Wednesday, December 21, 2011

अनिवासी भारतीय

 अनिवासी  भारतीय
-------------------------
पहाड़,जंगल और गावों को लांघते हुए,
अपने देश की माटी की खुशबू से महकती नदियाँ,
रत्नाकर  की विशालता देख ,
उछलती कूदती ,ख़ुशी ख़ुशी,
समंदर में मिल तो जाती है
पर उन्हें जब,
अपने गाँव और देश की याद आती है,
तो उनकी आत्मा,
समंदर की लहरों की तरह,
बार बार उछल कर,
किनारे की माटी को,
छूने को छटपटाती है
पर जाने क्या विवशता है,
फिर से समुन्दर में विलीन हो जाती है
विदेशों में बसे,
अनिवासी भारतियों का मन भी,
कुछ इसी तरह लाचार है
जब की उन्हें भी,नदियों की तरह,
अपनी माटी से प्यार है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

(ब्राज़ील से यह रचना पोस्ट  कर रहा हूँ-
यहाँ बसे कुछ भारतियों की भावनाये प्रस्तुत करने की
कोशिश है )

Monday, December 19, 2011

रसोई घर-सबसे बड़ी पाठशाला

रसोई घर-सबसे बड़ी पाठशाला
------------------------------------
रसोईघर, सबसे बड़ी पाठशाला है
जहाँ,हर कदम आपको ज्ञान मिलता  निराला है
आपने ,ठीक से गर खाना बनाना सीख लिया
तो समझ लो,सारे जहाँ को जीत लिया
रोटी बनाने की कला,जिंदगी जीने की कला जैसी है  होती
क्योंकि आटे की और पानी की,
 होती है अलग अलग संस्कृती
जैसे सास बहू की या पति पत्नी की
 जब तक पानी  की संस्कृती का,
आटे की संस्कृती से,
सही अनुपात में,
सही ढंग से समावेश नहीं होता
आटा सही ढंग से नहीं गुन्धता है
कई बार जब पानी की संस्कृती ,
ज्यादा जोर मारती है
तो आटा गीला हो जाता है
और किये कराये पर पलीता फिर जाता है
आटा गुथने के बाद,
रोटी बेलना भी एक कला है
प्यार का पलेथन हो,
तो रोटी चकले से नहीं चिपकती
अनुशाशन के बेलन का दबाब,
यदि सब तरफ बराबर हो,
तो रोटियां गोल और समतल बिलती है
और ऐसी गोल रोटियां,फूलती भी अच्छी है
देखने और खाने में भी,बड़ी स्वाद होती है
अगर हम एक तरफ ज्यादा दबाब देंगे ,
और दूसरी  तरफ कम
तो रोटियां ,न तो गोल बनेगी,न फूलेंगी,
बस आपकी फूहड़ता का ही परिचय देंगी
गृहस्थी के गर्म तवे पर,
रोटियां सेकना भी,एक कला जैसी है
समुचित दबाब और हर तरफ बराबर सिकाई,
रोटी को अच्छा फुला देती है
और थोड़ी सी भी लापवाही,
आपके हाथों को,गरम तवे से,
चिपका  कर जला देती है
 जीवन की तरह,रसोईघर में भी,
कई मसाले होते है,
जिनकी सबकी प्रकृति  भिन्न भिन्न है 
कोई तीखा,कोई मीठा,कोई चटपटा या नमकीन है
सही अनुपात में ,सही ढंग से,
मसालों का इस्तेमाल
खाने को बना देता है लज़ीज़ और बेमिसाल
इसी तरह जीवन के रसों का ,सही समन्वय
जीवन को बनाता है,स्वादिष्ट और सुखमय
अगर आपको,आलू की तरह,
हर सब्जी के साथ मिलकर,
उसका स्वाद बढ़ने का आटा है हुनर
तो समझ लो ,गृहस्थी की पाकशाला में,
आपका वर्चस्व कायम रहेगा उम्र भर
और आपका घर ,
सुख और शांति से महकने वाला है
जीवन जीने की यही कला है,
और रसोईघर सबसे बड़ी पाठशाला है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, December 17, 2011

नहीं नामुमकिन कुछ भी

पूजना पाषाण का,पाषाण युग से चल रहा,
पुजते पुजते बन गए ,पाषाण भी है देवता
ये जो नदियाँ बह रही है ,पहाड़ो के बीच से,
चीर  कर पत्थर को पानी ने बनाया रास्ता
आदमी को कोशिशें ,करना निरंतर चाहिये,
रस्सियाँ भी पत्थरो पर ,बना देती है निशां
प्यार का अपने प्रदर्शन,करो तुम करते रहो,
एक दिन तो आप पर ,तकदीर होगी  मेहरबां
नहीं नामुमकिन है कुछ भी,अगर हो सच्ची लगन
आदमी की बाजुओं में ,हो अगर थोडा सा दम
समंदर के पानी पर जब धूप की पड़ती किरण
बादलों में बदल जाता,छोड़ देता खारापन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, December 15, 2011

लगे उठने अब करोड़ों हाथ है

लगे उठने अब करोड़ों हाथ है
----------------------------------
करोड़ों  के पास खाने को नहीं,
                 और नेता करोड़ों में खेलते
झूंठे झूंठे वादों की बरसात कर,
                 करोड़ों की भावना से खेलते
करोड़ों की लूट,घोटाले कई,
                  करोड़ों स्विस बेंक में इनके जमा
पेट फिर भी इनका भरता ही नहीं,
                 लूटने का दौर अब भी ना थमा
  सह लिया है बहुत,अब विद्रोह के,
                  लगे उठने अब करोड़ों हाथ है
क्रांति का तुमने बजाय है बिगुल,
                 करोड़ों, अन्ना,तुम्हारे साथ है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'   

Wednesday, December 14, 2011

शिकवा-शिकायत

शिकवा-शिकायत
-------------------
देख कर अपने पति की बेरुखी,
                   करी पत्नी ने शिकायत इस तरह
हम से अच्छे तुम्हारे 'डॉग' है,
                  घुमाते हो संग जिनको हर सुबह
गाजरों का अगर हलवा चाहिये,
                   गाजरों को पहले किस करना पड़े,
इन तुम्हारे गोभियों के फूल से,
                   भला गुलदस्ता सजेगा किस तरह
सर्दियों में जो अगर हो नहाना,
                    बाल्टी में गर्म पानी चाहिये,
छत पे जाने का तुम्हारा मन नहीं,
                   धूप में तन फिर सिकेगा किस तरह
झिझकते हो मिलाने में भी नज़र,
                    और करना चाहते हो आशिकी,
ये नहीं है सेज केवल फूल की,
                    मिलते पत्थर भी है मजनू की तरह
तड़फते रहते हो यूं किस के लिए,
                   होंश उड़ जाते है किस को देख कर,
किसलिए फिर अब तलक ना 'किस' लिए,
                  प्यार होता है भला क्या इस तरह
कर रखी है बंद सारी बत्तियां ,
                  चाहते हो चाँद को तुम देखना,
छूटती तुमसे रजाई ही नहीं,
                   चाँद का दीदार होगा किस तरह

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

बदनसीबी

        बदनसीबी
       --------------
मुफलिसी की मार कुछ ऐसी पड़ी,
               भूख से बदहाल था सारा बदन
सोचा जाए,धूप खायें,बैठ कर,
               कुछ तो खाया,सोच कर बहलेगा मन
बेमुरव्वत सूर्य भी उस रोज तो,
               देख कर आँखें चुराने लग गया
छुप गया वो बादलों की ओट में,
                बेरुखी ऐसी  दिखाने लग गया   
फिर ये सोचा,हवायें ही खाए हम,
                गरम ना तो चलो ठंडी ही सही
देख हमको वृक्ष ,पत्ते,थम गए,
                 आस खाने की हवा भी ना रही
बहुत ढूँढा,कुछ न खाने को मिला,
                 यही था तकदीर में ,गम खा लिया
प्यास से था हलक सूखा पड़ा ,
                 आसुओं को पिया,मन बहला लिया

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, December 13, 2011

,फेंका जो पत्थर तो हमने फल दिये

आपने हमको बुलाया,आगये,आपने दुत्कार दी,हम चल दिये
हम तो है वो पेड़ जिस पर आपने,फेंका जो पत्थर तो हमने फल दिये
फलो,फूलो ,और हरदम खुश रहो,हमने आशीर्वाद ये हर पल दिये
भले ही हमको सताया,तंग किया,भृकुटियों पर नहीं हमने बल दिये
सीख चलना,थाम उंगली हमारी,अंगूठा हमको दिखा कर चल दिये
क्या पता था कि ढकेंगे उसी को ,सूर्य ने तप कर के जो बादल दिये
जब तलक था तेल हम जलते रहे,दूर अंधियारे सभी ,जल जल किये
हमको ये संतोष है कि आपने,हमको खुशियों के कभी दो पल दिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'