Sunday, November 27, 2011

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....
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गर्म गुड के गुलगुलों के दिन गये
बाजरे के  खीचडों  के  दिन गये
अब तो पिज़ा और नूडल चाहिये,
हाथ वाले  सिवैयों के   दिन गये
सर्दियों में आजकल हीटर जलें,
संग तपते अलावों के दिन गये
तीज और त्योंहार पर होटल चले,
पूरी  ,पुआ ,पुलाओं के  दिन गये
बिना चुपड़ी तवे की दो चपाती,
आलुओं के परांठों के दिन गये
गरम रस की खीर या फिर लापसी,
उँगलियों से चाटने के दिन गये
बैठ छत पर तेल की मालिश करे,
धूप में तन तापने के दिन गये
बढ न क्लोरोस्टाल जाये,डर कर इसलिए,
जलेबियाँ उड़ाने के दिन गये
गरम हलवा गाजरों का याद है,
रेवड़ियाँ चबाने के दिन गये
धूप  खाती थी पड़ोसन छतों पर,
उनसे नज़रें मिलाने के दिन गये
याद आती है हमें वो सर्दियाँ,
वो मज़ा अब उड़ाने के दिन गये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ग़ज़ल -- तकियों के क्या करें दोस्ती.......

         ग़ज़ल
तकियों के क्या करें दोस्ती.......
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तकियों से क्या करें दोस्ती,आये पास सुला देतें है
शीशे के प्याले अच्छे है,भर कर जाम,पिला देते है
बहुत मुश्किलें,जीवनपथ पर,पत्थर,कंकर है,कांटे है,
पर जूते है सच्चे साथी,रास्ता पार करा देते है
एक बार जो तप जाए तो,बहुत उबाल दूध में आता,
लेकिन चंद दही के कतरे,सारा दूध जमा देते है
अरे इश्क करने वालों का,ये तो है दस्तूर पुराना,
मालुम है कलाई थामेंगे,बस ऊँगली पकड़ा देते है
दो बुल (bull )अगर प्यार से मिलते,बन जाते नाज़ुक बुलबुल से,
चार प्यार के बोल तुम्हारे,पत्थर भी पिघला देते है
सुना केंकड़ों की बस्ती में,यदि कोई ऊपर उठता है,
कई केंकड़े टांग खींच कर,नीचे उसे गिरा देते है
मारो अगर  किसी हस्ती को,पब्लिक में जूता या थप्पड़,
ब्रेकिंग न्यूज़ ,मिडिया वाले,हीरो तुम्हे बना देते है
यही नियम होता प्रकृति का,कि चिड़िया के बच्चे बढ़  कर ,
उड़ना  सीख,अधिकतर देखा,अपना नीड़ बना लेते है
सुनते धरम,दान,पूजा से,अगला जनम सुधर जाएगा,
इस चक्कर में कई लोग ये,जीवन यूं ही गवां देते है
जीवन चुस्की एक बरफ की,समझदार कुछ खाने वाले,
चूस चूस कर,घूँट घूँट कर,इसका बड़ा मज़ा लेते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'