Tuesday, July 15, 2014

देखे सपने

             देखे सपने

जग देखे सोयी आँखों से
मैंने उड उड़ ,बिन पाँखों से
बिना पलक अपनी झपकाये ,
            मैंने जग जग ,देखे सपने
अन्धकार का ह्रदय चीर कर
आती ज्योति रश्मि अति सुन्दर
तन मन में उजियारा फैला,
            मैंने  जगमग देखे सपने
जब भी चला प्रेम की राहें
तुझ पर अटकी रही निगाहें
कभी थाम लेगी तू बाँहें ,
            मैंने  पग पग ,देखे सपने
तेरी आस ,संजोये मन में,
रहा भटकता ,मैं जीवन में
रोज रोज ,आपाधापी में ,
              मैंने भग भग ,देखे सपने
कभी भाग्य चमकेगा मेरा
सख्त ह्रदय पिघलेगा तेरा
ये आशा ,विश्वास लिए मैं ,
              हुआ न डगमग ,देखे सपने
      
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नज़रिया-औरतों का

         नज़रिया-औरतों का

पति गैरों के गुण वाले ,और स्मार्ट दिखते है ,
     पति खुद का  हमेशा ही ,नज़र आता  निकम्मा है
सास में उसको दिखती है ,  कमी खलनायिका की,
       गुणों की खान लगती है ,हमेशा खुद की अम्मा है
ससुर कमतर नज़र आते ,हमेशा ही पिता से है,
      बहन के गाती है गुण पर ,ननद से पट न पाती है
जहाँ पर काटना है जिंदगी ,वो घर  न भाता है ,
          सदा तारीफ़ में वो  मायके के गीत  गाती   है
है खुदऔरत मगर अक्सर यही होता है जाने क्यूँ ,
           नज़र में उसकी,बेटी और बेटे में फरक  होता
बेटियां नूर है घर की ,वो खुद कोई की बेटी है,
          मगर वो चाहती दिल से, बहू उसकी  जने पोता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उम्र बढ़ी तो क्या क्या बदला

           उम्र बढ़ी तो क्या क्या बदला

गठीली थी जो जंघाएँ ,पड़  गयी गांठ अब उनमे ,
              कसा था जिस्म  तुम्हारा ,हुआ अब गुदगुदा सा है
कमर चोवीस इंची थी ,हुई चालीस इंची अब,
              पेट  पर पड़  गए है सल, हुलिया ही जुदा सा  है
लचकती थी कमर तुम्हारी ,चलती थी अदा से जब ,
              आजकल चलती हो तुम तो,बदन सारा लचकता है
हिरन जैसी कुलाछों में,आयी गजराज की मस्ती,
              दूज का चाँद था जो ,हो गया ,अब वो पूनम का है
भले ही आगया है फर्क काफी तन में तुम्हारे ,
               तुम्हारे मन का भोलापन ,वही प्यारा सा है निर्मल
आज भी प्यार से जब देखती हो,जुल्मी नज़रों से ,
              दीवाना सा मैं हो जाता,मुझे कर देती तुम  पागल
कनक की जो छड़ी सा था ,हुआ है तन बदन दूना ,
               तुम्हारा प्यार मुझसे हो गया है चौगुना   लेकिन
हो गए इस तरह आश्रित है हम एक दूजे पर ,
               न रह सकती तुम मेरे बिन,न मैं रहता तुम्हारे बिन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'