Monday, January 9, 2012

मै

       मै
     -----
कभी नदिया की तरह कल कल बहता हूँ
कभी सागर की लहरों सा उछालें भरता हूँ
कभी बादल की तरह आवारा  भटकता हूँ
कभी बारिश की तरह रिम झिम बरसता हूँ
कभी भंवरों की तरह गीत गुनगुनाता हूँ
कभी तितली की तरह फूलों पे मंडराता हूँ
कभी फूलों की तरह खिलता हूँ,महकता हूँ
कभी पंछी की तरह उड़ता हूँ,चहकता हूँ
कभी तारों की तरह टूट टूट जाता हूँ
कभी पानी के बुलबुलों सा फूट जाता हूँ
कभी सूरज की तरह तेज मै चमकता हूँ
कभी चंदा की तरह घटता और बढ़ता हूँ
मगर ये बात मै बिलकुल न समझ पाता हूँ
मै कौन हूँ,क्या हूँ और क्या चाहता हूँ

मदन मोहन बाहेती;घोटू;

Saturday, January 7, 2012

मुसीबत ही मुसीबत

मुसीबत ही मुसीबत
-----------------------
मौलवी ने कहा था खैरात कर,
              रास्ता है ये ही जन्नत के लिये
वहां जन्नत में रहेंगी हमेशा,
             हूरें हाज़िर तेरी खिदमत  के लिये
ललक मन में हूर की ऐसी लगी,
             आ गये हम मौलवी की बात में
सोच कर जन्नत में हूरें मिलेगी,
            लुटा दी दौलत सभी खैरात में
और आखिर वो घडी भी आ गयी,
               एक दिन इस जहाँ से रुखसत हुए
पहुंचे जन्नत ,वेलकम को थी खड़ी,
              बीबी बन कर हूर,खिदमत के लिये
हमने बोला यहाँ भी तुम आ गयी,
            हो गयी क्या खुदा से कुछ गड़बड़ी
अरे जन्नत में तो मुझ को बक्श दो,
              इस तरह क्यों हो मेरे पीछे पड़ी
बोली बीबी मौलवी का शुक्र है,
              दिया जन्नत का पता मुझको  बता
कहा था उसने की तू खैरात कर,
             पांच टाईम नमाज़ें करके    अता
बताया था होगी जब जन्नत नशीं,
               हूर बन कर फरिश्तों से खेलना
मुझको क्या मालूम था जन्नत में भी,
               पडेगा मुझको ,तुम्ही को झेलना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बेटा हो या बेटी हो


बेटा हो या बेटी हो
--------------------
जो भी इस जग में है आता,
                   बेटा हो या बेटी हो
सबमे भरता प्राण विधाता,
                    बेटा हो या बेटी हो
देता सूर्य रोशनी सबको,
                       बेटा हो या बेटी हो
बांटे चाँद,चांदनी सबको,
                       बेटा हो या बेटी हो
हवा सभी का तन सहलाये,
                         बेटा हो या बेटी हो
प्रकृति सब पर प्यार लुटाये,
                         बेटा हो या बेटी हो
नदिया सबकी,सबके सागर,
                          बेटा हो या बेटी हो
शिक्षा सबको मिले बराबर,
                           बेटा हो या बेटी हो
माँ शिक्षित तो बच्चे शिक्षित,
                           बेटा हो या बेटी हो
मिल कर करें देश को विकसित,
                            बेटा हो या बेटी हो
 मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, January 6, 2012

रियो-कुछ शब्द चित्र

रियो-कुछ शब्द चित्र
------------------------
          १
सागर के तट पर,
अठखेलियाँ करता यौवन
बड़े बड़े दरवाजे,
छोटी सी चिलमन
          २
बूढ़े के आस पास,
दो दो हसीनायें
और दो दो कुत्तों को,
टहलाती  बूढीयायें 
               ३
तैरता क्रिसमस ट्री,
सौ मीटर ऊंचा
तीस लाख बल्बों से,
जगमग समूचा
              ४
हूरों के सपने थे,
पर किस्मत फूटी
मोटी सी महिलायें,
काली कलूटी
              ५
पहाड़ की चोंटी पर,
सातवाँ अजूबा
क्राइस्ट का स्टेचू,
सौ फिट से ऊंचा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

(दक्षिण अमेरिका के बाजील के रिओ शहर की यात्रा
के दौरान लिखे गए कुछ शब्द चित्र आज पोस्ट कर रहा हूँ )

Wednesday, December 21, 2011

अनिवासी भारतीय

 अनिवासी  भारतीय
-------------------------
पहाड़,जंगल और गावों को लांघते हुए,
अपने देश की माटी की खुशबू से महकती नदियाँ,
रत्नाकर  की विशालता देख ,
उछलती कूदती ,ख़ुशी ख़ुशी,
समंदर में मिल तो जाती है
पर उन्हें जब,
अपने गाँव और देश की याद आती है,
तो उनकी आत्मा,
समंदर की लहरों की तरह,
बार बार उछल कर,
किनारे की माटी को,
छूने को छटपटाती है
पर जाने क्या विवशता है,
फिर से समुन्दर में विलीन हो जाती है
विदेशों में बसे,
अनिवासी भारतियों का मन भी,
कुछ इसी तरह लाचार है
जब की उन्हें भी,नदियों की तरह,
अपनी माटी से प्यार है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

(ब्राज़ील से यह रचना पोस्ट  कर रहा हूँ-
यहाँ बसे कुछ भारतियों की भावनाये प्रस्तुत करने की
कोशिश है )

Monday, December 19, 2011

रसोई घर-सबसे बड़ी पाठशाला

रसोई घर-सबसे बड़ी पाठशाला
------------------------------------
रसोईघर, सबसे बड़ी पाठशाला है
जहाँ,हर कदम आपको ज्ञान मिलता  निराला है
आपने ,ठीक से गर खाना बनाना सीख लिया
तो समझ लो,सारे जहाँ को जीत लिया
रोटी बनाने की कला,जिंदगी जीने की कला जैसी है  होती
क्योंकि आटे की और पानी की,
 होती है अलग अलग संस्कृती
जैसे सास बहू की या पति पत्नी की
 जब तक पानी  की संस्कृती का,
आटे की संस्कृती से,
सही अनुपात में,
सही ढंग से समावेश नहीं होता
आटा सही ढंग से नहीं गुन्धता है
कई बार जब पानी की संस्कृती ,
ज्यादा जोर मारती है
तो आटा गीला हो जाता है
और किये कराये पर पलीता फिर जाता है
आटा गुथने के बाद,
रोटी बेलना भी एक कला है
प्यार का पलेथन हो,
तो रोटी चकले से नहीं चिपकती
अनुशाशन के बेलन का दबाब,
यदि सब तरफ बराबर हो,
तो रोटियां गोल और समतल बिलती है
और ऐसी गोल रोटियां,फूलती भी अच्छी है
देखने और खाने में भी,बड़ी स्वाद होती है
अगर हम एक तरफ ज्यादा दबाब देंगे ,
और दूसरी  तरफ कम
तो रोटियां ,न तो गोल बनेगी,न फूलेंगी,
बस आपकी फूहड़ता का ही परिचय देंगी
गृहस्थी के गर्म तवे पर,
रोटियां सेकना भी,एक कला जैसी है
समुचित दबाब और हर तरफ बराबर सिकाई,
रोटी को अच्छा फुला देती है
और थोड़ी सी भी लापवाही,
आपके हाथों को,गरम तवे से,
चिपका  कर जला देती है
 जीवन की तरह,रसोईघर में भी,
कई मसाले होते है,
जिनकी सबकी प्रकृति  भिन्न भिन्न है 
कोई तीखा,कोई मीठा,कोई चटपटा या नमकीन है
सही अनुपात में ,सही ढंग से,
मसालों का इस्तेमाल
खाने को बना देता है लज़ीज़ और बेमिसाल
इसी तरह जीवन के रसों का ,सही समन्वय
जीवन को बनाता है,स्वादिष्ट और सुखमय
अगर आपको,आलू की तरह,
हर सब्जी के साथ मिलकर,
उसका स्वाद बढ़ने का आटा है हुनर
तो समझ लो ,गृहस्थी की पाकशाला में,
आपका वर्चस्व कायम रहेगा उम्र भर
और आपका घर ,
सुख और शांति से महकने वाला है
जीवन जीने की यही कला है,
और रसोईघर सबसे बड़ी पाठशाला है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, December 17, 2011

नहीं नामुमकिन कुछ भी

पूजना पाषाण का,पाषाण युग से चल रहा,
पुजते पुजते बन गए ,पाषाण भी है देवता
ये जो नदियाँ बह रही है ,पहाड़ो के बीच से,
चीर  कर पत्थर को पानी ने बनाया रास्ता
आदमी को कोशिशें ,करना निरंतर चाहिये,
रस्सियाँ भी पत्थरो पर ,बना देती है निशां
प्यार का अपने प्रदर्शन,करो तुम करते रहो,
एक दिन तो आप पर ,तकदीर होगी  मेहरबां
नहीं नामुमकिन है कुछ भी,अगर हो सच्ची लगन
आदमी की बाजुओं में ,हो अगर थोडा सा दम
समंदर के पानी पर जब धूप की पड़ती किरण
बादलों में बदल जाता,छोड़ देता खारापन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'