Monday, June 19, 2017

फादर डे 

हमारा बेटा ,अपनी व्यस्तता के कारण ,
फादर डे पर मिलने तो नहीं आया 
पर याद रख के एक पुष्पगुच्छ भिजवाया 
हमने फोन किया बरखुरदार 
धन्यवाद,भेजने को ये उपहार 
और दिखाने को अपना प्यार 
साल में एक बार जो इस तरह ,
फादर डे  मना लोगे
एक पुष्पगुच्छ भेज कर ,
अपना कर्तव्य निभा लोगे 
क्या इससे ही अपना पितृऋण चूका लोगे 
तुम्हारी माँ ,तुम्हारे इस व्यवहार से ,
कितना दुखी होती है 
छुप छुप कर रोती  है 
तुम्हे क्या बतलायें ,बुढ़ापे में ,माँ बाप को,
संतान के प्यार और सहारे की 
कितनी जरूरत होती है 
बेटे का जबाब आया 
पापा,हमने एक दिन ही सही ,
फादर डे तो मनाया 
पर क्या कभी आपने 'सन डे 'मनाया 
हमने  कहा बेटा ,हम सप्ताह में एक बार ,
और साल में बावन बार ,'सन डे 'मनाते है 
तुम्हे मिस करते है ,मन को बहलाते है 
और रिटायरमेंट के बाद तो,
हमारा हर दिन ही 'सन डे 'जैसा है 
हर माँ बाप के दिल में ,
बचपन से लेकर अंत तक ,
अपनी संतान के प्रति प्यार ,
भरा रहता  हमेशा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
यादें पुरानी

यादें पुरानी कितनी ,जब साथ दौड़ती है 
तुम लाख  करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 
रातों को जब अचानक ,जाती है आँख खुल तो,
फिर सोने नहीं देती,इतना  झंझोड़ती  है 

कुछ घड़ियाँ वो ख़ुशी की ,कुछ पल पुराने गम के,
जो दबे ,छुप के  रहते , कोने में किसी  मन के 
कुछ घाव  पुराने से ,हो जाते फिर हरे  है 
जिनकी कसक से आंसू ,आखों में फिर भरें है 
रह रह के वो हमारे ,मन को मरोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

 वो प्यार पहला पहला ,जब नज़र लड़ गयी थी 
रातों को जागने की , आदत सी   पड़  गयी थी 
 वो उनका रूठ जाना ,वो दिल का टूट जाना 
वो चुपके अकेले में ,आंसू का   फिर  बहाना 
कोई की बेवफाई ,जब दिल को  तोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश ,पीछा न छोड़ती है 

वो भूल जवानी की ,रो रो के फिर संभलना 
बंधन में बंध किसी संग ,फिर साथ साथ चलना 
बच्चों की करना शादी,और उनके घर बसाना 
फिर सारे परिंदों का ,पिंजरे को छोड़  जाना 
  तनहाई बुढ़ापे में , मन को कचोटती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
लिमिट में प्यार करो बीबी से 

अपनी बीबी से करो प्यार मगर बस इतना 
कि जो आसानी से पच जाये केवल बस उतना 
मिठाई ही मिठाई जो ,मिले  रोज खाने को 
विरक्ति मीठे से होती ,मिठाई के दीवाने को 
इस तरह प्यार का जो 'ओवर डोज' मिलता हो 
बिना मांगे ही अगर  रोज रोज  मिलता  हो 
सोच कर ये कि इससे बीबी रीझ जाती है 
हक़ीक़त ये है इससे बीबी खीझ  जाती  है 
इसलिए ढेर सारा प्यार नहीं बरसाओ 
थोड़ा सा प्यार करो,थोड़ा थोड़ा तरसाओ 
हमेशा पत्नी का पल्लू पकड़ के मत बैठो 
लिमिट में प्यार करो,थोड़ा झगड़ो और ऐंठो 
मिठाई साथ में ,नमकीन भी ,जरूरी है 
बढाती प्यार की है प्यास ,कभी दूरी है 
सताओ ऐसे ,उसके मन में आग लग जाए 
प्यार पाने उसके मन में तलब  जग जाए 
आग हो दोनों तरफ ,मज़ा जलने में  आता 
चाह हो दोनों तरफ,मज़ा मिलने में  आता 

मदन मोहन बाहत'घोटू' 
पिताजी आप अच्छे थे 

संवारा आपने हमको ,सिखाया ठोकरे सहना 
सामना करने मुश्किल का,सदा तत्पर बने रहना 
अनुभव से हमें सींचा ,तभी तो हम पनप पाये 
जरासे जो अगर भटके ,सही तुम राह पर लाये 
मिलेगी एक दिन मंजिल ,बंधाया हौंसला हरदम 
बढे जाना,बढे जाना ,कभी थक के न जाना थम 
जहाँ सख्ती दिखानी हो,वहां सख्ती दिखाते थे 
कभी तुम प्यार से थपका ,सबक अच्छा सिखाते थे 
तुम्हारे रौब डर  से ही,सीख पाए हम अनुशासन 
हमें मालुम कितना तुम,प्यार करते थे मन ही मन 
सरल थे,सादगी थी ,विचारों के आप सच्चे थे 
तभी हम अच्छे बन पाए ,पिताजी आप अच्छे थे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
तीन चौके 
१ 
अभी तो झेलना हमको, कई  तूफ़ान  बाकी  है 
चुकाने लोगों के अब तक,किये अहसान बाकी है 
जिन्होंने पीठ के पीछे,किया है  वार चुपके से ,
बहुत से ऐसे मित्रों की ,अभी पहचान  बाकी  है 
२ 
बड़े स्वादिष्ट होते ,दिल ,सभी का लूटते लड्डू 
अगर पुरसे हो थाली में,नहीं फिर  छूटते  लड्डू 
ख़ुशी,शादी के मौके पर ,सभी में बांटे जाते है,
हसीना कोई मुस्काती  ,तो मन में फूटते लड्डू 
३ 
अभी तक ये मेरी समझ में ये न आया 
 मेरी पोस्ट पर तुमने ,'थम्प्सअप 'लगाया     
ये मेरे विचारों की  तारीफ़ की  है ,
या फिर तुमने मुझको ,अंगूठा दिखाया 

घोटू 

Saturday, June 17, 2017

बुढ़ापा -तीन लघु  कवितायें 

१ 
ज्यों ज्यों ये उमर आदमी की आगे बढे है 
त्यों त्यों ये भूत आशिक़ी का सर पे चढ़े है 
हम तो पढ़ा करें है अलिफ़ लैला के किस्से,
बीबी हमारी , गीता,भागवत  जी ,पढ़े है 
अंकलजी कह के तोड़ देवे दिल वो हमारा ,
जिसकी भी मोहब्बत हमें परवान  चढ़े है 
दिल फेंकने की आदत ,नहीं हमसे छूटती ,
मालूम है इस खेल में , जूते भी पड़े है 

२ 
हमको क्यों बूढा समझते आप है 
ये  हमारे  साथ  ना  इन्साफ   है 
गहरा जल बहता सदा चुपचाप है 
हौंसलों का  नहीं  होता   माप  है 
ढोलकी  में बची अब भी थाप है 
जिंदादिल बंदा ये लल्लनटॉप  है 
जवानी है आप में तो क्या हुआ ,
अरे हम तो जवानो के बाप  है 
३ 
सहा हमने जो नहीं है ,कौनसा वो गम है बाकी 
जमाने के ,अभी सहना ,और भी है सितम बाकी 
यूंही बूढ़ा समझ कर के ,तिरस्कृत मत करो हमको,
अरे इस बुझते  दिए में ,अभी भी  दमखम है बाकी 

घोटू 

Thursday, June 15, 2017

रंग भेद की दरार

एक गेंहूं है ,एक चावल है ,
दोनों ही सबका पेट भर रहे है
दोनों ही अन्न है ,
पर लोग उनमे अंतर कर रहे है
गेंहूं का रंग भूरा है और चावल सफ़ेद है
इसलिए गेंहूं के साथ ,हमेशा होता रंगभेद है
वह बेचारा गौरवर्णी नहीं,
इसलिए हमेशा उसका दलन किया जाता है
उसे पीसा जाता है ,
उसका उत्पीड़न किया जाता है
और जब वो पिस कर आटे या मैदा जैसा ,
सफ़ेद नहीं हो जाता है
तब ही वो खाने के काम में आता है
हिन्दुस्थान में उससे रोटी,पूरी,परांठा ,
और हलवा बनाते है
विदेशी उसकी ब्रेड ,नूडल ,पिज़ा और पास्ता ,
बना कर खाते है
गेंहू ,अपना आकार खोकर  ,
हमेशा देते है अपना बलिदान
और सबका पेट भरते है ,
सेवा भावी है महान
पर फिर भी पूजा में उसे कलश के नीचे बिछाते है
और गौरवर्णी चावल को ,प्रभु पर चढ़ाते है
गेहूं पिस कर होता है क्षत विक्षत
और चावल रहता है अक्षत
गोरा,सफ़ेद ,सुन्दर,
पूरा का पूरा ही  पकाया जाता है
कभी पुलाव,कभी बिरयानी ,और अक्सर,
सादा  ही खाया जाता है
खिली खिली सी उसकी रंगत ,
और उसकी मुलायम सी सूरत
अनोखा स्वाद देती है ,जो मन को भाता है
और जब उसे दूध में पकाते है ,
तो खीर बन कर चौगुना स्वाद आता है
कभी मीठे केसरी भात ,
या कभी खिचड़ी बना कर उसे जाता है परोसा
तो कभी उससे इडली बनती है
और कभी बनता है डोसा
मस्तक पर तिलक लगा कर अक्षत से सजाते है
चावल के खाने को राजसी बतलाते है
देख कर के इस तरह का रंग भेद
और पक्षपाती व्यवहार
गेंहूं के मन में पद गयी है दरार
जिसका असर बाहर से भी
,उसके हर दाने पर है दिखता
जाने कब जायेगी ,हमारे दिलों से,
रंगभेद की ये मानसिकता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'