Wednesday, January 18, 2012

आठवीं मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता

  आठवीं मंजिल से  भोंकता हुआ कुत्ता
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गली में पट्टा
पर मन में,
स्वच्छंद विचरने की विकलता
रेलिंग से बंधा हुआ,
आठवीं  मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता
मन में छटपटाहट है
या शायद मालिकिन के आने की आहट है
दर्द है या ख़ुशी है
या कोई पीड़ा छुपी है
या जमीन का निरीह प्राणी ,
इतनी ऊँचाई पर पहुँच कर चौंक रहा है
और नीचे वालों को देख कर भोंक रहा है
सुबह ही तो मालकिन ने टहलाया था
अपने नरम नरम हाथों से,
उसके रेशमी बालों को सहलाया था
और खिलाये थे दूध और बिस्कुट
तो चुपचाप उसी प्रेम से अभिभूत
अपनी मालकिन को निहार रहा था
जाने क्या क्या विचार रहा था
प्यार  के उन चंद पलों ने,
उसे बना दिया है उम्र भर का गुलाम
पूंछ हिलाता रहता है ,सुबह शाम
क्या होगी उसकी मानसिकता
किसी अनजान को देख कर झपटता
आठवीं मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, January 16, 2012

उंगलियाँ

         उंगलियाँ
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अंगूठा बस दिखाने  के काम का,
                             काम में पर बहुत आती उंगलियाँ
बालपन में थाम उंगली बढों की,
                             खड़ा कर चलना सिखाती  उंगलियाँ
जवानी  में पकड़ उंगली,पहुंचे तक,
                               पहुँचने की   राह  दिखाती उंगलियाँ
पहन कर के सगाई की अंगूठी,
                                 प्यार बंधन में बंधाती उंगलियाँ    
बाद शादी,बीबियों के इशारों,
                                 पर पति को  है  नचाती  उंगलियाँ
बीबियों की उँगलियों में जादू है,
                                 चटपटा  खाना बनाती उँगलियाँ
स्वाद की मारी हमारी जीभ है,
                                 जी न भरता, चाट जाती उंगलियाँ
चार मौसम,तीन महीने हर एक के,
                                 बरस पूरा है दिखाती उंगलियाँ
बड़ी छोटी,सभी मिल कर साथ है,
                                  एकता हमको सिखाती उंगलियाँ
बंध गयी तो एक मुट्ठी बन गयी,
                                     चपत मिल कर है  लगाती  उंगलियाँ
   आत्म गर्वित पडोसी है अंगूठा,
                                      दूरियां  उससे  बनाती   उंगलियाँ
कुछ उठाने की अगर जरुरत पड़े,
                                      अंगूठे को साथ लाती   उंगलियाँ
  उंगली टेड़ी करने से घी निकलता,
                                      पाठ जीवन का सिखाती  उंगलियाँ
एक उंगली गर किसी को दिखाओ,
                                      तीन है तुमको दिखाती उंगलियाँ
चार उंगली ,चार दिन की जिंदगी,
                                       याद हरदम है  दिलाती उंगलियाँ


मदन मोहन बाहेती'घोटू'



       




       

Friday, January 13, 2012

जल की अनंत यात्रा

जल की अनंत यात्रा
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बादलों में भरा हुआ जल,
जब पानी की बूंदों में बरसता है
तो धरती के दिल में आ बसता है
कुछ सहमा सहमा,
कुए की गहराई में सिमिट कर रह जाता है
कुछ सरोवर में तरंगें भरता है,
तो कुछ नदिया की कल कल में बह जाता है
और कुछ बेचारा,
मुसीबत का मारा,
ठिठुरता है सर्दी में,
और पहाड़ों की चोटियों पर ठहर जाता है
पर जब सूरज को दया आती है,
तो पहाड़ों की जमी बर्फ पिघल जाती है
और इतने दिनों का जमा जल ,जब पिघलता है
तो मचलता ,इठलाता हुआ चलता है
और जवानी के जोश में,
या कहो आक्रोश में,
कितने ही पहाड़ों को काट कर,
अपना रास्ता बनाता है
और अपना एक धरातल पाता है
और कल कल करता हुआ ,
अपनी मंजिल की ओर,
 निकल पड़ता है
पर कई बार ,उसको  ,
ऊंचे धरातल से ,
निचले धरातल पर गिरना पड़ता है
तो वो दहाड़ता है
अपने में सिमटी हुई ,चांदी उगलता है,
गर्जना करता है,
और छोटी छोटी बूंदों में बिखर बिखर,
फिर से ऊपर को उछालें मारता है
और उसे सूरज की कुछ किरणे,
इंद्र धनुष सा चमका देती है
कुछ क्षणों के लिए,सुहावना बना देती है
और फिर बेबस सा,
अपने नए धरातल पर,
धीरे धीरे ,अपनी पुरानी चल से चलने लगता है
कितने ही कटाव और बिखराव के बाद,
अंत में सागर में जा मिलता है
क्योंकि हर जल की नियति ,
सागर में विलीन होना ही होता है
और  फिर से बादल बन ,
जल की अनंत यात्रा का आरम्भ होता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, January 12, 2012

ऐसी प्रीत दिखाओ साजन

ऐसी  प्रीत दिखाओ साजन
बाहुपाश में मुझे बाँध कर,
पिघला दो मेरा सब तन मन
ऐसी प्रीत दिखाओ  साजन
दुखी ह्रदय का त्रास मिटा दो
युगों युगों की प्यास मिटा दो
प्रेम सुधा ऐसी बरसा दो,
भीग जाए मेरा सब तन मन
ऐसी प्रीत दिखाओ साजन
अपने रंग में मुझ को रंग  दो
मन में भर ऐसी उमंग दो
चटका तन के सभी अंग दो,
एसा कस कर बांधो बंधन
ऐसी प्रीत दिखाओ साजन
होठों की सब लाली पिघले
आँखों से कजरा बह निकले
मुंह से बस सिसकारी निकले
एसा दो मुझको आलिंगन
ऐसी प्रीत दिखाओ साजन
मेरा सब कुछ तुमको अर्पण
इक दूजे में पूर्ण समर्पण
जलता मेरे तन का कण कण
प्रीत धार  बरसाओ  साजन
ऐसी प्रीत दिखाओ   साजन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जब जब दिल में दर्द हुआ है

जब जब दिल में दर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
जब भी कोई आपके अपने,
             जिनको आप प्यार करते है
मुंह पर मीठी मीठी बातें,
            पीछे पीठ वार   करते है
जब जब भी बेगानों जैसा,
अपना ही हमदर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
रिश्तों के इस नीलाम्बर में,
               कई बार छातें है बादल                                      
होती है कुछ बूंदा बांदी,
               पर फिर प्यार बरसता निश्छल
शिकवे गिले सभी धुल जाते,
मौसम खुल बेगर्द  हुआ है
जब जब दिल में दर्द हुआ है
गलतफहमियों का कोहरा जब,
                आसमान में छा जाता है
देता कुछ भी नहीं दिखाई ,
                रास्ता नज़र नहीं आता है
दूर क्षितिज में अपनेपन का,
सूरज जब भी जर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
शीत ग्रीष्म के ऋतू चक्र के,
                         बीच बसंत ऋतू आती है  
नफरत के पत्ते झड़ते है ,
                        प्रीत कोपलें मुस्काती है
कलियों और भ्रमरों का रिश्ता,
जब खुल कर बेपर्द  हुआ  है
तब तब दिल में दर्द हुआ है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, January 9, 2012

रियो की रंगीनियों में खो गया मन

रियो की रंगीनियों में खो गया मन
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रियो की रंगीनियों में खो गया मन
बावरा सा ,दिवाना ये हो गया मन
स्वच्छ निर्मल जल,समुन्दर का किनारा
रजत तट  पर देख परियों का नज़ारा
नग्न बदना,रूपसियाँ,देह चिकनी
कर रही अठखेलियाँ,बस पहन बिकनी
देख कर उनका मचलता पूर्ण यौवन
भला विचलित नहीं होगा ,कौनसा मन
धूप में लेटी,तपाती,सुनहरा  तन
रियो की रंगीनियों में खो गया मन
ज़ील है ब्राजील  में और मस्तियाँ  है
और साम्भा नृत्य की तो बात क्या है
रात है रंगीन तो दिन भी हसीं  है
हर तरफ माहोल में  खुशियाँ बसी है
रोज ही त्योंहार सा दिखता नज़ारा
रियो तो है एक सुन्दर शहर प्यारा
सज रहा नव वर्ष में ये बना दुल्हन
रियो की रंगीनियों में खो गया मन
तैरता क्रिसमस ट्री,मन को लुभाता
है शुगर के लोफ सा पर्वत  सुहाता
देख केबल कार से सुन्दर नज़ारा
हरित पर्वत और रियो का शहर सारा
रेल से चढ़ ,पहाड़ पर होता अचंभा
लोर्ड क्राइस्ट का खड़ा स्टेचू लम्बा
बुढ़ापे में जवानी का चढ़ा चन्दन
रियो की रंगीनियों में खो गया मन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

(नव वर्ष पर ब्राज़ील की  यात्रा के दौरान लिखी गयी कविता)

सत्तरवें जन्मदिवस पर

सत्तरवें जन्मदिवस पर
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मन मदन,मस्तिष्क मोहन,मद नहीं और मोह भी ना
और मै बहती हवा सा,सुगन्धित हूँ,मधुर, भीना
कभी गर्मी की तपिश थी,कभी सर्दी थी भयंकर
कभी बारिश की फुहारों का लिया आनंद जी भर
कभी अमृत तो गरल भी,मिला जो पीता गया मै
विधि ने जो भी लिखा उस विधि जीता रहा मै
कभी सुख थे ,कभी दुःख थे,कभी रोता,कभी हँसता
कई जीवन रंग देखे,अब हुआ सत्तर बरस का

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'