Wednesday, November 9, 2022

हिसाब किताब 

आओ बैठ हिसाब करें हम 
अपने सत्कर्मों,पापों का
अब तक किए गए जीवन में
 अपने सारे उत्पातों का 
 
जो भी किया अभी तक हमने
 सोच समझकर किया होगा 
 अपनी ज्ञान और बुद्धि से 
 उचित निर्णय लिया होगा 
 लेकिन अपनी अल्प बुद्धि से ,
 लिया गया कोई भी निर्णय 
 औरों को भी उचित लगेगा 
 किंचित ही यह होगा संभव 
 सबका अपना दृष्टिकोण है
  सोच सभी की अपनी-अपनी 
  पाप पुण्य की परिभाषाएं,
  लोग बनाते अपनी-अपनी 
  बैठे, सोचे, मनन करें हम ,
  अपने सत्कर्मों, पापों का 
  
  क्या क्या खोया, क्या क्या पाया 
  कितना लाभ हुआ ,क्या हानि 
  कितने दोस्त बनाए हमने 
  और दुश्मनी कितनी ठानी 
  चित्रगुप्त जी आडिट करके 
  पाप पुण्य सारे आकेंगे
  जो जिसके हिस्से आएगा ,
  नर्क स्वर्ग हमको बाटेंगे 
  पूर्व जन्म का फल निपटाते
  यह जीवन तो निपट जाएगा
  अगली योनि के कर्मों का 
  समय कहां फिर मिल पाएगा  
  अगले जन्मों के हित करना
  पाप पुण्य फिर होगा संचित 
   जिसे देख भावी जीवन में ,
   स्वर्ग नर्क होगा आवंटित
  कैसे आलंकन होगा फिर 
  इस जीवन के अभिशापो का 
  आओ बैठ हिसाब करें हम,
   अपने सत्कर्मों, पापों का

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Tuesday, November 8, 2022

झपकी

बोझिल पलकें, आती झपकी
नींद दिखाती, गीदड़ भभकी

आती जाती, फिर रुक जाती 
आखें रह रह कर मूंद जाती
नयन शयन करने को आतुर
बदले लगते सांसों के सुर
तन का आलस, करता बेबस
अब कुछ चैन, चाहता मानस
निद्रा आती,लपकी लपकी 
बोझिल पलकें आती झपकी

पहले तंद्रा और फिर निंद्रा
फिर खर्राटों का है खतरा 
गरदन झुकती ओर संभलती
नींद बावरी ऐसा छलती
निद्रा पूर्व,मिलन का चुम्बन
नयन मूंद, निद्रा का वंदन
अजब स्थिति बनती सबकी
बोझिल पलकें, आती झपकी

मदन मोहन बाहेती घोटू 




Saturday, October 29, 2022

    बदलते हालात

दो महीने की बिमारी ने,
हुलिया मेरा ऐसा बदला
कल तक था मैं मोटा ताजा,
आज हो गया दुबला पतला

एसी पीछे पड़ी बिमारी
कमजोरी से त्रस्त होगए
पहनू लगते झबले जैसे,
ढीले सारे वस्त्र हो गए 
 झूर्री झुर्री बदन हो गया 
 जो था चिकना भरा सुहाना 
 गायब सारी भूख होगई 
 हुआ अरुचिकर ,कुछ भी खाना 
 दिन भर खाओ दवा की गोली 
 जी रहता है मचला मचला 
 कल तक था मैं मोटा ताजा 
 आज होगा दुबला पतला 
 
लेकिन मैंने हार न मानी,
हालातों से रहा जूझता
मन में श्रद्धा और लगन ले, 
ईश्वर को मैं रहा पूजता 
अगर दिये हैं उसने दुख तो 
वो ही फिर सुख बरसाएगा 
मेरी जीवन की शैली को 
फिर से पटरी पर लाएगा 
दृष्टिकोण आशात्मक रखकर 
मैंने अपना मानस बदला 
कल तक था मैं मोटा ताजा 
आज हो गया दुबला पतला 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
     मतलबी यार 
     
  सदा बदलते रहते वो रुख, उल्टे बहते है
मतलब हो तो गदहे को भी चाचा कहते हैं 

रहते थे हरदम हाजिर जो जान लुटा ने को 
वक्त नहीं उनको मिलता अब शक्ल दिखाने को 
थे तुम्हारे स्वामी भक्त , जब से बदली पाली 
नहीं झिझकते,तुमको देते ,जी भर कर गाली 
और बुराइयां सबके आगे करते रहते हैं 
मतलब हो तो गदहे को भी चाचा कहते हैं

 ना तो इनका कोई धरम है ना ईमान बाकी 
 चिंता है निज स्वार्थ सिद्धि की और सुख सुविधा की 
 जहां खाने को मिले जलेबी, रबड़ी के लच्छे उनकी सेवा को आतुर ये भक्त बने सच्चे 
 वहां मिले अपमान भीअगर हंसकर सहते हैं
  मतलब हो तो गदहे को भी चाचा कहते हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Friday, October 28, 2022

 अग्नि पूजन 
 
दीपावली ,दशहरा ,होली,
 है ये उत्सव प्रमुख हमारे 
 बड़े चाव उत्साह लगन से 
 इन्हें मनाते हैं हम सारे 
 दीपावली को दीप जलाते 
 हरेक दशहरा, जलता रावण 
 दहन होलिका का होली में 
 हर त्यौहार अग्नि का पूजन
 हवन यज्ञ ,अग्नि का वंदन,
 करो आरती ,जलती बाती 
 फेरे सात लिए अग्नि के 
जन्मों की जोड़ी बन जाती 
पका अन्न,अग्नि से खाते ,
जो देता जीवन भर पोषण 
और अंत में इस काया का 
अग्नि में संपूर्ण समर्पण 
मानव जीवन के पल पल में 
सुख हो, दुख हो,उत्सव ,खुशियां,
 अग्नि संचालित करती है 
 जीवन की सारी गतिविधियां

मदन मोहन बाहेती घोटू

Tuesday, October 25, 2022

  प्रतिबंधित जीवन 
 
मुझको मेरी बीमारी ने ,कैसे दिन दिखलाए
ये मत खाओ,वो मत खाओ ,सौ प्रतिबंध लगाये 
 जितना ज्यादा प्रतिबंध है , उतना मन ललचाए 
कितने महीने बीत गए हैं ,चाट चटपटी खाए गरम-गरम आलू टिक्की की, खुशबू सौंधी प्यारी 
भाजी और पाव खाने को तरसे जीभ हमारी 
फूले हुए गोलगप्पे भर खट्टा मीठा पानी 
ठंडे ठंडे दही के भल्ले, पापड़ी चाट सुहानी
प्यारी भेलपुरी बंबइया,बड़ा पाव की जोड़ी 
भूल न पाए भटूरे छोले, जिह्वा बड़ी निगोड़ी 
चीनी चाऊमीन के लच्छे और मूंग के चीले 
गरम समोसे और कचोरी ,बर्गर बड़े रसीले 
कितने दिन हो गए चखे ना मिष्ठानों को भूले 
गरम जलेबी ,गाजर हलवा ,रसमलाई रसगुल्ले 
कब फिर से यह स्वाद चखेंगे,तरसे जीभ हमारी 
हे प्रभु शीघ्र ठीक कर दे तू मेरी सब बीमारी 
हटे सभी प्रतिबंध ठीक से खुल कर जी भर खाऊं
सवा किलो बूंदी के लड्डू का प्रसाद चढ़ाऊं

मदन मोहन बाहेती घोटू
  

Sunday, October 9, 2022

मास्क चढ़ा है  

असली चेहरा नजर न आता 
हर चेहरे पर मास्क के चढ़ा है 
मुंह से राम बोलने वाला ,
छुरी बगल के लिए खड़ा है 

ऊपर जो तारीफ कर रहा 
पीछे से देता है गाली 
कहता है वह सत्यवान है,
 पर करता करतूतें काली 
 खुद को दूध धुला बतला कर ,
महान बताने लिए अड़ा है 
असली चेहरा नजर आता
 हर चेहरे पर मास्क चढ़ा है 
 
तुम्हारा शुभचिंतक बन कर 
 करे तुम्हारी ऐसी तैसी 
 मुश्किल अब पहचान हो गई 
 कौन है बैरी, कौन हितेषी 
 बहुत दोगले इन लोगों से,
 हमको खतरा बहुत बड़ा है
 असली चेहरा नज़र न आता
 हर चेहरे पर मास्क चढ़ा है

होते लोग बहुत शातिर कुछ,
पर दिखते हैं सीधे सादे
औरों का नुक्सान न देखे,
स्वार्थ सिर्फ अपना ही साधे
ऐसे मतलब के मारों से,
किसका पाला नहीं पड़ा है
असली चेहरा नज़र न आता ,
हर चेहरे पर मास्क चढ़ा है

मदन मोहन बाहेती घोटू