Thursday, November 10, 2011

लोक- परलोक

लोक- परलोक
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हमारे एक धार्मिक प्रवृत्ति  के दोस्त ने समझाया
उम्र बढती जारही है,
और तुमने ना कोई पुण्य कमाया
थोडा दान धरम कर लो
थोड़ी कथा भागवत सुन लो
ये ही पुण्य बाद में काम आएगा
तुम्हे स्वर्ग दिलवाएगा
देखो आजकल लोगों की प्रवृत्ति में,
धार्मिकता कितनी बढ़ गयी है
मंदिरों और कथा भागवत में भीड़ उमड़  रही है
सबके सब जुटे है पुण्य कमाने में
सीधा स्वर्ग जाने में
मैंने कहा यार तुमको पता है
भीडभाड से मेरा मन डरता है
मंदिरों या सत्संगो की भीड़ से घबराता हूँ
इसीलिए ऐसे आयोजनों में नहीं जाता हूँ
और फिर इतनी सारी जनता,जो पुण्य कमा रही है,
सीधे स्वर्ग जायेगी
तो निश्चित ही स्वर्ग में भी भीड़ बढ़ जायेगी
शांति कहाँ मिल पाएगी
ऐसे स्वर्ग जाने से फायदा ही क्या है यार,
यहाँ भी झेलो भीड़ भाड़ और वहां भी भीड़ भाड़
अगर हम दिल के सच्चे है
तो ऐसे ही अच्छे है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

रिटायर हो हम गए है

रिटायर हो हम गए है
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रिटायर हो हम गए है
बदल सब मौसम गए है
थे कभी सूरज प्रखर हम
हो गए है आज मध्यम
आई जीवन में जटिलता
मुश्किलों से वक़्त कटता
थे कभी हम बड़े अफसर
सुना करते सिर्फ 'यस सर'
गाड़ियाँ थी,ड्रायवर थे
नौकरों से भरे घर थे
रहे चमचों से घिरे हम
रौब का था गजब आलम
जरा से करते इशारे
काम होते पूर्ण सारे
सदा रहते व्यस्त थे हम
काम के अभ्यस्त थे हम
आज कल बैठे निठल्ले
रह गए एक दम इकल्ले
हो गए है बड़े बेबस
नौकरों के नाम पर बस
पार्ट टाइम कामवाली
है बुरी हालत हमारी
काम करते हाथ से है
क्षुब्ध अपने आप से है
रौब अब चलता नहीं है
कोई भी सुनता नहीं है
आदतें बिगड़ी हुई है
कोई भी चारा नहीं है
बस जरासी पेंशन है
और हजारों टेंशन है
हो बड़े बेदम गए है
रिटायर हो हम गए है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अपेक्षायें

अपेक्षायें
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अपेक्षायें मत करो तुम,तोडती दिल अपेक्षायें
पूर्ण यदि जो ना हुई तो,तुम्हारे  दिल को दुखायें
किया यदि कुछ,किसी के हित,करो और करके भुलादो
मिलेगा प्रतिकार में कुछ,आस   ये दिल से मिटा दो
तुम्हारा कर्तव्य था यह,जिसे है तुमने निभाया
क़र्ज़ था पिछले जनम का,इस जनम में जो चुकाया
या कि फिर यह सोच करके,रखो यह संतोष मन में
इस जनम के कर्म का फल,मिलेगा अगले जनम में
या किसी के लिए कुछ कर,पुण्य है तुमने कमाये
अपेक्षायें मत करो तुम,तोडती दिल अपेक्षायें
बीज जो तुम बो रहे हो ,वृक्ष बन कर बढ़ेंगे कल
नहीं आवश्यक तुम्हारे,हर तरु में लगेंगे फल
और यदि फल लगे भी तो,मधुर होगे,तय नहीं है
तुम्हे खाने को मिलेंगे,बात ये निश्चय नहीं है
इसलिए तुम बीज बोओ,आएगी ऋतू,तब खिलेंगे
आस तुम मत करो फल की,भाग्य में होंगे,मिलेंगे
नहीं आवश्यक सजग हो,सब सपन ,तुमने सजाये
अपेक्षायें मत करो तुम, तोडती दिल अपेक्षायें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'