Tuesday, April 5, 2016

मेरी माँ

ये  मेरी माँ है ,प्यारी सी माँ है
मुझ से प्यार करती है ,मुझ पे मेहरबाँ है
उमर नब्बे के पार है
थोड़ी कमजोर और लाचार है
फिर भी हर काम करने को  तैयार है
कृषकाय शरीर में नहीं दम है
मगर हौंसले कहीं से भी नहीं कम है
घर में जब भी हरी सब्जी जैसे ,
मैथी,पालक या बथुआ आता है
वो खुश हो जाती है क्योंकि ,
उसे करने को कुछ काम मिल जाता है
वो एक एक पत्ता छांट छांट कर सुधारती है
मटर की फलियों से दाने निकालती है
ये सब करके उसे मिलता है संतोष
उसमे आ जाता है वही पुराना जोश 
हर काम करने के लिए आगे बढ़ती है
मना करो तो लड़ती है
जब हम कहते है कि अब आप की ,
ये सब काम करने की उमर नहीं है माता
तो वो कहती है कि कहने में क्या है जाता
काम करने की जिद कर  ,करती परेशाँ है
        ये मेरी  माँ है ,प्यारी सी माँ है                 
जब भी कोई मेहमान आता है
उसे बहुत सुहाता है
उनकी बातों में पूरी दिलचस्पी लेती है
बीच बीच में अपनी राय भी देती है
बहन,बेटियां या बहुए जब सामने पड़ती है
ये उनका ऊपर से नीचे तक निरीक्षण करती है
और अगर उनके हाथों में नहीं होती चूड़ियां
या पावों में न हो बिछूडियां
या फिर नहीं हो बिंदिया माथे पर
तो फिर ये लेती है उनकी खबर
उसे शुरू से ही छुवाछूत ,
व जातपात का बड़ा ख्याल है
इसलिए आज के जमाने में ,
इस मामले में उसका बुरा हाल है 
हालांकि समय के साथ साथ ,
उसे थोड़ा कम्प्रोमाइज करना पड़ा है 
और  उसका परहेज कड़ा है
  फिर भी दुखी रहती ख्वामखां   है
        ये मेरी माँ है ,प्यारी सी माँ है                       
रह रह के नींद आती है
बार बार उचट जाती है
जग जाती तो गीता या रामायण पढ़ती है
और पढ़ते पढ़ते फिर सोने लगती है
 खुद ही करती है अपने सब काम
आत्मविश्वास और स्वाभिमान
ये है उसकी पहचान
कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया
सब के लिए ,सब कुछ ,
सच्चे दिल से लुटाया
न पक्षपात है न बैरभाव है
सबके लिए मन में समभाव है
त्योंहार मनाने का चाव है
कब क्या पूजा करना व चढ़ाना
किस दिन क्या खाना बनाना
विधिविधान सी मनाती है हर त्योंहार
रीतिरिवाजों का उसके पास है भण्डार
यूं तो बुढ़ापे में कमजोर हो गई है याददास्त
पर अब भी याद है पुरानी सब बात
सुबह सूर्य को अर्घ्य देना,
या तुलसी को पानी चढ़ाना
शाम  और सवेरे ,
मंदिर में दीपक जलाना
पूजाघर में  चढ़ाना प्रसाद
खाने के पहले निकालना गौग्रास
बुढ़ापे में यही उसकी पूजा है
ये मेरी माँ है,प्यारी सी माँ है  
भूख कम लगती है
फिर भी खाने की कोशिश करती है
थाली में सब चीजें पुरुसवाती है
मगर खा नहीं पाती है
दांत बहुत कम रह गए है
 इसलिए चबा नहीं पाती है 
बहुत  पीछे पड़ने पर ,
थोड़ा बहुत निगल लेती है
रोटी के टुकड़ों को,
 कटोरी के नीचे छुपा देती है
और एक मासूम सी ,
मजबूरी भरी मुस्कान लिए ,
सारा खाना जूठा छोड़ देती है
और फिर  रौब  से कहती है ,
जितनी भूख है उतना खा पी रही हूँ
नहीं तो बिना खाये पीये ,
क्या ऐसे ही जी रही हूँ
सुबह और शाम उसकी
 स्पेशियल चाय बनती है  
एक कप में तीन चीनी चम्मच डलती है
इतनी है स्वाद की मारी
जरासा नमक या मिर्च कम हो
तो रिजेक्ट है चीजें सारी
जब एकादशी का व्रत करती है
तो फिर उसे बिलकुल भी भूख ना लगती है
वो सब पर ममता बरसाती है
अपना प्यार लुटाती है
उसने भगवान से अपने लिए कुछ नहीं माँगा
जो भी माँगा ,परिवार की ख़ुशी के लिए माँगा
वो सब पर अपना प्यार बांटती है 
नाराज होती है तो डाटती है
खुश होकर जब मुस्काती है
अपने स्वर्णदंत चमकाती है
उसके सब बच्चे ,अपने अपने घर सुखी है ,
इसलिए हमेशा उसकी आँखों  में संतोष झलका है
ये मेरी माँ है ,प्यारी सी माँ है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
      सब नंगें है

कपड़े उतारते है हम या तो  हमाम मे
खुद का जिसम निहारते ,शीशे के सामने
या फिर सताया करता जब गर्मी का मौसम
तब सुहाते है ,जिस्म पे ,कपड़े भी कम से कम
या मिलते है जब प्रेमी और होती मिलन की रात
कपड़े अगर हो दरमियाँ ,बनती नहीं है बात
लेकिन है अब माहौल कुछ  ऐसा बदल गया
कपड़े उतारने का एक फैशन सा चल गया
कुछ बाबाओं के गंदे जो धंधे थे ,खुल गए
कहते है लोग ,उनके सब कपड़े उतर गए
कुछ लोग नंगे हो रहे ,जात ओ धरम नाम
कुछ मिडिया भी कररहा है इस तरह का काम
फैशन के नए ट्रेंड ने भी कुछ कपड़े है  उतारे
कुछ कपड़े यूं ही उतरे , है  मंहगाई के मारे
नंगई  इस तरह से है सब और  बढ़ रही
सड़कों पे औरतों की है अस्मत उघड रही
आतंक ,लूट मार और  दंगे  है हो  रहे
दुनिया के इस हमाम मे ,सब नंगे हो रहे
 
घोटू
        अच्छे दिनों का संकेत

निकल कर के बिलों से सांप जो ये फनफनाते है
हमे बदलाव के लक्षण ,नज़र स्पष्ठ    आते  है

बिलों में छुपने वालों में ,संपोले ,नाग कितने है,
   बड़ा मुश्किल हुआ करता ,इन्हे पहचान यूं पाना
जरूरी इसलिए ये था ,निकाले जाय ये बिल से ,
    बिलों में जब भरा पानी ,पड़ा इनको निकल आना
निकल आये है ये विषधर ,बिलों से अपने जब बाहर ,
    कोई ना कोई लाठी तो ,कुचल  ही देगी ,इनका फन
हुई जमुना थी जहरीली ,जहाँ पर वास था इनका,
     कोई कान्हा फनों पर चढ़,करेगा कालिया मर्दन
जो तक्षक ,स्वांग रक्षक का ,धरे भक्षक बने सब थे ,
      परीक्षित को न डस पाएंगे ,ले कोशिश कितनी कर
बिलों में जो दबा कर के ,रखी थी नाग मणियां सब ,
      निकलते ही सब निकलेगी ,सबर रखना पड़ेगा पर
किसीने दक्षिणा इतनी ,दिला दी नारदो  को है  ,
       उन्ही का कर  रहे कीर्तन,उन्ही के गीत गाते है
उन्ही की शह पे फुँफकारा ,किया करते संपोले कुछ,
       है बूढ़े नाग चुप बैठे  ,समझ अपनी दिखाते है
तुम्हे क्या ये नहीं लगता ,बदलने वाला है मौसम ,
      घटाएं  आसमां में छा रही थी ,हट रही  सब है
उजाले की किरण ,रोशन हमारा नाम है करती,
       हमे विश्वास अच्छे दिन ,शीघ्र ही आ रहे  अब है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   
         
    पत्नी -सौ टंच खरा सोना

मैं पति हूँ,
दुनिया का सबसे निरीह प्राणी
जिसे जली कटी ,
सिर्फ सुननी ही नहीं पड़ती ,
जलीकटी पड़ती भी है खानी
और वो भी तारीफ़ कर कर  के
रहना पड़ता है डर डर के
ये पति शब्द ही एसा  है,
जो 'विपति ' से जुड़ा है
इसलिए उसका रंग ,
हमेशा रहता उड़ा है
पत्नियां पुचकार करके
थोड़ा सा प्यार कर के,
पति को पटाया करती है
बेवकूफ बनाया करती है
और वो भी ख़ुशी ख़ुशी ,
बेवकूफ बन जाता है
उसे ,इसमें भी मज़ा आता है
उनका कभी कभी प्यार से 'डियर' कहना ,
बड़ा 'डीयर',याने मँहगा पड़ने वाला है ,
ये सन्देशा है
और जिस दिन वो प्यार से कहे 'जानू',
समझ लो ,जान और माल ,
दोनो की हानि का अंदेशा है
और जब वो'जरा सुनिए'कह कर बुलाती है
तो समझलो ,कोई आदेश सुनाती है
अपनी सहेलियों के बीच ,जब यह कह कर ,
कि 'हमारे ये तो बड़े सीधे है '
आपका गुणगान करती है
तो वह अपने वर्चस्व का बयान करती है 
 उनके हाथों का बनाया हुआ कोई भी खाना,
आपको 'टेस्टी'पड़ता है बतलाना
और जब वो सजधज कर,तैयार हो कर,
आपसे पूछे कि 'मै लग रही हूँ कैसी'
आपको तारीफ़ करनी ही पड़ती है ,
वरना हो जाती है ऐसी  की तैसी
कभी आइना देखकर वो बोले
क़ि 'सुनोजी ,लगता है मैं हो रही हूँ मोटी'
मरा बजन बढ़ रहा है '
तो खैरियत इसी में है की आप कहें,
'अब तुम  कली से फूलबन कर खिल रही हो,
तुमपर यौवन चढ़ रहा है'
कभी भी आपकी चलने नहीं देती ,
घर का हर फ़ैसला लेनेवाली,वो सरपंच होती है
पर ये बात भी सही है
आपकी सबसे बड़ी हितेषी भी वही है ,
वो खरा सोना है ,सौ टंच होती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
     पत्नियां -पांच चतुष्पदियां
                      १
नहीं समझो कभी इनको ,कि ये जंजाल जी का है
है इनका स्वाद मतवाला ,चटपटा और तीखा है
पचहत्तर वर्षों में मैंने , तजुर्बा  ये  ही  सीखा है
प्यार से ग़र जो खाओगे ,ये हलवा देशी घी का है
                     २
न सुनना बात   बीबी  की ,बड़ी  ये  भूल होती है
सिखाती तुमको अनुशासन ,ये वो स्कूल होती है  
कभी भी सोचना मत ये ,चरण की धूल  होती है
समझना डाट उसकी भी ,बरसता फूल होती है 
                         ३
 अगर तुमसे वो कुछ बोले ,उसे आदेश समझो तुम    
 हरेक उनके इशारे में , छुपा  संदेश  समझो  तुम
करो तारीफ़ तुम उनकी ,मिटेंगे   क्लेश,समझो तुम
करो ना काम ,पहुँचाये जो उनको  ठेस ,समझो तुम 
                         ४
 नहीं समझो ये आफत है,खुदा की ये नियामत है
 मुसीबत में  पड़ोगे  जो ,कहोगे  ये  मुसीबत  है
तुम्हारे घर की हर दौलत ,उसी की ही बदौलत है
है बीबी जो ,तो घर जन्नत ,यही सच है,हक़ीक़त है
                              ५
बतंगड़ बात का बनता ,राई का पहाड़ बन जाता
पकड़ती तूल जब बातें ,तो तिल का ताड़ बन जाता 
मान कर बात बीबी की ,जरा तारीफ़ तुम कर दो ,
उफनता उनका गुस्सा भी ,उमड़ता लाड़ बन जाता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
                        
            

                    
गुब्बारा

मै गुब्बारा ,हवा है तू ,
अगर मुझमे समाएगी
ख़ुशी से फूल ,हो पागल ,
हवाओं में उड़ेंगे हम
कोई नन्हा ,हमे बाहों में,
ले लेकर के चहकेगा ,
जरा सा जो चुभा काँटा ,
न तुम होगी,न होंगे हम

घोटू
        वाह  वाही

कभी कभी ,ज्यादा वाहवाही
भी ला सकती है तबाही
गर्व के मारे आदमी ,
गुब्बारे सा फूल जाता है
अपने परायों का भेद भूल जाता है
पर जरा सा काँटा चुभने पर,
जब गुब्बारा फूटता है
तब भरम टूटता है
पर तब तक ,
बड़ी देर बड़ी हो चुकी होती है
पर क्या करें ,
वाहवाही आदमी की ,
सबसे बड़ी कमजोरी होती थी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'