Wednesday, February 22, 2023

फिसलन

जब मैं जवान था तेज भरा ,
मस्ती में इठलाया करता 
मुड़ जाती नजर हसीनों की ,
जब इधर-उधर जाया करता 
कोई डोरे डाल फसा ना ले,
 मेरी पत्नी जी डरती थी 
 जब भी मैं बाहर जाता था,
 वह मेरे संग ही चलती थी 
 मुझ पर चौकीदारी करती,
 कितनी ,कैसी, क्या बतलाऊं 
 चक्कर में किसी हसीना के ,
 वह डरती , मैं न फिसल जाऊं
 मन डगमग बहुत हुआ ,
 जब भी कोई मौका आया
 पर पत्नी के अनुशासन में ,
 रह कर मैं फिसल नहीं पाया
 
कट गई जवानी ऐसे ही,
क्या याद करूं अगला पिछला 
दिल डगमग डगमग बहुत किया ,
ना तब फिसला, ना अब फिसला
आ गया बुढ़ापा है लेकिन,
तन मेरा है डगमग डगमग 
पत्नी रखती मुझको संभाल,
पल भर भी होती नहीं अलग 
मैं जब भी कभी कहीं जाता ,
वह हाथ थाम कर चलती है 
ठोकर खा फिसल नहीं जाऊं,
 वो मुझे बचा कर रखती है 
 अब वृद्ध हुआ, मैं ना फिसला ,
 बस यूं ही जिंदगी निकल गई 
 फिसलन से रहा सदा बच कर ,
 पर उमर हाथ से फिसल गई

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Tuesday, February 21, 2023



मैं इक्यासी
जन्म दिवस का पर्व मनाते खुशियों से हम 
जब कि बढ़ती उम्र, घट रहा जीवन हर क्षण समझ ना पाते बात जरा सी 
मैं इक्यासी
अब तक जी भरपूर जिंदगी और सुख भोगे दुनिया घूमी, रहा खेलता संग खुशियों के धीरे-धीरे किंतु व्याधियों ने आ घेरा 
क्षीण हुआ तन और उत्साह घट गया मेरा 
जिस चेहरे पर हंसी खिला करती थी हरदम,
 उस पर छाई, आज उदासी 
 मैं इक्यासी
 क्या गुजर रहा है वक्त पड़े रहते बिस्तर पर
  तरह तरह के ख्याल सताते रहते दिन भर 
  वक्त न कटता बैठे ठाले, हुए निकम्मे 
  पहले सी चुस्ती फुर्ती अब बची ना हममें
  मनपसंद सारे भोजन है अब प्रतिबंधित,
  हुई मुसीबत अच्छी खासी 
   मै इक्यासी
  बेटी ,बेटे ,भाई बहन और संबंधी जन 
  पत्नी जिसने साथ निभाया पूरे जीवन
 दोस्त सखा जो सदा सहायता को थे तत्पर
  इन सब का एहसान न भूलूंगा जीवन भर जन्मों-जन्मों मिलता रहे प्यार इन सब का
   इसी खुशी का, हूं अभिलाषी 
   मैं इक्यासी 
   
 डूब रहा है सूरज पर किरणे स्वर्णिम है 
 किंतु हौंसले है बुलंद ,वे हुऐ न कम है 
जब तक तन में सांस ,तब तलक आस बची है मस्ती से जिएंगे ,हम ने कमर कसी है 
अभी ताजगी बसी हुई है इस जीवन में
 बूढ़ा हूं पर हुआ न बासी
 मैं इक्यासी 

मदन मोहन बाहेती घोटू

Sunday, February 19, 2023

शंकर वंदन

जय जय शिवशंकर महादेव 
तू मेरा सहारा एकमेव 
गौरी गणेश हर रहे क्लेश
मेरी रक्षा करते महेश 
तू बैजनाथ ,केदारनाथ 
मेरे सर तेरा वरद हाथ 
तू विश्वनाथ ,तू महाकाल 
तू करता मेरी देखभाल 
तू नागेश्वर ,भीमाशंकर 
बरसाता सदा कृपा मुझ पर 
तू मलिकार्जुन ,तू सोमनाथ 
रहता सुख दुख में सदा साथ 
तू घृष्णेश्वर, तू रामेश्वर 
कर दर्शन जीवन हुआ सफल 
तू त्रबकेश्वर, तू ओंकार 
तुझको प्रणाम है बार-बार 
तू त्रिपुरारी ,तू अविनाशी 
तू कैलाशी ,काशीवासी 
नंदी वाहन पर हो सवार 
सब पर तू बरसा रहा प्यार 
है चंद्र विराजे मस्तक पर 
है सर्प गले ,तू गंगाधर 
ओम हर हर हर हर शिव शंकर 
भोले भंडारी, प्रलयंकर,
 मेरी रक्षा करना सदैव 
 जय जय शिव शंकर ,महादेव

मदन मोहन बाहेती घोटू
चटनी 

तू लहराती हरे धने सी 
मैं हूं पत्ती पुदीने की 
मिलते हैं गुणधर्म हमारे 
हम दोनों में अच्छी पटनी

तो आओ फिर दिल की सिल पर ,
संग संग आपस में मिलकर, 
पिस कर एक जान हो जाए,
हम और तुम बन जाए चटनी 

हरी मिर्च सी छेड़छाड़ हो 
और मसालेदार प्यार हो 
नींबू रस की पड़े खटाई 
और लवण से मिले लुनाई
थोड़ी सी हो मीठी संगत 
जीवन में आ जाए रंगत 
ऐसा निकले रूप मनोहर 
नजर नहीं कोई की हटनी 
हम और तुम बन जाए चटनी 

चाट पकौड़ी आलू टिकिया 
दही बड़े भी लगते बढ़िया 
चाहे सभी स्वाद के मारे 
खायें ले लेकर चटकारे 
संग एक दूजे का पाकर 
अलग अलग अस्तित्व भुला कर 
मिलजुल एकाकार प्यार से ,
सुख से यूं ही जिंदगी कटनी 
हम और तुम बन जाए चटनी

मदन मोहन बाहेती घोटू

Sunday, February 12, 2023

गांठ 

धागे अमर प्रेम के ,अगर टूट जाते हैं 
भले गांठ पड़ जाती है पर जुड़ जाते हैं 
शादी का बंधन है जनम जनम का बंधन
यह रिश्ता तब बनता जब होता गठबंधन 
अगर गांठ में पैसा है, दुनिया झुकती है 
बात गांठ में बांधी, सीख हुआ करती है 
लोग गांठते रहते ,मतलब की यारी है 
 रौब गांठने वाले ,पड़ जाते भारी हैं 
किसी सुई में जब भी धागा जाए पिरोया 
बिना गांठ के फटा वस्त्र ना जाता सिया 
कंचुकी हो या साड़ी सबके मन भाते हैं 
बिना गांठ के ये तन पर ना टिक पाते हैं 
खुली गांठ ,कितने ही राज खुला करते हैं 
गांठ बांध रस्सी पर ,सीढ़ी से चढ़ते हैं 
बिना गांठ, नाड़ा भी रस्सी का टुकड़ा है 
गांठों के बंधन ने हम सबको जकड़ा है 
बाहुपाश भी तो एक गाठों का बंधन है 
गांठ पड़ गई तो क्या ,जुड़े जुड़े तो हम है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
जीवंत जीवन 

अब जीवन जीवंत हो गया 
राग द्वेष तज, संत हो गया 

ऐसा ज्ञान प्रकाश मिल गया 
मन का सोया कमल खिल गया 
जागृत अंग अंग है तन का 
जगमग हर कोना है मन का 
सुख, प्रकाश, अनंत हो गया 
अब जीवन जीवंत हो गया 

नव ऊर्जा है नव उमंग है 
हुआ प्रफुल्लित अंग अंग है 
ऐसा लगता उग आए पर 
भर उड़ान, मैं छू लूं अंबर 
यह मन एक पतंग हो गया 
अब जीवन जीवंत तो हो गया 

तन में नई चेतना आई 
महक उठी मन की अमराई 
फूल खिल गए उपवन उपवन 
लगता बदला बदला मौसम 
था जो शिशिर,बसंत हो गया 
अब जीवन जीवंत हो गया 

आई कितनी ही विपदायें
व्याधि , रोग और कई बलायें
 मैं सब से टकराया , जूझा 
 सच्चे मन से प्रभु को पूजा 
 खुशी मिली ,आनंद हो गया 
 अब जीवन जीवंत तो हो गया 
 
भूले अपना और पराया 
सबको अपने गले लगाया 
समझे मर्म सभी धर्मों का 
पथ अपनाया सत्कर्मों का
इच्छाओं का अंत हो गया 
अब जीवन जीवंत हो गया 

मदन मोहन बाहेती घोटू

Wednesday, February 8, 2023

दे के उपहार इतने पटाया उन्हें 
प्यार में उनके तो मेरा घर लुट गया 
कहां से लाऊंगा खर्च हनीमून का, 
जो था मेरा खजाना सभी खुट गया 
क्या पता था कि आसां मोहब्बत नहीं,
इसमें पड़ता है पापड़ बहुत बेलना 
जैसे तैसे अगर शादी हो भी गई 
बाद में पड़ता है मुश्किलें झेलना
जो तुम खाओ तो पछताओ, ना खाओ तो भी शादी बूरे के लड्डू है ,क्या कीजिए 
दुर्गति है तुम्हारी हरेक हाल में 
शौक से जिंदगी का मजा लीजिए

मदन मोहन बाहेती घोटू
ना तो छप्पन भोग , न ही छत्तीसों व्यंजन ,
 बस दो रोटी ,दाल यही जरूरत जीवन की 
 आए खाली हाथ, जाओगे तुम वैसे ही ,
 जाती कभी न साथ तिजोरी कोई धन की 
 करो सदा सत्कर्म ,सहायता, सेवा सबकी ,
 ये ही सच्चा धर्म , काम में जो आएगा 
 गमनआगमन के चक्कर से मोक्ष दिला कर
 तुम्हे स्वर्ग का अधिकारी जो बनवायेगा 

मदन मोहन बाहेती घोटू
 

Monday, February 6, 2023

बीमारी के बाद

आई बीमारी ,दुख दे भारी, मुझे सता कर चली गई 
विपदाओं से कैसे लड़ते , राह बता कर चली गई
 बीमारी ने त्रास तो दिया ,मगर सिद्ध वरदान हुई 
मूल रोग का गया, जिंदगी अब ज्यादा आसान हुई 
खाने पीने के परहेज का ,मुझे कायदा सिखा दिया 
तन मन में आई फुर्ती से ,मुझे फायदा दिखा दिया 
 थी बैयांलिस इंच कमर जो घटकर अब छत्तीस हुई 
मोटी और थुलथुली काया, नाजुक और नफीस हुई 
कंचन सा तन हुआ,दब गई ,तोंद बहुत जो थी निकली 
वजन घटा पच्चीस किलो तक ,चेहरे पर रौनक बिखरी
पोष्टिक और अच्छी खुराक ने मुझ को सेहतमंद किया
पत्नी ने भी रौब दिखाकर ,काम कराना बंद किया 
लगा नियंत्रण अब मीठे पर, कम खाना नमकीन हुआ 
भोजन में अब अहम विटामिन और शामिल प्रोटीन हुआ 
थोड़े दिन तकलीफ हुई पर धीरे-धीरे खुशी मिली 
फिर से जिंदादिली आ गई ,तबीयत रहती खिली खिली
 निखर गया व्यक्तित्व, चेहरा, अब फिर से मासूम हुआ 
 तंदुरुस्ती है बड़ी नियामत, यह सच अब मालूम हुआ 
रहे निभाते जिम्मेदारी और खुद का ना ख्याल रखा 
यही भूल थी जिसके कारण बीमारी का स्वाद चखा 
अब अपनों के अपनेपन का, भी इजहार हुआ दूना
सब आ मिलते, चहल पहल है,जीवन नहीं रहा सूना
हुई नियंत्रित दिनचर्या है और व्यवस्थित जीवन है 
सोते सुख की नींद प्रेम से,बदल गया जीवन क्रम है 
जीवन के प्रति दृष्टिकोण में भी आया है परिवर्तन
हुआ मानसिकता में शामिल ,अब प्रभुभक्ति ,दया, धरम
जीवन सुख दुख का संगम है, सुख न मिले बिन दुख पाये
किंतु पर्व अनुशासन का था वो, अब अच्छे दिन हैं आए 
व्यर्थ परेशानी चिंता में ,अब तुम जीवन मत जियो 
हंसी खुशी से रहो हमेशा, मनचाहा खाओ पियो
 जो आया है वह जाएगा कटु सत्य यह जीवन का 
इसीलिए तुम मजा उठाओ जीवन के हर पल क्षण का 
जितना प्यार लुटा सकते हो ,तुम सब पर बौछार करो 
सब संग सत्व्यवहार करो तुम, प्यार करो बस प्यार करो

मदन मोहन बाहेती घोटू 


Sunday, February 5, 2023

बड़ी खुशनुमा जिंदगी थी हमारी 
कटी जा रही थी खरामा खरामा
किसी की नजर पर ,लगी ऐसी हम पर,
गए भूल सारा ही, हंसना हंसाना 

न तुम ही थके थे ,ना हम ही थके थे,
 बड़ा जिंदगी का सफर था सुहाना
 न लेना किसी से ,न देना किसी को,
 सभी से मोहब्बत का रिश्ता निभाना 
 बड़ी खुशनुमा जिंदगी थी हमारी,
 कटी जा रही थी खरामा खरामा
 किसी की नजर पर, लगी ऐसी हम पर
 गए भूल सारा ही हंसना हंसाना 

दुनिया को देखा,समझ में ये आया,
गया है बदल किस क़दर ये जमाना
सभी को पड़ी है ,बस अपनी अपनी,
भुलाया है लोगों ने रिश्ते निभाना 
 सदा ढूंढते हैं ,कमी दूसरों की 
 कैसा है कोई फलाना ढिकाना 
  भरा मैल कितना है मन में हमारे ,
  नहीं साफ करते हैं हम वो ठिकाना
  
   रिश्तों की करना ,कदर जानते वो,
   देखा है जिनने, पुराना जमाना 
   सुख-दुख सभी भोगना पड़ रहा है ,
   चुकाते हैं कर्मों का कर्जा पुराना
   कभी तो हंसी है लबों पर थिरकती,
   कभी आंख से आंसुओ का बहाना
   कभी डगमगाते,कभी खिलखिलाते,
   इतना सा है बस हमारा फसाना

मदन मोहन बाहेती घोटू