Tuesday, March 15, 2011

जल

            जल
होता है मानव शरीर में ,सत्तर प्रतिशत से ज्यादा जल
कल कल कर बहती सरिता सा,धीरे धीरे बहता हर पल
कई तरंगें उठती रहती ,जैसे सागर की हो लहरें
लेकिन शांति बनी रहती है ,मन के अन्दर जाकर गहरे
कभी भावना का जलसागर ,शांत सरोवर जैसा रहता
कभी बाढ़ जब आजाती है,तो फिर तोड़ कगारें बहता
लेकिन कुछ बातें होती है,जो की हिला देती अंतर को
तो उठती है लहर सुनामी,तहस नहस करती घर भर को
पूर्ण चन्द्र या चंद्रमुखी को,पास देख मन होता चंचल
होता है मानव शरीर में,सत्तर प्रतिशत से ज्यादा जल
,

Sunday, March 13, 2011

मै तृप्त हो गयी

      मै तृप्त हो गयी
प्यासा था तनमन अन्तरतर
तूने दिया अंजुरी भर जल
          मै तृप्त हो गयी
मेघा घिर घिर कर आते थे
अविरल जल भी बरसाते थे
   मै रहती प्यासी की प्यासी
मेरे मन में अँधियारा था
भले चांदनी उजियारा था
मै अपूर्ण, थी पूरनमासी
तुमने जला प्रेम की बाती
जगमग रातें की मदमाती
            मै तृप्त हो गयी
इस जीवन में सूनापन था
चुप चुप फीका सा जीवन था
      तुम आये तो स्वाद आ गया
तुमने आकर फूल खिलाये
बगिया महकी,हम मुस्काए
      एक नया उन्माद छा गया
जब तुम्हारी खुशबू महकी
तुम भी बहके ,मै भी बहकी
         मै तृप्त हो गयी

विनाश लीला

       
खंड खंड  भूखंड  हो गया
उदधि भी उद्दंड हो गया
ऐसी लहरें आई सुनामी
 सभी तरफ पानी ही पानी
प्रलय नहीं महाप्रलय आ गया
कैसा हाहाकार  छा गया
कांपा धरती का अन्तरतर
लहरों ने भी उठा लिया सर
तिनके जैसे सभी बह गए
घर मकान और किले ढह गए
जब प्रकृति ने कोप दिखाया
तो  जर्रा जर्रा   थर्राया
एसा था कुदरत का तांडव
तिनका तिनका बिखरा वैभव
रूप धरा अग्नि ने भीषण
परमाणु का हुआ विकिरण
जब कांपी जापानी धरती
मानवता थी आहें भरती
जहाँ कभी प्रगति ,विकास था
 सर्वनाश ही सर्वनाश  था
ऐसी विपदा आई भयंकर
उगते सूरज की धरती पर
प्रगति पर प्रकृति है भारी
बेबस मानव की लाचारी

 


Sunday, March 6, 2011

,थकान,थकान, थकान


मचलता  है मन
देखने को दुनिया
पार कर सातों समंदर
छू लूं नये आसमान
यूरोप, अमेरिका
आस्ट्रेलिया, अफ्रीका
थाईलैंड,कनाडा
ग्रीस,रूस,इरान
 आइफ़िल टॉवर की ऊँचाई
चीन की दीवार
मिश्र के पिरेमिड
दिसनिलैंड की दहलाती उड़ान
मियामी के बीच
बहामा का क्रूज़
नियाग्रा का फाल
स्विज़र लैंड के पहाड़ों की ढलान
नये नये  देश
नया नया परिवेश
इशारों में बात चीत
अलग अलग खानपान
बड़ा मज़ा आता है
पर ये क्यों होता है
हर आनंद दायक अनुभूति के बाद
चढ़  जाती है,थकान,थकान, थकान




Friday, February 25, 2011

मैंने तेरा साथ पा लिया

मेने तेरा साथ पा लिया
एक नया विश्वास पा लिया
अंत हो गया शिशिर ऋतू का
बासन्ती मधुमास पा लिया
मन मिलने पर तन मिलते है
तन मिलने पर मन मिलते है
तन मन से मिल कर अनजाना
बन जीवन में खास पा लिया
जीवन पथ सुनसान पड़ा  था
छाया हुआ घना कोहरा था
परेशान राही ने तुमसे
उज्जवल प्रेम प्रकाश पा लिया
आया टूट कहीं से तारा
दूर किया जीवन अँधियारा
थमी हुयी जीवन की गति ने
एक नया आगाज पा लिया
तुझमे भरा हुआ अपनापन
प्यार,त्याग है और समर्पण
महक गया है मेरा जीवन
तुझ सा हमदम पास पा लिया
मैंने तेरा साथ पा लिया

तुम मेरी प्रिय ,प्रियवर,प्रियतम

<h2>हैं अधर मधुर,है बदन मधुर
है रूप मधुर ,यौवन मधुरम
मुस्कान मधुर,है गान मधुर
.तन भी मधुरम, मन भी मधुरम
सुन्दर अलकें,सुन्दर पलकें
सुन्दर आनन्, सुन्दर है तन
सुन्दर नयनम,सुन्दर चितवन
तुम हो सुन्दरतर,सुन्दरतम
तुम रससिक्त ,पूरी रसमय
रसमय बातें ,रसमय चुम्बन
मन हरषाया,जब बरसाया
तुमने मुझ पर,रसमय सावन
हिलना मादक ,मिलना मादक
है श्वास श्वास में मादकपन
तन में प्रकाश, मन में प्रकाश
आलोकित तुमसे ये जीवन
महके तन मन,महके जीवन
तुम हो नंदन वन का चन्दन
तुम्हारे संग ,जीवन में रंग
तुम मेरी प्रिय ,प्रियवर,प्रियतम</h2>