Friday, June 23, 2017

मीरा और  गोविन्द 
ए  मीरा अब छोड़  दे,जपना गोविंद नाम 
गोविंद तो कोविंद हुए ,कृष्ण हो गये राम 
कृष्ण हो गए राम ,देख कलयुग की माया 
राष्ट्रपति बनने का  उनने  दांव   लगाया 
कोविंद ,गोविंद भेद न जाने हृदय अधीरा 
कह 'घोटू' कवि ,पीछे पीछे  दौड़ी  मीरा 
२ 
आठ रानियों के पति ,फिर भी ना संतोष 
बनने को पति राष्ट्र का ,दिखा रहे है जोश
दिखा रहे है जोश ,प्रेम में  जिनके पागल 
बनी दीवानी ,मीरा ,भटकी ,जंगल जंगल 
प्रेम दिवानी मीरा ने पर आस न छोड़ी 
भाग रही है उनके पीछे  ,दौड़ी  दौड़ी 

घोटू  
 

Monday, June 19, 2017

फादर डे 

हमारा बेटा ,अपनी व्यस्तता के कारण ,
फादर डे पर मिलने तो नहीं आया 
पर याद रख के एक पुष्पगुच्छ भिजवाया 
हमने फोन किया बरखुरदार 
धन्यवाद,भेजने को ये उपहार 
और दिखाने को अपना प्यार 
साल में एक बार जो इस तरह ,
फादर डे  मना लोगे
एक पुष्पगुच्छ भेज कर ,
अपना कर्तव्य निभा लोगे 
क्या इससे ही अपना पितृऋण चूका लोगे 
तुम्हारी माँ ,तुम्हारे इस व्यवहार से ,
कितना दुखी होती है 
छुप छुप कर रोती  है 
तुम्हे क्या बतलायें ,बुढ़ापे में ,माँ बाप को,
संतान के प्यार और सहारे की 
कितनी जरूरत होती है 
बेटे का जबाब आया 
पापा,हमने एक दिन ही सही ,
फादर डे तो मनाया 
पर क्या कभी आपने 'सन डे 'मनाया 
हमने  कहा बेटा ,हम सप्ताह में एक बार ,
और साल में बावन बार ,'सन डे 'मनाते है 
तुम्हे मिस करते है ,मन को बहलाते है 
और रिटायरमेंट के बाद तो,
हमारा हर दिन ही 'सन डे 'जैसा है 
हर माँ बाप के दिल में ,
बचपन से लेकर अंत तक ,
अपनी संतान के प्रति प्यार ,
भरा रहता  हमेशा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
यादें पुरानी

यादें पुरानी कितनी ,जब साथ दौड़ती है 
तुम लाख  करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 
रातों को जब अचानक ,जाती है आँख खुल तो,
फिर सोने नहीं देती,इतना  झंझोड़ती  है 

कुछ घड़ियाँ वो ख़ुशी की ,कुछ पल पुराने गम के,
जो दबे ,छुप के  रहते , कोने में किसी  मन के 
कुछ घाव  पुराने से ,हो जाते फिर हरे  है 
जिनकी कसक से आंसू ,आखों में फिर भरें है 
रह रह के वो हमारे ,मन को मरोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

 वो प्यार पहला पहला ,जब नज़र लड़ गयी थी 
रातों को जागने की , आदत सी   पड़  गयी थी 
 वो उनका रूठ जाना ,वो दिल का टूट जाना 
वो चुपके अकेले में ,आंसू का   फिर  बहाना 
कोई की बेवफाई ,जब दिल को  तोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश ,पीछा न छोड़ती है 

वो भूल जवानी की ,रो रो के फिर संभलना 
बंधन में बंध किसी संग ,फिर साथ साथ चलना 
बच्चों की करना शादी,और उनके घर बसाना 
फिर सारे परिंदों का ,पिंजरे को छोड़  जाना 
  तनहाई बुढ़ापे में , मन को कचोटती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
लिमिट में प्यार करो बीबी से 

अपनी बीबी से करो प्यार मगर बस इतना 
कि जो आसानी से पच जाये केवल बस उतना 
मिठाई ही मिठाई जो ,मिले  रोज खाने को 
विरक्ति मीठे से होती ,मिठाई के दीवाने को 
इस तरह प्यार का जो 'ओवर डोज' मिलता हो 
बिना मांगे ही अगर  रोज रोज  मिलता  हो 
सोच कर ये कि इससे बीबी रीझ जाती है 
हक़ीक़त ये है इससे बीबी खीझ  जाती  है 
इसलिए ढेर सारा प्यार नहीं बरसाओ 
थोड़ा सा प्यार करो,थोड़ा थोड़ा तरसाओ 
हमेशा पत्नी का पल्लू पकड़ के मत बैठो 
लिमिट में प्यार करो,थोड़ा झगड़ो और ऐंठो 
मिठाई साथ में ,नमकीन भी ,जरूरी है 
बढाती प्यार की है प्यास ,कभी दूरी है 
सताओ ऐसे ,उसके मन में आग लग जाए 
प्यार पाने उसके मन में तलब  जग जाए 
आग हो दोनों तरफ ,मज़ा जलने में  आता 
चाह हो दोनों तरफ,मज़ा मिलने में  आता 

मदन मोहन बाहत'घोटू' 
पिताजी आप अच्छे थे 

संवारा आपने हमको ,सिखाया ठोकरे सहना 
सामना करने मुश्किल का,सदा तत्पर बने रहना 
अनुभव से हमें सींचा ,तभी तो हम पनप पाये 
जरासे जो अगर भटके ,सही तुम राह पर लाये 
मिलेगी एक दिन मंजिल ,बंधाया हौंसला हरदम 
बढे जाना,बढे जाना ,कभी थक के न जाना थम 
जहाँ सख्ती दिखानी हो,वहां सख्ती दिखाते थे 
कभी तुम प्यार से थपका ,सबक अच्छा सिखाते थे 
तुम्हारे रौब डर  से ही,सीख पाए हम अनुशासन 
हमें मालुम कितना तुम,प्यार करते थे मन ही मन 
सरल थे,सादगी थी ,विचारों के आप सच्चे थे 
तभी हम अच्छे बन पाए ,पिताजी आप अच्छे थे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
तीन चौके 
१ 
अभी तो झेलना हमको, कई  तूफ़ान  बाकी  है 
चुकाने लोगों के अब तक,किये अहसान बाकी है 
जिन्होंने पीठ के पीछे,किया है  वार चुपके से ,
बहुत से ऐसे मित्रों की ,अभी पहचान  बाकी  है 
२ 
बड़े स्वादिष्ट होते ,दिल ,सभी का लूटते लड्डू 
अगर पुरसे हो थाली में,नहीं फिर  छूटते  लड्डू 
ख़ुशी,शादी के मौके पर ,सभी में बांटे जाते है,
हसीना कोई मुस्काती  ,तो मन में फूटते लड्डू 
३ 
अभी तक ये मेरी समझ में ये न आया 
 मेरी पोस्ट पर तुमने ,'थम्प्सअप 'लगाया     
ये मेरे विचारों की  तारीफ़ की  है ,
या फिर तुमने मुझको ,अंगूठा दिखाया 

घोटू 

Saturday, June 17, 2017

बुढ़ापा -तीन लघु  कवितायें 

१ 
ज्यों ज्यों ये उमर आदमी की आगे बढे है 
त्यों त्यों ये भूत आशिक़ी का सर पे चढ़े है 
हम तो पढ़ा करें है अलिफ़ लैला के किस्से,
बीबी हमारी , गीता,भागवत  जी ,पढ़े है 
अंकलजी कह के तोड़ देवे दिल वो हमारा ,
जिसकी भी मोहब्बत हमें परवान  चढ़े है 
दिल फेंकने की आदत ,नहीं हमसे छूटती ,
मालूम है इस खेल में , जूते भी पड़े है 

२ 
हमको क्यों बूढा समझते आप है 
ये  हमारे  साथ  ना  इन्साफ   है 
गहरा जल बहता सदा चुपचाप है 
हौंसलों का  नहीं  होता   माप  है 
ढोलकी  में बची अब भी थाप है 
जिंदादिल बंदा ये लल्लनटॉप  है 
जवानी है आप में तो क्या हुआ ,
अरे हम तो जवानो के बाप  है 
३ 
सहा हमने जो नहीं है ,कौनसा वो गम है बाकी 
जमाने के ,अभी सहना ,और भी है सितम बाकी 
यूंही बूढ़ा समझ कर के ,तिरस्कृत मत करो हमको,
अरे इस बुझते  दिए में ,अभी भी  दमखम है बाकी 

घोटू 

Thursday, June 15, 2017

रंग भेद की दरार

एक गेंहूं है ,एक चावल है ,
दोनों ही सबका पेट भर रहे है
दोनों ही अन्न है ,
पर लोग उनमे अंतर कर रहे है
गेंहूं का रंग भूरा है और चावल सफ़ेद है
इसलिए गेंहूं के साथ ,हमेशा होता रंगभेद है
वह बेचारा गौरवर्णी नहीं,
इसलिए हमेशा उसका दलन किया जाता है
उसे पीसा जाता है ,
उसका उत्पीड़न किया जाता है
और जब वो पिस कर आटे या मैदा जैसा ,
सफ़ेद नहीं हो जाता है
तब ही वो खाने के काम में आता है
हिन्दुस्थान में उससे रोटी,पूरी,परांठा ,
और हलवा बनाते है
विदेशी उसकी ब्रेड ,नूडल ,पिज़ा और पास्ता ,
बना कर खाते है
गेंहू ,अपना आकार खोकर  ,
हमेशा देते है अपना बलिदान
और सबका पेट भरते है ,
सेवा भावी है महान
पर फिर भी पूजा में उसे कलश के नीचे बिछाते है
और गौरवर्णी चावल को ,प्रभु पर चढ़ाते है
गेहूं पिस कर होता है क्षत विक्षत
और चावल रहता है अक्षत
गोरा,सफ़ेद ,सुन्दर,
पूरा का पूरा ही  पकाया जाता है
कभी पुलाव,कभी बिरयानी ,और अक्सर,
सादा  ही खाया जाता है
खिली खिली सी उसकी रंगत ,
और उसकी मुलायम सी सूरत
अनोखा स्वाद देती है ,जो मन को भाता है
और जब उसे दूध में पकाते है ,
तो खीर बन कर चौगुना स्वाद आता है
कभी मीठे केसरी भात ,
या कभी खिचड़ी बना कर उसे जाता है परोसा
तो कभी उससे इडली बनती है
और कभी बनता है डोसा
मस्तक पर तिलक लगा कर अक्षत से सजाते है
चावल के खाने को राजसी बतलाते है
देख कर के इस तरह का रंग भेद
और पक्षपाती व्यवहार
गेंहूं के मन में पद गयी है दरार
जिसका असर बाहर से भी
,उसके हर दाने पर है दिखता
जाने कब जायेगी ,हमारे दिलों से,
रंगभेद की ये मानसिकता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

     बच्चों को बचपन जीने दो

आज बच्चों की ये हालत हो गयी है
बचपने की मौज मस्ती खो गयी है
कॉम्पिटिशन से डरे,सकुचाये मन में
आज बच्चे ,जी रहे है ,टेंशन में
माँ पिता भी जाने क्या क्या सोचते है
अपने सपने,बच्चो पर वो थोपते है
कार्बाइड से पके ज्यों आम कच्चा
ले रहा इस तरह कोचिंग हरेक बच्चा
कभी हमने भी तो था बचपना जिया
माँ की छाती  से लगे थे ,दूध पिया
बोतलों का उन दिनों  फैशन नहीं था
मातृत्व से बड़ा तब  यौवन  नहीं था
लोरियां सुनते थे आती नींद तब थी
पालने में झूलने की उमर  जब थी
उन दिनों ना क्रेच थे ना नर्सरी थी
घर की रौनक ,भाई बहनो से भरी थी
 जिद पे आते ,रखते थे सबको नचा के
खेलते थे ,झुनझुना ,खुश हो बजा के
 सीधासादा  ,प्यारा सा ,बचपन वही था
हाथ में बच्चों के  मोबाईल नहीं था
बड़े हो स्कूल जब जाने लगे हम
गिल्ली डंडा और कबड्डी ,खेले हरदम
स्कूलों में ही सिर्फ करते थे पढाई
नहीं कोचिंग या कोई ट्यूशन लगाईं
फर्क इतना आगया हालात में अब
एक मोबाईल सभी के हाथ में अब
उसी पर ऊँगली घुमाकर व्यस्त रहता
पढाई के बोझ से वो त्रस्त रहता
कॉम्पिटिशन भूत सर पर चढ़ रहा है
खेलता ना,सिर्फ बच्चा पढ़ रहा है
डॉक्टर ,इंजीनियर सब चाहे बनना
इसलिए दिनरात पड़ता उन्हें खटना
और फिर भी कितने है जो चूक जाते
उनके देखे ,सभी सपने ,टूट जाते
और 'डिप्रेशन' उन्हें फील सालता है
मगर इसमें उनकी होती क्या खता है
सब के सब उत्तीर्ण तो हो नहीं सकते
बोझ क्षमता से अधिक ढो नहीं सकते
अतः बेहतर,नहीं थोंपे खुद को उन पर
मन मुताबिक़ ,बनाने दे ,अपना फ्यूचर
बोझ ज्यादा ,पढाई का ,नहीं लादें
जीने उनको ,प्रेम से निज बचपना दे
क्योंकि बचपन ,नहीं आता लौट कर है
जिंदगी की,सबसे प्यारी ,ये उमर  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


सभी को अपनी पड़ी है
सभी को अपनी पड़ी है ,
कौन किसको पूछता है
पालने को पेट अपना,
हर एक बंदा जूझता है
कोई जुट कर जिंदगी भर ,
है सभी साधन जुटाता
कोई पाता विरासत में ,
मौज जीवन भर मनाता
कोई जीवन काटता है,
कोई जीवन जी रहा है
कोई रहता है चहकता ,
कोई आंसू पी रहा है
अपनी अपनी जिंदगी का,
नज़रिया सबका अलग है
कोई तो है मस्त मौला ,
कोई चौकन्ना,सजग है
कोई जाता मंदिरों में ,
लूटने दौलत धरम की
ये जनम तो जी न पाता ,
सोचता अगले जनम की
गंगाजी में लगा डुबकी,
पाप कोई धो रहा है
और वो इस हड़बड़ी में,
आज अपना खो रहा है
कोई औरों के फटे में ,
मज़ा लेकर झांकता है
अपनी कमियों को भुलाकर ,
दूसरों की ,आंकता है
नहीं नियति बदल सकती ,
भाग्य के आधीन सब है
उस तरह से नाचते है ,
नचाता जिस तरह रब है
बहा कर अपना पसीना ,
तुमने जो दौलत कमाई
वो भला किस कामकी जो ,
काम तुम्हारे न आयी
इसलिए अपनी कमाई,
का स्वयं उपभोग कर लो
जिंदगी जितनी बची है,
उतने दिन तक मौज कर लो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नयन

नयन जिनमे बसते है सपने सुनहरे ,
नयन मिलते ,परिणिती होती मिलन में
नयन जो कि चमकते है ,हर ख़ुशी में,
नयन जो कि छलकते है हरएक गम में
नयन जिनमे भरे है  आंसूं  हजारों
नयन जो कि नींद के काफी सगे  है
नयन कजरारे सदा मन मोहते है ,
नयन जिससे दुनिया ये सुन्दर लगे है
नयन जिनमे छवि जब बसती किसी की ,
प्रेम की अनुभूति का आनंद होता
नयन खुलते ,जागृत होता है जीवन ,
नयन होते बंद,जीवन  अंत होता
नयन जो की आइना है भावना का,
नयन का रंग क्रोध में है लाल होता
नयनो  में छाती गुलाबी डोरियाँ जब ,
प्रेमियों का मिलन और अभिसार होता
नयन जब निहारते है ,अपलक तो,
बने भँवरे,रूप का रसपान करते
नयन आधे बंद ,करते सोच चिंतन,
बंद होकर ,योग करते,ध्यान धरते
नयन से ही किसी की पहचान होती ,
नयन से ही हम किसी को आंकते है
नयन नटखट ,बावरे शैतान भी है,
चुप न रहते ,सदा इत उत झांकते है
नयन खोये खोये रहते प्यार में है,
नयन रोये रोये रहते , रार में है
नयन से ही हमें गोचर है सभी कुछ,
प्रभु का वरदान ये संसार  में है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, June 8, 2017

तुलसीदल 

कल मैं कुछ लाचार और बदहाल लोगों से मिला ,
दोस्त मेरे सब के सब ,पागल मुझे  कहने लगे 
माटी,माटी ठीक थी और पानी,पानी ठीक था ,
मिले दोनों जब तो सब ,दलदल उसे कहने लगे 
गंदा नाला  बहते बहते  ,जा के गंगा से मिला,
बदली किस्मत ,लोग गंगाजल  उसे कहने लगे 
काट कर जंगल उगाली ,ऊंची अट्टालिकाएं,
और फिर कांक्रीट का ,जंगल  उसे कहने लगे 
मीठा जल नदियों का खारे समन्दर से मिला पर,
धूप में तप जब उड़ा ,बादल  उसे कहने  लगे 
लड्डू का परशाद सारा ,पुजारी  चट कर गए,
प्रभु के हित जो बचा ,तुलसीदल उसे कहने लगे 

मदनमोहन बाहेती'घोटू' 

Wednesday, June 7, 2017

नयन की डोर 

नयन जिनमे बसते है सपने सुनहरे ,
नयन जो की डोर बांधे है मिलन में
नयन जो कि  चमकते है हर ख़ुशी में ,
नयन जो कि  छलकते है हरेक गम में 
नयन जिनमे कि भरा है अश्रु का जल ,
नयन जो कि नींद के  लगते  सगे  है 
नयन जो सज ,रूप करते चौगुना है,
नयन जिनसे दुनिया ये सुन्दर लगे है 
नयन जिनमे छवि जब बसती किसीकी ,
प्रेम की अनुभूति का आनंद  होता 
नयन खुलते ,जागृत होता है जीवन,
नयन होते बंद ,जीवन अंत  होता 
नयन जो कि भावना का आइना है,
नयन का रंग क्रोध में है लाल होता 
नयन में छाती गुलाबी डोरियां जब,
प्रेमियों का मिलन औरअभिसार होता 
नयन जब निहारते है अपलक तो,
बने भँवरे ,रूप का रसपान  करते 
नयन आधे बंद ,करते सोच ,चिन्तन ,
बंद होकर ,योग करते,ध्यान धरते 
नयन जब झुकते ,समझलो भरी हामी,
अधमुंधे से नयन ,समझो छायी मस्ती 
छवि जिसकी बसा करती है नयन में ,
चुरा लेती हृदय ,ऐसी दिल में बसती 
चुराते है हम कभी नयना  किसी से,
दिखाते है हम कभी नयना किसी को 
मिलाते है जब नयन हम जो किसी से 
कोई अच्छा बहुत लगने लगता जी को 
नयन से ही किसी की पहचान होती ,
नयन से ही हम किसी को आंकते है 
नयन नटखट ,बावरे  शैतान भी है,
चुप न रहते ,सदा  इत उत झांकते है  
नयन खोये खोये रहते प्यार में है ,
नयन रोये रोये रहते   रार में है 
नयन से ही हमे  गोचर है सभी सुख ,
प्रभु का वरदान ये संसार में  है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जी का कमाल 

हमने उनसे पूछा कुछ तो उनने हमसे ' जी' कहा 
हमने कुछ माँगा तो जैसी आपकी मरजी   कहा 
उनकी इस छोटीसी 'जी' ने ,ऐसा जी में घर किया 
हमको एक उत्साह से और एनर्जी से  भर दिया 
झट से राजी हो गए हम ,भुगतते है  उसका फल 
उनकी 'हाँ जी ,हाँ जी'करते कटते है दिन आजकल

घोटू  
बीबी लगती है परी 

उमर ने ढाया कहर ,ना  रही  काया  छरहरी 
मगर बीबी सबको अपनी ,हमेशा लगती परी 
क्योंकि वो ही इस उमर में,घास तुमको डालती 
बिमारी में और मुश्किल में तुम्हे  संभालती 
सर जो दुखता ,तो दबाती,बाम सर पर मल तुम्हे 
चाहते जब ,चाय संग ,देती पकोड़े  तल  तुम्हे 
पीठ खुजलाती तुम्हारी और दबाती पैर  है 
मंदिरों में पाठ  पूजा ,कर मनाती खैर है  
तुम्हारे खर्राटों में भी ,ठीक से सो पाए जो 
तुम्हारी तकलीफ ,पीड़ा में बहुत घबराये जो 
हमेशा जो चाहती है ,तुम्हारी लम्बी उमर 
रहती पूरे दिवस भूखी,बरत करवा चौथ कर 
टाइम टाइम पर दवाई की ,वो दिलाती याद है 
जिसके कारण छाई खुशियां सारा घर आबाद है  
काम घर के करे सारे ,चाहे कितना भी थके 
सारे रीति रिवाजों का ,ध्यान जो पूरा रखे 
जवानी में काम में हम सदा रहते व्यस्त थे 
याद करिये ,बीबी को हम ,देते कितना वक़्त थे 
सिर्फ आकर बुढ़ापे में ,होती ऐसी बात है 
मियां बीबी साथ में रहते सदा ,दिन रात है 
उसकी सब अच्छाइयों का ,हमें होता भान है 
पूर्ण जो तुम पर समर्पित बीबी गुण की खान है 
पसंदीदा खाना मिलता ,समय पर,उसकी वजह 
इस उमर मे हम हैं  उस पर आश्रित ,पूरी तरह 
भले उसको अब न भाते ,जवानी के चोंचले 
मगर फिर भी बुलंदी पर रहते उसके हौंसले 
होश अब भी ,उड़ा देती, उसकी नज़रें मदभरी 
इसलिए ही बीबी अपनी ,सबको लगती है परी 

मदन मोहन बाहेती' 'घोटू'
छेड़छाड़  

आज सवेरे छेड़छाड़ का ,
एक नया मामला नज़र आया 
लड़कियों के कॉलेज आगे ,
एक काला सा रोमियो ,बादल था मंडराया 
आतीजाती लड़कियों पर ,
छींटाकशी  रहा था कर  
लड़कियां भाग रही थी ,
दुपट्टे से छुपा कर ,अपना सर 
पर वो अपनी हरकत से ,
बाज नहीं आ रहा था 
कभी आवाजे निकालता था ,
कभी खीसें निपोर ,दांत चमका रहा था 
तभी 'रोमियो स्कवाड 'की इंस्पेक्टर 
हवा आयी और ले गयी ,
बादल को अपने साथ पकड़ कर 
समझ में आया आज है 
कैसा  रोमियो मुक्त ,योगी का राज है 

घोटू 

Tuesday, June 6, 2017

यूं ही उहापोह में 

उलझते ही रहे हम आरोह और अवरोह में 
जिंदगी हमने बिता दी,यूं ही उहा पोह में 

दरअसल क्या चाहिये थी नहीं खुद को भी खबर 
कहाँ जाना है हमें और कहाँ तक का है सफर 
डगर भी अनजान थी और हम भटकते ही रहे ,
कभी इसकी टोह में और कभी उसकी टोह में 
जिंदगी हमने बिता दी ,यूं ही उहापोह  में 

दोस्त कोई ,कोई दुश्मन ,लोग कितने ही मिले 
दिया कोई ने सहारा ,किसी ने दी मुश्किलें 
हाल कोई ने न पूछा ,नहीं जानी खैरियत,
उमर सारी ,हम तड़फते रहे जिनके मोह में 
जिंदगी हमने बिता दी ,यूं ही उहापोह में 

बेकरारी में दुखी हो, दिन गुजरते ही रहे 
रोज हम जीते रहे और रोज ही मरते रहे 
ऐसी स्थिरप्रज्ञ अब हालत हमारी होगयी ,
अब मिलन में सुख न मिलता,और गम न विछोह में 
जिंदगी हमने बिता दे ,यूं ही उहापोह में 

घोटू 
आशिक़ी का मजा 


ठीक से ना देख पाते  ,नज़र भी कमजोर  है 
अस्थि पंजर हुए ढीले ,नहीं तन में जोर है 
खाली बरतन  की तरह हम खूब करते शोर है
दिल की इस दीवानगी का मगर आलम और है 
देख कर के हुस्न को बन जाता आदमखोर है 
हमेशा ये दिल कमीना ,मांगता कुछ 'मोर ' है 
शाम ढलती है ,उमर का ,आखिरी ये छोर है 
बुढ़ापे की आशिकी का ,मज़ा ही कुछ और है 

घोटू 
पक्षपात 

'फेवरेटिस्म ' याने की पक्षपात 
युगों युगों से चाय आ रही है ये बात 
किसी अपने चहेते का ,करने को उत्थान 
किसी अन्य काबिल व्यक्ति का बलिदान 
ये सिलसिला महाभारत काल से चला आ रहा है 
अपने पट शिष्य अर्जुन को शीर्ष पर रखने के लिए ,
द्रोणाचार्यों द्वारा
 एकलव्य का अंगूठा काटा जा रहा है 
सूतपुत्र कह कर कर्ण को ,
उसके अधिकारों से वंचित  करवाना 
ये 'पॉलिटिक्स' तो है काफी पुराना 
एकलव्य 'शिड्यूल ट्राइब 'और
कर्ण 'शेड्यूल कास्ट' था 
और उन दिनों 'रेज़र्वेशन'का ' बेनिफिट 'भी,
नहीं उनके पास था 
इसलिए अच्छे खासे काबिल होने पर भी ,
ये दोनों पनप  नहीं पाए 
गुरुदक्षिणा के नाम पर ,
एकलव्य का अंगूठा कटवा दिया गया ,
और कुंती पुत्र होने पर भी 
कर्ण ,सूतपुत्र ही कहलाये 
श्री कृष्ण ने भी ,जब था महाभारत का संग्राम 
अपने फेवरिट अर्जुन की ऊँगली रखी थी थाम 
उसके रथ का सारथी  बन ,
कृष्ण अर्जुन को अपनी मन मर्जी के माफिक घुमाते थे 
और वो जब अपने भाई बंधुओं से लड़ने से हिचकता था,
उसे गीता का ज्ञान  सुनाते थे 
और फिर उसके पक्ष  को जिताने के लिए,
कृष्णजी ने क्या क्या खेल नहीं खेले 
बर्बरीक का सर कटवाया ,कितने पापड़  बेले 
अपनी सोलह कलाएं ,
अपने फेवरिट को जिताने के लिए लगा दी 
इतने लोगों का सपोर्ट होते हुए भी ,
कौरवों की पराजय करवा दी 
कभी कभी अपने एक को फेवर देने के चक्कर में ,
दूसरों का भी फायदा है हो जाता 
अगर ये पक्षपात न होता ,
तो क्या हमें गीता का ज्ञान मिल पाता 
'फेवरिटिस्म 'से तो बच नहीं पाए है भगवान्
जो श्रद्धा से उनकी भक्ति करे ,
उसे वरदान देकर होते है मेहरबान 
भले ही वरदान पाकर ,
वो उन्ही के अस्तित्व को खतरा बन जाए 
और भस्मासुर की तरह 
उन्ही के पीछे पड़  जाए 
पर जब किसी की सेवा और भक्ति ,
आपको इतना अभिभूत कर दे ,
कि आपका अहम् ,
उसे उपकृत करने को आमादा हो जाए 
तो फिर कौन किसको समझाये 
ऐसे हालत में आप अपना ही नुक्सान करते है 
अपने ही हाथ 
ऐसे में कभी कभी ,पक्षपात,
बन जाता है आत्मघात 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
             देश-परदेश 

वहां ये है,वहां वो है ,बहुत सुनते शोर थे ,
मन में उत्सुकता जगी तो हमने भी सोचा चलें 
हक़ीक़त में वो जगह कैसी है,कैसे लोग है,
चलो हम भी देख लें,दुनिया की सारी हलचलें 
गुजारे दो चार दिन तो शुरू में अच्छा लगा ,
मगर थोड़े दिनों में ही लगा कितना फर्क है 
देख कर भौतिक सुखों को, ऐसा लगता स्वर्ग है,
मगर जब रहने लगो तो होता बड़ा गर्क  है 
भावना से शून्य सब  और है मशीनी जिंदगी,
मुल्क ठंडा ,लोगों के दिल की भी ठंडक देख ली 
सर्दियों में बर्फ के तूफ़ान से घिरते रहे ,
जगमगाती हुई रातों की भी रौनक देख ली 
भाईचारा कम मिला और लोग प्रेक्टिकल लगे,
आत्मीयता ,अपनापन ज्यादा नज़र आया नहीं 
चार दिन में यहाँ बनती,टूटती है जोड़ियां,
सात जन्मों का यहाँ पर संग दिखलाया नहीं 
जी रहे है लोग सारे ,अपनी अपनी जिंदगी ,
ले कभी सुध दूसरों की,किसी को फुर्सत नहीं 
रोज मिल जुल  बैठना ,वो यारी और वो दोस्ती 
गुमशुदा थे ये सभी,जज्बात की कीमत नहीं 
'डीप फ्रिज'में रखा खाना ,गर्म करिये,खाइये,
सौंधी सौंधी रोटियों की ,वहाँ खुशबू ना मिली 
बहुत खुल्लापन नज़र आया वहां संबंध में ,
मिला मुश्किल से किसी में ,वहां पर रिश्ता दिली 
अगर बेशर्मी खुलापन ,प्रगति की पहचान है ,
तो यकीनन ही वहां के लोग प्रगतिशील है 
मगर मेरे देश में है लाज,पर्दा आज भी ,
होता सन्मानित यहाँ पर नारियों का शील है 
वहां पर चौड़ी है सड़कें ,पर हृदय संकीर्ण है ,
यहाँ पर पगडंडियों में भी बरसता प्यार है 
वहां पर तो अकेलापन ,आदमी को काटता ,
और यहाँ पर भाईचारा,दोस्ती,,परिवार है 
वहां भी है पेड़ पौधे ,यहाँ पर भी वे सभी,
मगर पीपल,आंवला वट वृक्ष ,पूजित है यहाँ 
वहां नदियाँ,यहाँ नदियां ,बहती है हरदम सभी,
मगर माता मान कर ,नदियाँ सभी वन्दित यहाँ 
यहाँ सब रहते है मिल कर ,प्यार है,परिवार है 
तीसरे चौथे दिवस मनता कोई त्योंहार है 
यहाँ माता पिता बोझा नहीं आशीर्वाद है ,
ये यहाँ की संस्कृति के दिए सद संस्कार है
घूम फिर कर मैंने पाया ,देश मेरा धन्य है,
यहाँ जैसा सुखी जीवन ,कहीं पर भी है नहीं 
यहाँ का ऋतुचक्र ,सर्दी गर्मी,बारिश औ बसंत,
प्रकृति की ऐसी नियामत ,नज़र ना आयी कहीं 
पूजते माँ बाप को सब,संग सब परिवार है ,
सात फेरों में है बंधन ,सात जन्मों का यहाँ 
पति की लम्बी  उमर की कामना में भूखी रह ,
वरत करवाचौथ का ,करती कोई औरत कहाँ 
खाओ पीयो ,मौज करलो ,है वहां की संस्कृति ,
अहमियत ना नाते रिश्तों की ,न अपनापन वहां 
मेरी जननी,जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है ,
नतीजा मैंने निकाला ,घूम कर सारा जहाँ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'