सुंदर छवि को तो सोया मन जग गया निगोड़ा
 फिर जो तेरे अलसाये से ,तन की मादक खुशबू महकी
 मेरे तन मन और बदन में, एक चिंगारी जैसी दहकी
और फिर मुझे सताने तुमने करवट बदली और मुड़ गई
यारां, मेरी नींद उड़ गई 
 मैंने जब तुमको सहलाया ,प्यार तुम्हारा भी उमड़ाया 
बात बड़ी आगे अधरों ने ,जब अधरों का अमृत पाया 
हम तुम दोनों एक हो गए, बंध बाहों के गठबंधन में सारा प्यार उमड़ कर आया और सुख सरसाया जीवन में 
 मैं न रहा मैं, तुम न रही तुम, ऐसी हमने प्रीत जुड़ गई 
 यारां, मेरी नींद उड़ गई

मदन मोहन बाहेती घोटू

Saturday, August 21, 2021

बहन से
(राखी के अवसर पर विशेष )

एक डाल के  फल हम बहना
संग संग सीखा,सुखदुख सहना

एक साथ थे ,जब कच्चे थे
मौज मनाते  ,सब बच्चे  थे
वो दिन भी कितने अच्छे थे
एक दूजे पर ,प्यार लूटना ,
याद आता वो मिलजुल रहना
एक डाली के  फल हम बहना

ना कोई  चिन्ता , जिम्मेदारी
बचपन की  सब  बातें न्यारी
कितनी सुखकर,कितनी प्यारी
तितली सा उन्मुक्त उछलना ,
शीतल मंद पवन सा बहना
एक डाल के फल हम बहना

पके समय संग ,टूटे,बिछड़े
पाया स्वाद ,मधुर हो निखरे  
अलग अलग होकर सब बिखरे
हमने अपना काम संभाला ,
और तुम बनी ,किसी का गहना
एक डाल  के फल हम बहना

एक डोर बांधे जो माँ थी
दूजी डोर बांधती राखी
प्रेम का बंधन ,अब भी बाकी
मिलकर,सुख दुःख बांटा करना  ,
दिल की अपने , बातें कहना
एक डाल के फल हम बहना

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Friday, August 20, 2021

 जाओ चाय बना कर लाओ 
 
बूढ़े बुढ़िया, मियां बीबी, बैठ बुढ़ापे में क्या करते 
तनहाई में गप्प मारते ,अपना वक्त गुजारा करते 
दुनिया भर की, इधर उधर की, बहुत ढेर सारी है बातें 
कई बार जागृत हो जाती, पिछली धुंधली धुंधली यादें
 मुझे देखने आए थे तुम ,पत्नी जी ने पूछा हंसकर 
ऐसा मुझ में क्या देखा था, जो तुम रीझ गए थे मुझ पर 
क्या वह मेरी रूप माधुरी थी या था वो खिलता चेहरा 
या मेरी मासूम निगाहें, जिन पर पड़ा लाज का पहरा 
या फिर मेरा खिलता यौवन,या मतवाली मुस्कुराहट थी 
चोरी-चोरी तुम्हें देखना या फिर मेरी घबराहट थी
कुछ तो था जो तुम सकुचाए,रहे देखते मुझे एकटक
बढ़ी हुई थी मेरी धड़कन, धड़क रहा मेरा दिल धक धक 
न तो बात की ना कुछ पूछा ना कुछ बोले नही कुछ कहा 
यूं ही फुसफुसा,मां कानों में, तुमने झट से कर दी थी हां 
मैं बोला सच कहती हो तुम,मै था बिल्कुल भोला भाला 
पहली बार किसी लड़की को पास देखकर था मतवाला
 यूं कॉलेज में ,यार दोस्त संग  हम लड़की छेड़ा करते थे 
लेकिन बात बिगड़ ना जाए ,हम घबराते और डरते थे 
पहली बार तुम्हें देखा था जीवन साथी चुनने खातिर 
 तुम सुंदर थी भोली भाली रूप तुम्हारा था ही कातिल 
तुम्हें देख कर परख रहा था ,पत्नी बनी लगोगी कैसी 
फिर तुम्हारी शर्माहट और सकुचाहटभी थी कुछ ऐसी 
तुम जो ट्रे में लिए चाय के ,प्याले आई थी घबराते 
 हाथों के कंपन के कारण, चाय भरे प्याले टकराते उनकी टनटन का वह मधु स्वर मेरे मन को रिझा गयाथा 
 दिया चाय का प्याला जिसमें अक्स तुम्हारा समा गया था
 यह प्यारा अंदाज तुम्हारा, लूट ले गया मेरा मन था पहली चुस्की नहीं चाय की,वह मेरा पहला चुंबन था फिर आगे क्या हुआ पता है तुमको और मालूम मुझे है
 पति पत्नी बन जीवन काटा,मस्ती की और लिऐ मजे हैं 
अपनी पहली मुलाकात को, एक बार फिर से दोहराओ
 वक्त हो गया, तलब लगी है जाओ चाय बना कर लाओ

मदन मोहन बाहेती घोटू

Tuesday, August 17, 2021

शांति का अस्त्र  मोबाइल

याद जमाना आता जब हमजो कुछ पल भी थे नामिलते
 बेचैनी सी छा जाती थी ,और चलती थी छुरियां दिल में 
 पर कुछ ऐसा पलटा मौसम, बदल गया है सारा आलम, तुम खुश अपने मोबाइल में, मैं खुश अपने मोबाइल में
 
 दूर-दूर हम बैठे रहते ,
नहीं किसी से कुछ भी कहते 
अपने अपने मोबाइल से ,
हम दोनों ही चिपके रहते 
फुर्सत नहीं हमें की देखें 
एक दूजे को उठाकर नजरें 
अपनी अपनी ही दुनिया में ,
खोए रहते हम बेखबरे 
आपस में हम बात करें क्या
,कोई टॉपिक नजर ना आता 
 मेरा वक्त गुजर जाता है, 
वक्त तुम्हारा भी कट जाता 
 बात शुरू यदि कोई होती, 
तू तू मैं मैं बढ़ जाती है 
 मेरे हरेक काम में तुमको ,
कोई कमी नजर आती है 
इसीलिए शांति से जीने 
का पाया यह रस्ता सुंदर 
व्यस्त रहो और मस्त रहो तुम ,
मोबाइल से खेलो दिनभर 
यह तुम्हारी सुन लेता है ,
दो आदेश ,काम करता है 
उंगली से तुम इसे नचाती ,
चुप रहता, तुम से डरता है 
मैं ये सब ना कर सकता था
 इस कारण होता था झगड़ा 
हम तुम बहुत सुखी है जब से,
 हाथों में मोबाइल पकड़ा 
मोबाइल ना शांति यंत्र यह,
टोका टाकी  मिट जाती है 
नोकझोंक सब बंद हो जाती,
 घर में शांति पसर जातीहै  
मौन भावना पर हो जाती,
रह जाती है दिल की दिल में 
तुम खुश अपने मोबाइल में, 
मैं कुछ अपने मोबाइल में

मदन मोहन बाहेती घोटू