Wednesday, February 29, 2012

अबीर गुलाल
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तेरा अबीर ,तेरी गुलाल,
सब लाल लाल, सब लाल लाल
उस मदमाती सी होली में
जब ले गुलाल की झोली मै
       आया तुम्हारा मुंह रंगने
तुम सकुचाई सी बैठी थी
कुछ शरमाई  सी बैठी थी
      मन में भीगे भीगे सपने
मैंने बस हाथ बढाया था
तुमको छू भी ना पाया था
      लज्जा के रंग  में डूब गये,
      हो गये लाल,रस भरे गाल
तेरा अबीर ,तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल लाल
मेंहदी का रंग हरा लेकिन,
जब छूती है तुम्हारा  तन,
       तो लाल रंग आ जाता है
इन काली काली आँखों में,
प्यारी कजरारी आँखों में,
      रंगीन जाल छा जाता  है
चूनर में लाली लहक रही,
होठों पर लाली दहक  रही
     हैं खिले कमल से कोमल ये,
      रखना  संभाल,पग  देख भाल
तेरा अबीर,  तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'




Tuesday, February 28, 2012

सपन तू मत देख रे मन

सपन तू मत देख रे  मन
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सपन तू मत देख रे मन, अगर टूटे ,पीर होगी
तुझे बस वो ही मिलेगा, जो तेरी तकदीर  होगी
नींद में कर बंद आँखें,ख्वाब कितने ही सजा  ले
कल्पनाओं के महल में,हो ख़ुशी,जी भर ,मज़ा ले
पर खुलेगी आँख,होगा ,हकीकत से सामना  जब
आस के विपरीत ही ,अक्सर मिलेगा,हर जना तब
चुभेगी तेरे ह्रदय को,बात हर शमशीर  होगी
सपन तू मत  देख रे मन,अगर टूटे ,पीर   होगी
ना किसी से मोह रख  तू,ना किसी की चाह रखनी
आस तू मत कर किसी से,आस तो है  महा ठगिनी
अपेक्षा जब टूटती है,  तोड़ देती  है ह्रदय को
चक्र ये सब भाग्य का  है,कौन रोकेगा समय को
यूं न मिलने आये कोई,मरोगे तो भीड़  होगी
सपन तू मत देख रे मन,अगर टूटे,पीर होगी
सर्दियों की धूप मनहर,ग्रीष्म  में बदले  तपन में
नहीं दुःख में,ख़ुशी में भी,अश्रु बहते है नयन में
नहीं चिर सुख,नहीं चिर दुःख,जिंदगी के इस सफ़र में
फूल है तो कई कांटे ,भी भरे है ,इस डगर में
रात है ,तो कल सुबह भी,अँधेरे  को चीर होगी
सपन तू मत देख रे मन,अगर टूटे,पीर होगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, February 25, 2012

ऋतू परिवर्तन

ऋतू परिवर्तन
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अब गया है बदल मौसम
तपन आई,गयी ठिठुरन
हुआ सत्ता परिवर्तन
कहीं खुशिया तो कहीं गम
जो नरम और गुदगुदी थी
प्यार ,उष्मा से लदी थी
कई रातें ,तन चड़ी जो
उपेक्षित सी ,अब पड़ी वो
हुई तनहा सी रजाई
ग्रीष्म की अब ऋतू आई
गर्म शालें और स्वेटर
गर्व से थे सजे तन पर
अब दुबक,सिमटे पड़े है
दुखी से लगते  बड़े है
देख कर के बदन सुन्दर
गर्म थे जो कभी गीजर
अब न विद्युत् तरंगे  है
स्नान घर में बस टंगे है
तेल नरियल का सुगन्धित
हुआ एसा शीत शापित
श्वेत हिम सा था गया जम
पर गया जब बदल मौसम
अब पिघलने लग गया है
पा पुनर्जीवन  गया है
और छत पर मौन लटके
हुए थे निर्जीव पंखे
पंख फैले,उड़ न  पाते
मगर अब है फरफराते
नाचते है संग हवा के
नया जीवन,पुनः पाके
रूपसियों का सुहाना
रूप का सुन्दर खजाना
हो कहीं गायब गया था
वसन से सब ढक गया था
ग्रीष्म ऋतु ने मगर आकर
कर दिया है सब उजागर
जल बहुत था दुखी ,बेकल
ठिठुरते थे,हाथ छूकर
आजकल इठला रहा है
सभी के मन भा रहा है
स्वेद बन गौरी बदन पर
बह रहा है,बड़ा  चंचल
कहीं खुशियाँ है कही गम
अब गया है बदल मौसम

मदन मोहन बहेती'घोटू'

संतरा

            संतरा
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धरा सा आकार सुन्दर,अरुण सी आभा सुशोभित
वेद का,उपनिषद का सब,ज्ञान फांकों सा सुसज्जित
और फांकों में समाये, वेद सब ,सारी ऋचायें
ज्ञान कण कण में,वचन से ,प्यास जीवन की बुझाये
फांक का हर एक दाना, मधुर जीवन रस भरा  है
संत के सब गुण  समाहित,इसलिए ये संतरा  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, February 22, 2012

कल्कि अवतार का मत करो इन्तजार

कल्कि अवतार का मत करो इन्तजार
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पुराण बतलाते है
जब जब धर्म की हानि होती है,
भगवान अवतार ले कर आते है
त्रेता में राम का रूप धर कर अवतार लिया
द्वापर में कृष्ण रूप में प्रकटे,
और दुष्टों का संहार किया
पर आजकल,इस कलयुग में,धर्म की हानि नहीं,
धर्म का विस्तार हो रहा है
जिधर देखो उधर धर्म ही धर्म,
का प्रचार हो रहा है
भागवत कथाएं,
गाँव गाँव शहर,कस्बो में,
टी.वी. के कई चेनलों में,
साल भर चलती है
कितनी भीड़ उमड़ती है
भागवत कथा सुन कर कितने ही श्रोताओं में,
मोक्ष की आस जगी है
तीर्थो में उमड़ती भीड़ को देखो,
सब में पुण्य कमाने की होड़ लगी है
मंदिरों में आजकल इतने लोग जाते है
कि भक्तों को दर्शन देते देते,
भगवान भी थक जाते है
तब सांवरिया सेठ का रूप धर,
भगवान ने नानीबाई का मायरा भरा था
अपने भक्त नरसी मेहता पर उपकार करा था
आज कल कई सेठ,
कितनी ही गरीब कन्याओं का,
सामूहिक विवाह करवाते है
और भरपूर पुण्य कमाते है
तब एक श्रवण कुमार ने,
अपने बूढ़े माता पिता को,
तीर्थ यात्रा करवाई थी,
कांवड़ में बिठा कर
आज कितने ही श्रवण  कुमार,
अपने बूढ़े माता पिता को,
तीर्थ यात्रा करवाते है,
हेलिकोफ्टर  में बिठा कर
पहले आदमी जब गया तीर्थ था जाता,
तो गया गया सो गया ही गया था कहा जाता
और आज कल गया जानेवाला,
सुबह गया जाता है,
और शाम तक वापस भी लौट आता है
धर्म का लगाव बढ़ता ही जा रहा है
लोगों में भक्ति भाव ,बढ़ता ही जा रहा है
तो जो लोग कल्कि अवतार का इन्तजार कर रहें है
बेकार कर रहे है
क्योंकि जब इतनी धार्मिक भावनायें,
भारत में जागृत है
तो भगवान को अवतार लेने की क्या जरुरत है?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, February 20, 2012

अरे ओ औलाद वालों!

अरे ओ औलाद वालों!
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अरे ओ औलाद वालों,
बुजुर्गों को मत प्रताड़ो
आएगा तुम पर बुढ़ापा,
जरा इतना तो विचारो
जिन्होंने अपना सभी कुछ,तुम्हारे खातिर लुटाया
तुम्हारा जीवन संवारा,रहे भूखे,खुद न खाया
तुम्हारी हर एक पीड़ा पर हुआ था दर्द जिनको
आज कर उनकी उपेक्षा,दे रहे क्यों पीड़ उनको
बसे तुम जिनके ह्रदय में,
उन्हें मत घर से निकालो
अरे ओ औलाद वालों !
समय का ये चक्र ऐसा,घूम कर आता वहीँ है
जो करोगे बड़ो के संग,आप संग होना वही है
सूर्य के ही ताप से जल,वाष्प बन,बादल बना है
ढक रहा है सूर्य को ही,गर्व से इतना तना  है
बरस कर फिर जल बनोगे,
गर्व को अपने संहारो
अरे ओ औलाद वालों!
बाल मन कोमल न जाने,क्या गलत है,क्या सही है
देखता जो बड़े करते,बाद में करता वही  है
इस तरह संस्कार पोषित कर रहे तुम बालमन के
बीज खुद ही बो रहे,अपने बुढ़ापे  की घुटन के
क्या गलत है,क्या सही है,
जरा अपना मन खंगालो
अरे ओ औलाद वालों!

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Sunday, February 19, 2012

बसंत आ रही है

बसंत आ रही है
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पहले सुबह,
ओस की चादर से,
धीरे धीरे अपना मुख उघाडती थी
ठंडी,ठंडी,अलसाई सी,
देर से जागती  थी
अंगडाइयाँ  ले लेकर,
उबासियाँ  लिया करती थी
उठ कर सबसे पहले,
गरम चाय का प्याला पिया करती थी
पहले सबसे प्यारा,
रजाई और बिस्तर लगता था
सुबह सुबह,
ठंडा पानी छूने में भी  डर लगता था
पर आज सुबह,
उजली उजली सी,
नहा धोकर,
खुले खुले वस्त्र पहने,मुस्करा रही है
क्या बसंत ऋतू आ रही है

मदन मोहन बहेती'घोटू'