Sunday, September 26, 2021

क्यों

 जिसमें होती अक्ल जरा कम ,
 उसे कम अक्ल कहते हैं सब,
  तो क्यों मंद अक्ल वाले को 
  कहते अकलमंद और ज्ञानी 
  
  कलम रखो वह कलमदान है,
   फूल रखो वह फूल दान है ,
   पास फटकने ना दे मच्छर 
   क्यों कहलाती मच्छरदानी 
   
   जिसका चेहरा भाव शून्य हो 
   लगती हो पत्थर की मूरत 
   आती जिसको कभी हंसी ना,
    मगर हसीना वह कहलाती 
    
    जोर नहीं कमजोर ठीक है, 
    होती जिसमें कोई कमी ना ,
    मगर कमीना कहलाता है
    बात समझ में यह ना आती

घोटू
प्रतिबंधित जीवन 

प्रतिबंधों के परिवेश में ,जीवन जीना बहुत कठिन है 
बात बात में ,मजबूरी  के ,आंसूं पीना  बहुत कठिन है 

रोज रोज पत्नीजी हमको ,देती रहती  सीख नयी है
इतना ज्यादा ,कंट्रोल भी ,पति पर रखना ठीक नहीं है 
आसपास सुंदरता बिखरी ,अगर झांक लूं ,क्या बिगड़ेगा 
नज़र मिलाऊँ ,नहीं किसी से ,मगर ताक लूं ,क्या बिगड़ेगा 
पकती बिरयानी पड़ोस में ,खा न सकूं ,खुशबू तो ले लूं 
सुन सकता क्या नहीं कमेंट्री ,खुद क्रिकेट मैच ना खेलूं 
चमक रहा ,चंदा पूनम का ,कर दूँ उसकी अगर प्रशंसा 
क्या इससे जाहिर होता है ,बिगड़ गयी है मेरी मंशा
खिले पुष्प ,खुशबू भी ना लूं ,बोलो ये कैसे मुमकिन है 
प्रतिबंधों के परिवेश में ,घुट घुट जीना बहुत कठिन है 

शायद तुमको डर तुम्हारे ,चंगुल से मैं निकल जाऊँगा 
यदि ज्यादा कंट्रोल ना रखा  ,मैं हाथों से फिसल जाऊँगा 
मुझे पता ,इस बढ़ी उमर में ,एक तुम्ही पालोगी मुझको 
कोई नहीं जरा पूछेगा ,तुम्ही  घास डालोगी मुझको
खुले खेत में जा चरने की ,अगर इजाजत भी दे दोगी 
मुझमे हिम्मत ना चरने की ,कई रोग का ,मैं हूँ रोगी
तरह तरह के पकवानो की ,महक भले ही ललचायेगी 
मुझे पता ,मेरी थाली में ,घर की रोटी दाल आएगी
मांग रहा आजादी पंछी ,बंद पींजरे से  लेकिन है   
प्रतिबंधों के परिवेश में ,घुट घुट जीना बहुत कठिन है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ;
घर 

केवल ईंट और गारे का, ढांचा ना घर होता है 
घर वो जिसमें घर वालों में प्रेम परस्पर होता है 

वह घर असली घर जिसमें सब मिलजुल कर साथ रहे 
जहां प्रेम और सद्भावों की, गंगा जमुना सदा रहे

घर वो जिसमें मेल जोल हो ,भाईचारा भरा रहे 
जिसमें हरदम चहल-पहल हो, जो खुशियों से हरा रहे

सुख की हो बरसात जहां पर ,समृद्धि के फूल खिले 
जहां अतिथि का स्वागत हो, बांह  पसारे सभी मिले

 सहनशीलता लोगों में हो, साथ निभाना सब जाने
करें सलाह ,मार्गदर्शन ले ,बात बड़ों की सब माने

 घर वह जिसमें देव विराजे, भक्ति भाव हो पूजन हो जहां बुजुर्गों की सेवा हो ,आदर हो और वंदन हो 
 
 जहां पिरंडे की पूजा हो, अग्नि जहां जिमाते हो 
 गौ माता को अर्पित पहली रोटी यहां पकाते हो 
 
 राम लखन जैसे भाई हो, बहू रहे सीता जैसी 
 सास बहू को बेटी  माने, सब में प्रीत रहे ऐसी 
 
 अच्छे संस्कार से शिक्षित ,हर बच्चे का बचपन हो 
 इर्षा बैर ना हो आपस में, सब में बस अपनापन हो
 
 ननंद भोजाई ,देरानी और जेठानी में प्यार रहे 
 दादी बच्चों को बैठा कर, नई कहानी रोज कहे 
 
 वह घर,घर संतोष जहां पर नहीं कोई स्पर्धा हो 
 एक दूसरे की इज्जत, घर का हर प्राणी करता हो 
 
 हो हर रात दिवाली जैसी ,सब दिन हो उल्लास भरे   वह घर,घर ना स्वर्ग तुल्य है , वहां देवता वास करें

मदन मोहन बाहेती घोटू

Monday, September 20, 2021

अहम ब्रह्म

करो व्यवस्थित अपना जीवन 
रखो सुरक्षित अपना तन मन 
रहो सभी के तुम अपने बन
तभी पाओगे तुम अपनापन 

जियो जीवन सीधा-सादा
तभी मिलेगी खुशियां ज्यादा 
स्वच्छ संतुलित खाना पीना 
तब ही स्वस्थ जिंदगी जीना 

मुंह में राम बगल छुरी है 
ऐसी आदत बड़ी बुरी है 
अपनी कमियां सभी सुधारो 
छुपे हुए रावण को मारो 

अगर न निर्मल, मन जमुना जल 
छुपा कालिया नाग कहीं पर 
उसका मर्दन करो कृष्ण बन
तभी सफल होगा यह जीवन 

मोह माया का हिरण्यकश्यप 
तम्हें सताता रहता जब तब 
सहन मत करो, मारो उसको
बन नरसिंह, संहारो उसको

रूप विराट नहीं दिखलाओ 
तुम वामन स्वरूप बन जाओ 
भू, पाताल और नभ सर्वस
तीन पगों में नापोगे बस 

जीवन के समुद्र मंथन में 
रखो आस रत्नों की मन में 
किंतु हलाहल भी मिलता है 
शंकर बन पीना पड़ता है 

होते तुम निराश यूं क्यूं हो 
प्रभु तुममें ,तुम स्वयं प्रभु हो
चलते जाओ, नहीं थको तुम 
जीतोगे, विश्वास रखो तुम 

मन में हो जो अटल इरादा
 राह न रोक सकेगी बाधा 
 रखो हौसला, लक्ष्य पाओगे 
 तुम मंजिल पर पहुंच जाओगे

मदन मोहन बाहेती घोटू

Saturday, September 18, 2021

आलोचना 

आजकल हर जना 
जरूरत से ज्यादा होशियार है बना 
अपने गिरेबान में झांकना नहीं ,
करता है औरों की आलोचना 
सोच नकारात्मक है 
दृष्टिकोण भ्रामक है 
जो सिर्फ औरों की कमियां ही दिखाता है 
उसे आधा भरा हुआ नहीं ,
बाकी जो खाली है वह आधा गिलास नजर आता है लोगों की अच्छाइयां नहीं दिखती 
उनकी बुराइयां ही खोजता है 
कोकिला की तरह आम्र तरु पर नहीं,
 कौवे की तरह सीधा नीम तक ही पहुंचता है 
 किसी की गलतियां ढूंढना बड़ा आसान है 
 गलतियां तो करता ही रहता है इंसान है 
 अरे इंसान क्या कई बार ,
 भगवान से भी गलती हो जाती है 
 किसी किसी के हाथ में ,
 पांच के बदले छह उंगलियां पाई जाती है 
 गलतियां उसी से होती है जो कुछ करता है 
 निठल्ले का जीवन तो व्यर्थ ही गुजरता है 
 कभी अपने अंदर  झांकोगे,
 तो अपनी भी कई कमियां देख पाओगे 
 पहले उन्हें सुधारोगे,
  तब दूसरों पर उंगली उठाओगे  
  आत्मविवेचन सबसे बड़ा उपचार है
  जो बदल देता आदमी का व्यवहार है 
  ऐसा करके तुम अपनी जिंदगी संवार सकोगे 
  खुद सुधरोगे , तभी औरों को सुधार सकोगे 
  इसलिए सिर्फ गलतियों को मत तलाश करो 
  कोई गलती नजर आए ,
  तो उसे सुधारने का प्रयास करो 
  इससे तुम्हारी गरिमा बढ़ेगी 
  तुम्हारी छवि और भी निखरेगी
  अपने जीवन को सार्थक करिए 
 आलोचक नहीं, सुधारक बानिये

मदन मोहन बाहेती घोटू

Friday, September 17, 2021

बदलते मौसम 

तू जो ना संग, लगती सर्दी,
 बढ़ जाती है तन में ठिठुरन
तू पास आती, बढ़ती ऊष्मा ,
होता गर्मी वाला मौसम 
तू मिल जाती ,फूल महकते,
 खिलता मौसम, बासंती बन  
 मिलन हमारा बारिश जैसा, 
 प्यार बरसता रिमझिम रिमझिम 
 कभी गर्म तू सूरज जैसी, 
 कभी चांदनी सी शीतल है 
 जब भी साथ तेरा मिलता है ,
 मौसम जाते बदल बदल है

मदन मोहन बाहेती घोटू

Thursday, September 16, 2021

जियो आत्मा सम्मान से

जब तक जीवन है तुम जियो शान से 
समझौता मत करो  आत्मसम्मान से 

अगर आत्मविश्वास हृदय में खास है 
धीरज की पूंजी, जो तुम्हारे पास है 
रखो हौसला ,लड़ लोगे तूफान से 
समझौता मत करो आत्म सम्मान से 

औरों में क्या कमियां है यह मत ताको
पहले अपने गिरेबान में तुम  झांको
उन्हें सुधारो , जियोगे आसान से 
समझौता मत करो आत्मसम्मान से 

लोग कहेंगे क्या, इस पर तुम ध्यान न दो 
बकवासों पर दुनिया की तुम कान न दो 
सुनो ,निकालो उसे दूसरे कान से 
समझौता मत करो आत्मसम्मान से 

आसपास की हर हरकत पर नजर रखो 
चौकन्ने से रहो ,सभी की खबर रखो 
क्या होता है ,रहो नहीं अनजान से 
समझौता मत करो आत्मसम्मान से 

नहीं किसी से बैर कोई भी मन में हो 
मिलनसारिता, प्रेम भाव जीवन में हो 
करो मदद कमजोरों की, जी जान से 
समझौता मत करो आत्मसम्मान से 

सार हीन संसार ,करो सत्कर्म सदा 
परोपकार को मानो अपना धर्म सदा 
नाम तुम्हारा होगा अच्छे काम से 
समझौता मत करो आत्मसम्मान से

मदन मोहन बाहेती घोटू