Monday, September 3, 2018

कबड्डी का खेल-हमारा मेल 

तुमने खूब कब्बडी खेली ,
हूँ तू तू कहते तुम मेरे पाले में आये 
इसको छुवा,उसको छुवा ,
लेकिन मुझको हाथ लगा भी तुम ना पाए 
वो मैं ही थी कि जिसने आगे बढ़ कर 
रोक लिया था तुम्हे तुम्हारा हाथ पकड़ कर 
और मेरे जिन हाथों को तुम कहते कोमल 
उन हाथों ने रखा देर तक तुम्हे जकड़ कर 
हुआ तुम्हारा हू तू कहना बंद,
 और तुम आउट होकर  हार गए  थे 
लेकिन तुमने जीत लिया था मेरे दिल को ,
और तुम बाजी मार गए थे 
पर मैं जीती और तुम हारे 
स्वर्ण पदक सी वरमाला बन ,
लटक गयी मैं गले तुम्हारे 
तब से अब तक ,मेरे डीयर 
घर से दफ्तर ,दफ्तर से घर 
रोज कबड्डी करते हो तुम 
और मैं घर में बैठी गुमसुम 
रहती हूँ इस इन्तजार में 
वही पुराना जोश लिए तुम डूब प्यार में 
हूँ तू करते कब आओगे ,
और मैं कब पकड़ूँगी तुमको 
अपने बाहुपाश में कब जकड़ूँगी तुमको 
पर तुम इतने पस्त थके से अब आते हो 
खाना खाते  ,सो जाते हो 
वह चंचल और चुस्त खिलाडी फुर्तीला सा 
कहाँ  खो गया ,रोज पड़ा रहता ढीला सा 
जी करता बाहों में लेलो 
फिर से कभी कबड्डी खेलो 

घोटू 

मौसमी मिठाइयां 

बारह महीने रसगुल्लों के ,हर दिन काजू की कतली का 
आनंद कलाकंद का हरदम ,हर मौसम होता रबड़ी का 
लगते गुलाब जामुन प्यारे ,हो सर्दी गर्मी ,कुछ मौसम 
और गरम जलेबी का जलवा , मुख में रस भरता है हरदम 
मौसम कुछ ख़ास मिठाई का ,होता कुछ ख़ास महीनो में
ज्यों घेवर ,तेवर दिखलाता ,सावन भादौ के महीनो  में  
सर्दी में 'पिन्नी ' मतवाली ,गाजर का गरम गरम हलवा 
और तिल की गजक रेवड़ी भी ,सर्दी में दिखलाती जलवा 
हो गरम दूध ,उसमे फेनी ,सर्दी का ब्रेकफास्ट सुंदर 
ठंडी कुल्फी ,आइसक्रीम ,कम करती गर्मी के तेवर 
है सदाबहार समोसे जी ,इनका ना घटता आकर्षण 
और चाय और पकोड़ों का ,तो हरदम ही रहता मौसम 

मदन मोहन बाहेती;घोटू '
       हम भी कैसे है?

प्रार्थना करते ईश्वर से ,घिरे बादल ,गिरे पानी,
          मगर बरसात  होती है तो छतरी तान लेते है 
बहुत हम चाहते  है कि चले झोंके हवाओं के ,
           हवा पर चलती जब ठंडी ,बंद कर द्वार लेते है 
हमारी होती है इच्छा ,सुहानी धूप खिल जाये ,
            मगर जब धूप खिलती है,छाँव में  भाग जाते है
 देख कर के हसीना को,आरजू करते पाने की,
           जो मिल जाती वो बीबी बन,गृहस्थी में जुटाते है 
हमेशा हमने देखा है,अजब फितरत है इन्सां की  ,
           न होता पास जो उसके  ,उसी की चाह करता  है 
मगर किस्मत से वो सब कुछ ,उसे हासिल जो हो जाता ,
          नहीं उसकी जरा भी  फिर,कभी परवाह करता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'  
  कान्हा -बुढ़ापे में 

कान्हा बूढ़े,राधा बूढी ,कैसी गुजर रही है उन पर
बीते बचपन के गोकुल में,दिन याद आते है रहरह कर  
माखनचोर,आजकल बिलकुल ,नहीं चुरा,खा पाते मख्खन 
क्लोस्ट्राल बढ़ा,चिकनाई पर है लगा हुआ प्रतिबंधन 
धर ,सर मटकी,नहीं गोपियाँ,दूध बेचने जाती है अब 
कैसे मटकी फोड़ें,ग्वाले,बेचे दूध,टिनों में भर  सब  
उनकी सांस फूल जाती है ,नहीं बांसुरी बजती ढंग से 
सर्दी कहीं नहीं लग जाए ,नहीं भीगते ,होली  रंग से 
यूं ही दब कर ,रह जाते है,सारे अरमां ,उनके मन के 
चीर हरण क्या करें,गोपियां ,नहा रही 'टू पीस 'पहन के 
करना रास ,रास ना आता ,अब वो जल्दी थक जाते है 
'अंकल'जब कहती है गोपी,तो वे बहुत भड़क जाते है 
फिर भी बूढ़े ,प्रेमीद्वय को,काटे कभी प्रेम का कीड़ा 
यमुना मैली, स्विंमिंगपूल में ,करने जाते है जलक्रीड़ा 

मदनमोहन बाहेती'घोटू'  
           कृष्णलीला 

कन्हैया छोटे थे एक दिन,उन्होंने खाई  थी माटी 
बड़ी नाराज होकर के ,  यशोदा मैया थी   डाटी 
'दिखा मुंह अपना',कान्हा ने ,खोल मुंह जब दिखाया था 
तो उस मुंह में यशोदा को ,नज़र ब्रह्माण्ड   आया था 
मेरी बीबी को भी शक था ,   मिट्टी बेटे ने है खाई 
खुला के मुंह जो देखा तो,उसे   दुनिया  नज़र आयी 
कहीं 'चाइनीज ' नूडल थी,कहीं 'पॉपकॉर्न 'अमरीकी'
कहीं थे 'मेक्सिकन' माचो,कहीं चॉकलेट थी 'स्विस 'की 
कहीं 'इटली'का पीज़ा था,कहीं पर चीज 'डेनिश'  थी 
कहीं पर 'फ्रेंच फ्राइज 'थे,कहीं कुकीज़ 'इंग्लिश 'थी 
गर्ज ये कि  मेरे बेटे के ,मुंह  में दुनिया   थी  सारी
यशोदा सी मेरी बीबी , बड़ी अचरज की थी मारी 
वो बोली लाडला अपना ,बहुत  ही गुल खिलायेगा
बड़ा हो ,गोपियों के संग ,रास निश्चित ,रचायेगा 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

Saturday, September 1, 2018

क्यों इतना कठिन बुढ़ापा है 

उगता सूरज सुन्दर होता ,बचपन भी होता है सुन्दर 
है दोपहरी में सूर्य प्रखर ,यौवन भी होता है मनहर 
होती मनमोहक स्वर्णकिरण ,जब सूरज ढलने को आता 
तो फिर क्यों ढलती हुई उमर ,होती  दुखकर इतनी ज्यादा 
सूरज ढलता ,आती रजनी ,छा जाता नभ में अँधकार 
वृद्धावस्था के बाद मृत्यु ,यह क्रम चलता है बार बार 
सूरज चलता ,बादल ढकते  ,व्यवधान हमेशा आता है 
लेकिन मानव के जीवन में ,क्यों इतना कठिन बुढ़ापा है 

घोटू 
देखो मुझको डाटा न करो 

देखो मुझको डाटा न करो ,चिल्ला इस तरह उच्च स्वर में 
वरना हम तुम की नोकझोंक ,के किस्से होंगे घर घर में 

ऑफिस में  करते कद्र सभी ,
            तुम मुझे समझती हो बेढब 
पर बात और बिन बात मुझे ,
           तुम डाटा करती हो जब तब 
होंगे डिस्टर्ब पडोसी सब , 
                गाली दे देकर  कोसेंगें 
क्या असर पड़ेगा बच्चों पर ,
                 मम्मी पापा क्या सोचेंगे 
पर तुम्हे कोई परवाह नहीं ,
                 थोड़ा धीरज ना धर पाती 
मन माफिक जो कुछ नहीं हुआ ,
                 बस डंडा लेकर चढ़ जाती 
तुम सीखो धीरज धरना भी 
ऊपरवाले से डरना भी 
इस रोज रोज के झगड़े से ,हो गया तंग हूँ डियर  मैं 
देखो मुझको डाटा न करो ,चिल्ला इस तरह उच्च स्वर में 

है ये भी बात नहीं कि है
                  बोली में तुम्हारे तीखापन 
है बहुत मधुर स्वर तुम्हारा ,
                  पढ़ती जब गीता ,रामायण 
वह मधुर तुम्हारी बोली थी ,
                   जिसने मोहा था मेरा मन 
अब भी बच्चों और महरी से 
                तुम मीठी बात करो हरदम 
फुसफुसा बात करती मुझसे ,
               तुम हंसकर ,बहुत मधुर स्वर में 
जब मूड प्यार का होता है ,
                 हम तुम होते है बिस्तर में 
वो मीठे स्वर मुंह पर लाओ 
इस तरह डाट मत चिल्लाओ 
पुचकार कहो,सब काम करू,बन कर तुम्हारा नौकर मैं 
देखो मुझको डाटा न करो , चिल्ला इस तरह उच्च स्वर में 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '