Monday, July 20, 2020

पिटना और पटना

मैं कोरी बात नहीं करता ,ते बात है पूरे अनुभव की
पिटते रहना ,पट के रहना ,बस यही प्रकृति है मानव की

बचपन की बात याद हमको ,जब हम करते थे शैतानी
पापाजी  बहुत पीटते थे ,थी पड़ती मार हमें  खानी
स्कूल में यार दोस्तों संग , चलती रहती थी मार पीट
जब होम वर्क ना कर लाते ,मास्टर जी देते हमे पीट
बस चलता रहा सिलसिला ये ,पिटते पिटते हो गए ढीठ
गिरते पिटते कॉलेज पहुंचे ,हमने न दिखाई मगर पीठ
अच्छे नंबर से पास हुए ,ये बात बहुत थी गौरव की
पिटते रहना ,पट के रहना बस यही प्रकृति है मानव की

फिर बीते दिन पिटने वाले,हम पर चढ़ रही जवानी थी
एक दौर सुहाना जीवन का ,ये उमर बड़ी मस्तानी थी
कैसे भी उठापटक कर के ,एक लड़की हमे पटानी थी
और सामदंड से झपट लपट ,पटरी उस संग बैठानी थी
ये काम कठिन,झटपट न हुआ ,पर धीरे धीरे निपट गया
जब पट के कोई हृदयपट को, मेरे  दिल सेआ लिपट गया
मन की वीणा ने झंकृत हो ,एक नयी रागिनी ,अनुभव की
पिटते रहना ,पट के रहना ,बस यही प्रकृति है मानव की

फिर कर्मक्षेत्र में जब उतरे ,मुश्किल से माथा पीट लिया
पाने को अच्छा जॉब कोई ,कितनो से ही कॉम्पीट किया
 फिट होना है जो सही जगह,आवश्यक है तुम रहो फिट
खुद पिटो या पीटो औरों को ,सिलसिला यही होता रिपीट
 घर में बीबी से रहो पटे ,साहब ऑफिस में रखो पटा
तो कभी न तुम पिट पाओगे ,मन में रट लो ये बात सदा
इस राह शीध्र सम्भव होगा ,सीढ़ी पर चढ़ना वैभव की
पिटते रहना पट के रहना ,बस यही प्रकृति है मानव की

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बड़े आदमी
(तर्ज -कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे -)

अगर ठीक से भूख लगती नहीं
लूखी सी रोटी भी पचती नहीं
समोसे पकोड़े अगर तुमने छोड़े
तली चीज से हो गयी दुश्मनी हो
तो लगता है ऐसा कमा कर के पैसा
 अब बन गए तुम बड़े आदमी हो
 
अभी मोह माया में उलझे हो तुम
,मिलती जरा सी भी फुर्सत नहीं
किसीके लिए भी नहीं वक़्त है ,
कोई रिश्तेदारों की जरूरत नहीं

अगर चाय काली जो पीने लगो
नमक के बिना भी जो जीने लगो
कोई कुछ परोसे तो मुंह को मसोसे
खाने से करते तुम आनाकनी  हो
तो लगता है ऐसा कमा कर के पैसा
अब बन गए तुम बड़े आदमी हो

पागल से रहते जुटे काम में ,
ऐसी कमाई की आदत हुई
हाथों से मोबाईल छूटे  नहीं,
हंसी चेहरे से नदारद हुई

अगर ठीक से भी नहीं सो सको
जरा सी भी मेहनत करो और थको
 
लिए बोझ दिल पर चलो ट्रेडमिल पर ,
दवाओं के संग दोस्ती जो जमी हो
तो लगता है ऐसा कमा कर के पैसा
अब बन गए तुम बड़े आदमी हो  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '