Friday, June 10, 2011

मेह सुख -देह सुख

मेह सुख -देह सुख
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सूरज के,यौवन की,
प्रखर तेज किरणों का,
पाया जो आलिंगन,
तप्त हुई धरती
अवनि की तपस देख,
घुमड़ घुमड़ घिरे मेघ,
अम्बर पर छाये,
आश्वस्त हुई धरती
मेघों ने गरज गरज,
गया जब मिलन गीत,
साजन के सपनो में,
मस्त हुई धरती
बारिश की फुहारें,
भिगा गयी सब तन मन,
सौंधी सी गंधायी,
तृप्त हुई धरती

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम खरबूजे,मै खरबूजा

तुम खरबूजे,मै खरबूजा
हम दोनों में फर्क बहुत क्यों,
एक है मीठा ,फीका दूजा
एक जात के हम दोनों,
फिर भी क्यों है इतना अंतर
लोग मुझे कहते है दानव,
तुम कहलाते,देव,पैगम्बर
लोग घृणा करते है मुझसे,
तुम्हारी होती है पूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
 रूप रंग में बड़ा फर्क है,
अलग अलग हम क्यों दिखते है
इतना रंग भेद क्यों होता,
हम सस्ते,महंगे बिकते है
सब खरबूजे, फिर भी,कोई,
'सिंह''खान' है,कोई 'डिसूज़ा'
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
है विभिन्न रंगों के गूदे,
कहीं सफ़ेद,हरा,  या पीला
अलग,अलग है रंग रक्त का,
देखो प्रभु की कैसी लीला
खरबूजे को देख बदलता ,
है क्यों रंग ,हरेक खरबूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हवा,धरती और बादल

हवा,धरती और बादल
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हवाओं मुस्कराओ आज तुम,  दिन फिर गए मेरे
कि देखो आज छाये है धुमड कर घन,गगन घेरे
गरज है ये नहीं घन की,मिलन का गीत आता है
बुझाने प्यास उर की आज मेरा मीत आता है
धरा ने जो कहा ये तो,यूँ मुस्का के ,हवा बोली
तेरे साजन,हमारे भी,तो कुछ लगते,  अरी भोली
करेंगे दिल मेरा ठंडा,तुम्हारी,प्यास के पहले
कलेजे से मेरे लग कर,लगेंगे फिर गले तेरे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'