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Sunday, March 9, 2025
Saturday, March 8, 2025
कबूतर को दाना
खिलाते जो हम हैं कबूतर को जाना
एक दिन हमारे दिल ने यह जाना
हम जो ये सारा करम कर रहे हैं
जिसे सोचते हम धरम कर रहे हैं
धर्म ऐसा कैसा कमा हम रहे हैं
सभी को निठल्ला बना हम रहे हैं
जिन्हें पेट भरने ,कमाने को दाना
सवेरे को उड़कर के पड़ता था जाना
उन्हें पास मिल जाता है ढेरों दाना
मुटिया रहे जिसको खा वो रोजाना
खिलाने का दाना,करम आपका यह
धर्म का नहीं है, करम पाप का यह
हुए जा रहे हैं आलसी सब कबूतर
फैला रहे गंदगी घर-घर जाकर
मानो न मानो मगर सच यही है
इनकी नस्ल आलसी हो रही है
मदन मोहन बाहेती घोटू
क्या आपने बासीपन इंजॉय किया है?
Friday, March 7, 2025
Thursday, February 27, 2025
बुढ़ापे की रात
देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं
नींद नहीं आती है तो रह रह बतियाते हैं
यह मत पूछो कैसे उनकी रात गुजरती है,
कोशिश करते सोने की पर सो ना पाते हैं
एक दूजे की सभी शिकायत शिकवे जो भी है,
सभी रात को आपस में निपटाए जाते हैं
कभी झगड़ना,गुस्साहोना और मनाना फिर ,
सोने की कोशिश करते,भरते खर्राटे है
कभी पुराने किस्से की फाइल जब खुलती है, भूली बिसरी यादों का आनंद उठाते हैं
मन प्रपंच से हटा, भूल सब बीती बातों को,
बीत गई सो बीत गई ,खुद को समझाते हैं
सुबह आयेगी, खुशी लायेगी, ये उम्मीद लिए,
कुछ पल को सपनों की दुनिया में खो जाते है
देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं
मदन मोहन बाहेती घोटू