Sunday, March 18, 2018

       नव संवत्सर 

नए वर्ष का करें स्वागत ,हम ,तुम ,जी भर 
नव संवत्सर,नव संवत्सर ,नव संवत्सर  
हुआ आज दुनिया का उदभव ,ख़ुशी मनाएं 
खेतों में पक गया अन्न नव,ख़ुशी मनाये 
किया विश्व निर्माण विधि  ने ,आज दिवस है 
शीत ग्रीष्म की वय  संधि है ,आज दिवस है 
शुरू   चैत्र  नवरात्र  हुए,कर  देवी    पूजन 
मातृशक्ति और नारी शक्ति का कर आराधन 
हम  समृद्ध       हों,ऊंची उड़े   पतंग हमारी 
खुशियाँ फैले, कायम   रहे     उमंग हमारी 
गुड और इमली ,कालीमिर्च ,नीम की कोंपल 
खाकर रखें,स्वस्थ जीवन को ,पूर्ण वर्ष भर  
आने वाला वर्ष ख़ुशी दे और हो   सुखकर 
नव संवत्सर,नव संवत्सर ,नव संवत्सर 
(नूतन वर्ष की शुभ कामनाएं )

मदन मोहन 'बाहेती घोटू'

Wednesday, March 14, 2018

ओ सी इलेक्शन -सीनियर कनेक्शन 

'बंसल' मुख से सल  गये ,दीवाने  'दीवान '
शर्माजी का 'कपिल' सुत ,होनहार बिरवान 
होनहार  बिरवान ,जीत कर छाई मस्ती 
अस्सी पार अवस्था ,विजयी भये 'अवस्थी '
जीते 'ब्रिगेडियर 'जी ,सत्ता में है कर्नल 
'घोटू 'ओ सी डोर ,थाम अब रहे सीनियर 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Monday, March 12, 2018

मुझे याद आती है दादी 

जब याद आता मुझको बचपन 
बात बात पर जिद पर आना 
पल पल रोना और चिल्लाना 
मुझको  कौन मनाया करता 
दे मिठाई ,बहलाया करता 
अपनी गोदी में थपकी दे   
मुझको कौन सुलाया करता 
हाँ ये सच है ,शुरू शुरू में,
ये सब कुछ करती थी अम्मा 
पर जब छोटी बहन आ गई,
व्यस्त हो गई उसमे अम्मा 
उस पर घर के कामधाम से,
उसके पास समय था इतना कब बच पाता 
सब बच्चों का ख्याल रख सके ,
थक जाती वह इतनी ज्यादा 
और उन दिनों हम दो और 
हमारे दो का ,नहीं नियम था
हर एक घर में पांच सात बच्चों 
के होने का फैशन था  
तो बच्चो का ख्याल अधिकतर ,
तब घर में ,दादी रखती थी 
सब बच्चों पर प्यार लुटाती ,
दादी कभी नहीं थकती थी 
हम उसके ही साथ लिपट कर,
लोरी सुनते,सो जाते थे 
वो ही हमको दूध पिलाती ,
उसके हाथों से ही हम खाना खाते थे
नहाना धोना वस्त्र पहनना ,
हमको दादी ने सिखलाया  
ऊँगली पकड़ी,हमे चलाया 
पहला अक्षरज्ञान  करवाया  
भाई बहन के कई आपसी ,
झगड़ों को उसने सुलझाया 
सब बच्चों की जिद पूरी की,
प्यार किया,हमको दुलराया 
बड़े प्यार से पाला ,पोसा 
मांग हमारी ,पूर्ण करेगी ,
दादी ही,था हमे भरोसा 
खुश होती तो मन बहलाने 
टॉफी या गुब्बारा लाने 
चोरी चुपके दे देती थी ,
हमको आने या दो आने 
उसकी आँखों में ममता का ,
था भंडार,उमड़ता लगता 
कहती उसे मूलधन से भी ,
ब्याज अधिक है प्यारा लगता 
होता अगर हमारा झगड़ा ,
गली मोहल्ले के बच्चों से 
तो वह आगे बढ़ लेती थी 
डाट पिलाती उन बच्चों को ,
और उनकी अम्मा दादी से ,
भी जाकर वो लड़ लेती थी 
हाँ वो प्यारी बूढी दादी 
बाल रुई से गोरा रंग था 
धुंधलाई सी उसकी आँखें ,
जिनमे केवल प्यार बरसता 
अपने हाथों,बना हमें गुड़िया बहलाती 
फटे पुराने कपड़ों से थी गेंद बनाती 
आसपास कोई फंक्शन में ,
अगर बुलावा आता था तो ,
जाती थी,गाने थी गाती  
लड्डू बंटते ,ले आती थी 
बड़े प्रेम से हमें खिलाती 
जब हम करते  थे शैतानी 
हमें मार पड़ती थी खानी 
डांट  मार से हमें पिताजी ,
की थी वो ही हमें बचाती 
हम उसकी गोदी में छिपते ,
उन्हें रोक कर  वो समझाती
और बदले में हमसे केवल ,
अपने हाथ पैर दबवाती 
जब खुश होकर वह मुस्काती 
अपना टूटा  दांत दिखाती 
भोलीभाली,सीधी सादी 
मुझे याद आती है अक्सर ,
वो प्यारी प्यारी सी दादी 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू'
वंदना-अरविन्द परिणय रजत जयंती पर 

प्रभु वंदन कर वंदना ,पाई पति अरविन्द 
जीवन में मुखरित हुआ,प्रेम,ख़ुशी,आनंद 
प्रेम,ख़ुशी,आनंद,मुदित मन वो  हरषाये 
गठ बंधन में बंधे ,बरस पच्चीस  बिताये 
अविनाश सा पुष्प खिला उनके उपवन में 
यही कामना सुख बरसे उनके  जीवन  में 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 

Sunday, March 4, 2018

Re: response to OLAW

 

 

I am Mrs. Fatima Almansoori

I have a business deal for you.

Reply to:  mrsfatima-kindh@email.ch

 

 

 

 

 


From: Axel Schonthal [schontha]
Sent: Tuesday, February 27, 2018 6:31 PM
To: Wang, Weijun
Subject: Re: response to OLAW

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   Axel H. Schönthal, PhD
   Keck School of Medicine
   University of Southern California (USC)

   2011 Zonal Ave., HMR-405


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From: Wang, Weijun < >
Sent: Tuesday, February 27, 2018 5:16:24 PM
To: Axel Schonthal
Subject: RE: response to OLAW

 

Hi.Axel,

 

Please see the "Revised 8. Vertebrate Animals" and the old version.

 

Thank you

Weijun

 

Tuesday, February 27, 2018

आलस 

कार्य हमेशा वह टलता ,जो जाता किया तुरंत नहीं 
                               आलस का कोई अंत नहीं 
आलस ही तो ,सदा काम में ,तुमसे टालमटोल कराता 
करते लोग ,बहानेबाजी ,जब उन पर आलस चढ़ जाता 
काम आज का कल पर टालो ,कल का परसों,परसों का फिर 
और इस तरह,काम कोई भी,पूर्ण नहीं हो पाता  आखिर 
एक बार जो टला ,टल गया ,रहा रुका वह आलस के वश 
क्योंकि जब आलस छा जाता ,हो जाता है मानव बेबस 
सब आराम तलब हो सोते ,उससे बढ़  आनंद नहीं
                                आलस का कोई अंत नहीं 
सर्दी में रजाई और बिस्तर ,नहीं छूटते आलस कारण 
जम कर भोजन अगर कर लिया ,आलस को दे दिया निमंत्रण 
साम्राज्य आलस का छाता ,जिस दिन भी छुट्टी रहती है 
खाना पीना सब बिस्तर पर ,आलस की गंगा बहती है 
देख हमें आलस में डूबा ,डट कर डाटे  श्रीमती जी 
कान हमारे ,जूँ न रेंगती  ,वो रहती है ,खीजी खीजी 
ख़लल कोई मस्ती में डाले ,हमको कभी पसंद नहीं
                                 आलस का कोई अंत नहीं 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
अब तो उमर बची चौथाई 

जीवन भर संघर्ष रत रहे 
किन्तु अग्रसर ,प्रगतिपथ रहे 
खाई ठोकरें,गिरे,सम्भल कर ,
हमने अपनी मंजिल पाई 
अब तो उमर बची चौथाई 
ख़ुशी मिली तो कभी मिले गम 
उंच नीच में गुजरा जीवन 
कभी चबाये चने प्रेम से,
तो फिर कभी जलेबी खाई 
अब तो उमर बची चौथाई 
कोई ने अड़ ,काम बिगाड़ा 
कोई ने बढ़ ,दिया सहारा 
दोस्त मिले ज्यादा ,दुश्मन कम ,
हाथ मिले,ना हाथापाई 
अब तो उमर बची चौथाई 
मोहमाया में ऐसे उलझे 
याद ना रहा ,राम को भजे 
प्रभु ना सुमरे ,उमर काट दी,
गिनने में बस आना ,पाई 
अब तो उमर बची चौथाई 
जर्जर होती ,काया पल पल 
बहुत जुझारू,मगर आत्मबल 
बहुत जरा ने जाल बिछाया ,
लेकिन मुझे हरा ना पाई 
अब तो उमर बची चौथाई 
अब थकान है,बहुत चले हम 
जग ज्वाला में ,बहुत जले हम 
अब जल, अस्थि ,फूल बनेगी ,
गंगा में जायेगी  बहाई 
अब तो उमर बची चौथाई 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'