Monday, January 23, 2012

जलेबी-अतुकांत कविता

    जलेबी-अतुकांत कविता
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छंद, स्वच्छंद नहीं होते,
मात्राओं  के बंधन में बंधे हुए ,
तुक की तहजीब से मर्यादित
जैसे रस भरी बून्दियों की तरह,
शब्दों को बाँध कर,
मोतीचूर के लड्डू बनाये गये हो,
और लड्डुओं का गोल गोल होना ,
स्वाभाविक और पारंपरिक  है
पर जब शब्द,
अपने स्वाभाविक वेग से,
उन्मुक्त होकर,
ह्रदय से निकलते है,
तो जलेबी की तरह,
भावनाओं की कढ़ाई में तल कर,
प्रेम की चासनी में डूबे,
रससिक्त और स्वादिष्ट हो जाते है,
और उन पर ,
छंदों की तरह,
आकृति का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता,
और एक सा स्वाद होने के बावजूद भी,
हर जलेबी का,
अपना एक स्वतंत्र  मुखड़ा होता है,
आधुनिक,अतुकांत कविताओं की तरह

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Sunday, January 22, 2012

अहो रूप-महा ध्वनि

अहो रूप-महा ध्वनि
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इक दूजे की करे प्रशंसा,हम तुम ,आओ
मै तुम्हे सराहूं,  तुम मुझे  सराहो
ऊंटों की शादी में जैसे,आये गर्दभ,गायक बन कर
ऊँट सराहे गर्दभ गायन,गर्दभ कहे  ऊँट को सुन्दर
सुनकर तारीफ,दोनों पमुदित,इक दूजे का मन बहलाओ
मै तुम्हे सराहूं,तुम मुझे सराहो
काग चोंच में जैसे रोटी, नीचे खड़ी लोमड़ी, तरसे
कहे  काग से गीत सुनाओ,अपने प्यारे मीठे स्वर से
तारीफ़ के चक्कर में अपने ,मुंह की रोटी नहीं गिराओ
मै तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो
इन झूंठी तारीफों से हम,कब तक खुद को खुश कर लेंगे
ना तो तुम ही सुधर पाओगे,और हम भी कैसे सुधरेंगे
इक दूजे की  कमी बता कर ,कोशिश कर ,सुधारो,सुधराओ
मै  तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, January 19, 2012

मातृभूमि

मातृभूमि 
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हे मातृभूमि तुझको प्रणाम
शत शत प्रणाम,शत शत प्रणाम
तेरी माटी में खेला मै
तेरी माटी  में मैला  मै
तेरी गोदी में बड़ा  हुआ
चलना सीखा और खड़ा हुआ
अ आ इ ई पढना सीखा
बाधाओं से लड़ना  सीखा

गिल्ली डंडा ,कंचे खेले
ये खेल बड़े थे अलबेले
लट्टू ,गेंदा,लंगड़ी घोड़ी
पेड़ों पर चढ़ ,जामुन तोड़ी
सीताफल खाये लगा पाल
दिनभर मस्ती,दिन भर धमाल

आगर की माटी लाल लाल
मेरा अबीर,मेरी गुलाल
मेरी प्रगति मेरा विकास
है सब इस माटी का प्रसाद
लेलो तुम चाहे कोई नाम
हम तो है वो ही घोटू राम
हे मातृभूमि तुझको प्रणाम
शत शत प्रणाम,शत शत प्रणाम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


गुल से गुलकंद

गुल से गुलकंद
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पहले थी तुम कली
मन को लगती भली
खिल कर फूल बनी
तुम खुशबू से सनी
महकाया  जीवन
हर पल और हर क्षण
पखुडी पखुडी खुली
मन में मिश्री  घुली
गुल,गुलकंद हुआ
उर आनंद   हुआ
असर  उमर का पड़ा
दिन दिन प्यार बढ़ा
कली,फूल,गुलकंद
हरदम रही   पसंद
खुशबू प्यार भरी
उम्र यूं ही गुजरी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, January 18, 2012

आठवीं मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता

  आठवीं मंजिल से  भोंकता हुआ कुत्ता
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गली में पट्टा
पर मन में,
स्वच्छंद विचरने की विकलता
रेलिंग से बंधा हुआ,
आठवीं  मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता
मन में छटपटाहट है
या शायद मालिकिन के आने की आहट है
दर्द है या ख़ुशी है
या कोई पीड़ा छुपी है
या जमीन का निरीह प्राणी ,
इतनी ऊँचाई पर पहुँच कर चौंक रहा है
और नीचे वालों को देख कर भोंक रहा है
सुबह ही तो मालकिन ने टहलाया था
अपने नरम नरम हाथों से,
उसके रेशमी बालों को सहलाया था
और खिलाये थे दूध और बिस्कुट
तो चुपचाप उसी प्रेम से अभिभूत
अपनी मालकिन को निहार रहा था
जाने क्या क्या विचार रहा था
प्यार  के उन चंद पलों ने,
उसे बना दिया है उम्र भर का गुलाम
पूंछ हिलाता रहता है ,सुबह शाम
क्या होगी उसकी मानसिकता
किसी अनजान को देख कर झपटता
आठवीं मंजिल से भोंकता हुआ कुत्ता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, January 16, 2012

उंगलियाँ

         उंगलियाँ
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अंगूठा बस दिखाने  के काम का,
                             काम में पर बहुत आती उंगलियाँ
बालपन में थाम उंगली बढों की,
                             खड़ा कर चलना सिखाती  उंगलियाँ
जवानी  में पकड़ उंगली,पहुंचे तक,
                               पहुँचने की   राह  दिखाती उंगलियाँ
पहन कर के सगाई की अंगूठी,
                                 प्यार बंधन में बंधाती उंगलियाँ    
बाद शादी,बीबियों के इशारों,
                                 पर पति को  है  नचाती  उंगलियाँ
बीबियों की उँगलियों में जादू है,
                                 चटपटा  खाना बनाती उँगलियाँ
स्वाद की मारी हमारी जीभ है,
                                 जी न भरता, चाट जाती उंगलियाँ
चार मौसम,तीन महीने हर एक के,
                                 बरस पूरा है दिखाती उंगलियाँ
बड़ी छोटी,सभी मिल कर साथ है,
                                  एकता हमको सिखाती उंगलियाँ
बंध गयी तो एक मुट्ठी बन गयी,
                                     चपत मिल कर है  लगाती  उंगलियाँ
   आत्म गर्वित पडोसी है अंगूठा,
                                      दूरियां  उससे  बनाती   उंगलियाँ
कुछ उठाने की अगर जरुरत पड़े,
                                      अंगूठे को साथ लाती   उंगलियाँ
  उंगली टेड़ी करने से घी निकलता,
                                      पाठ जीवन का सिखाती  उंगलियाँ
एक उंगली गर किसी को दिखाओ,
                                      तीन है तुमको दिखाती उंगलियाँ
चार उंगली ,चार दिन की जिंदगी,
                                       याद हरदम है  दिलाती उंगलियाँ


मदन मोहन बाहेती'घोटू'



       




       

Friday, January 13, 2012

जल की अनंत यात्रा

जल की अनंत यात्रा
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बादलों में भरा हुआ जल,
जब पानी की बूंदों में बरसता है
तो धरती के दिल में आ बसता है
कुछ सहमा सहमा,
कुए की गहराई में सिमिट कर रह जाता है
कुछ सरोवर में तरंगें भरता है,
तो कुछ नदिया की कल कल में बह जाता है
और कुछ बेचारा,
मुसीबत का मारा,
ठिठुरता है सर्दी में,
और पहाड़ों की चोटियों पर ठहर जाता है
पर जब सूरज को दया आती है,
तो पहाड़ों की जमी बर्फ पिघल जाती है
और इतने दिनों का जमा जल ,जब पिघलता है
तो मचलता ,इठलाता हुआ चलता है
और जवानी के जोश में,
या कहो आक्रोश में,
कितने ही पहाड़ों को काट कर,
अपना रास्ता बनाता है
और अपना एक धरातल पाता है
और कल कल करता हुआ ,
अपनी मंजिल की ओर,
 निकल पड़ता है
पर कई बार ,उसको  ,
ऊंचे धरातल से ,
निचले धरातल पर गिरना पड़ता है
तो वो दहाड़ता है
अपने में सिमटी हुई ,चांदी उगलता है,
गर्जना करता है,
और छोटी छोटी बूंदों में बिखर बिखर,
फिर से ऊपर को उछालें मारता है
और उसे सूरज की कुछ किरणे,
इंद्र धनुष सा चमका देती है
कुछ क्षणों के लिए,सुहावना बना देती है
और फिर बेबस सा,
अपने नए धरातल पर,
धीरे धीरे ,अपनी पुरानी चल से चलने लगता है
कितने ही कटाव और बिखराव के बाद,
अंत में सागर में जा मिलता है
क्योंकि हर जल की नियति ,
सागर में विलीन होना ही होता है
और  फिर से बादल बन ,
जल की अनंत यात्रा का आरम्भ होता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'