Monday, May 23, 2011

कैसे कैसे लोग


कैसे कैसे लोग
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यह ऐसा है ,वह वैसा है
उसके बारे में मत पूछो,वह कैसा है
सदा चार की बातें करनेवाले,
     जब सदाचार की  बातें करते है
            तो कैसे लगते है?
कुछ विष इसके खिलाफ उगला
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
जब जब जिसकी भी बात चली,
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
  साँस साँस में जिसके विष का वास रहे
      वो विश्वास की बातें करते है
            तो कैसे लगते है?
जरुरत पर इसके चरण छुए
मतलब पर उसके चरण छुए
जब जब भी जिससे काम पड़ा
हरदम बस उसके चरण छुए
    सदा चरण छूने वाले कुछ चमचे
       जब सदाचरण की  बातें करते है
           तो कैसे लगते है?
मदन मोहन बहेती 'घोटू'

हंसों का जोड़ा

हंसों का जोड़ा
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मुझे एक हंसों का जोड़ा मिला
शुरू हुआ बातों का सिलसिला
मै बोला आप  तो काफी गुनी है
आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है
आप तो मान सरोवर में रहते है
दूध का ढूध और पानी का पानी कर देते है
सिफ मोती खाते है
वर्ना भूखे रह जाते है
इस महंगाई के जमाने में
आप रोज मोती कैसे अफोर्ड करते है खाने में
बात सुन मेरी, दोनों हँसे और बोले
भाई साहब ,आप तो है बिलकुल भोले
दिखने में तो समझदार नज़र आते है
कैसी कैसी बातों पर विश्वास कर जाते है
अरे बिना पानी के दूध,दूध नहीं,खोया कहलाता है
या फिर मिल्क पावडर बन जाता है
बिना पानी के मोती या मानस नहीं उबरता है
वेसे ही बिना पानी के दूध,दूध नहीं रहता है
और मोती मानसरोवर में नहीं मिलते है
वो तो समंदर की सीपियों में पलते है
हंसिनी फिर मुस्काई
और बोली कि भाई
हम न तो हिमालय से है,न स्वर्ग से है
हम तो बस बुद्धि जीवी है,मध्यमवर्ग से है
हम दूध का दूध पानी का पानी नहीं करते है
बल्कि थोडा सा दूध जो भी खरीद पाते है
उसी में पानी मिला,पानी का दूध करते है
उसी से बच्चों का पेट भरते है
और भाई साहब
रही मोती कि बात,
हमने असली मोती छूकर भी नहीं देखे है,खाना तो दूर है
हाँ,चुगने कि बात में तथ्य जरूर है
 राशन के गेंहू में इतने कंकर मिलते है
हम कंकर नहीं, गेहूं ही चुनते है
गेहूं ही हमारे मोती है
जिससे बनती रोटी है
हंस भी हंसा और बोला,
आपको शायद गलत फहमी हो गयी है
हम सफ़ेद हंस है,सफेदपोश नेता नहीं है
वो जरूर रोज रोज मोती अफोर्ड कर सकते है
मोतीचूर खाते है ,मोती भस्म चखते है
वो ही है वो ज्ञानी
जो दूध कि मलाई खुद चट कर जाते है
और जनता को मिलता है दुधिया पानी
हमें खुसी है कि हम उनके जैसे नहीं है
बाहर से जैसे है भीतर भी वही है  
न काला धधा  करते है,न काला पैसा है
हमारा उजला तन है,और मन भी वैसा है
आपने एक बात मगर सच कही है
कि हम मान सरोवर में रहते है,
हाँ हमारा घर वही है
हमने अभी तक अपना मान बचा रख्खा है
इमान बचा रख्खा है
सन्मान बचा रख्खा है
इसीलिए अभी तक मोती नहीं चख्खा है
हम मान के सरोवर में रहते है
पसीने के मोती चुगते है
बुद्धिजीवी है,सरस्वती के वाहन है,
ज्ञान के पंखो से उड़ते है
अच्छा,देर हो रही है हम चलते है
कहीं,हमारा बच्चा भूखा सो ना जाये
या बगुलों की भीड़ में कही खो ना जाये

मदन मोहन बहेती'घोटू'

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है
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बीज तो मैंने उगा कर,खेत से अपने दिए थे,
फिर न जाने हो गयी क्यों,इस फसल में गड़बड़ी है
आ रहे है बालियों में,कुछ पके अनपके दाने ,
और कितनी बालियाँ है ,जो अभीखाली  पड़ी है
थी बड़ी उपजाऊ माटी,खाद भी मैंने दिया था
खेत को मैंने बड़े ही ,जतन से सिंचित किया था
हल चलाया था समय पर,करी थी अच्छी जुताई
और अच्छे बीज लेकर ,सही मुहुरत में बुवाई
उगे खा पतवार सारे ,छांट कर मैंने निकाले,
बहुत थे अरमान लेकिन ,गाज मुझ पर गिर पड़ी है
  हो गयी क्या गड़बड़ी है जो फसल सूखी पड़ी है
न तो ओले ही गिरे थे,और ना ही पड़ा पाला
सही मौसम ,सही बारिश ,सभी कुछ देखा संभाला
मगर पश्चिम की हवाएं ,कीट ऐसे साथ लायी
कर दिया बर्बाद ,फसलें,पनपने भी नहीं पायी
कर रहा हूँ जतन भरसक,लाऊ ऐसा कीटनाशक,
जो की फिर से लहलहा दे,फसल जो सूखी पड़ी है
  हो गयी क्या गड़बड़ी है जो फसल सूखी पड़ी है

 बहेती 'घोटू'