Wednesday, October 31, 2018

प्यार बांटते चलो 


ये नाज ओ  नखरे,रूप अदा 
अच्छे लगते है यदा कदा 
हथियार जवानी वाले ये ,
जादू इनका ना चले सदा 

पर यदि अच्छे हो संस्कार 
मन में हो सेवाभाव ,प्यार    
जीवन भर साथ निभायेंगे ,
और फैलाएंगे  सदाचार        

तुम त्यागो मन का अहंकार 
सदगुण लाओ और सदविचार 
ये पूँजी ख़तम नहीं होगी ,
तुम रहो बांटते ,बार बार 

घोटू 
विश्वास और सुख 

आँख मूँद कर करे भरोसा पति पर,उससे कुछ ना कहती 
मैंने देखा ,ऐसी पत्नी ,अक्सर सुखी और खुश रहती 

सदा पति पर रखे नियंत्रण ,बात बात में टोका टाकी 
उस पर रखती शक की नज़रें ,हर हरकत पर  ताकाझांकी 
कहाँ जा रहे ,कब आओगे ,कहाँ  गए थे ,देर क्यों हुई 
आज बड़े खुश नज़र आरहे ,कौन तुम्हारे साथ थी मुई 
बस इन्ही पूछा ताछी से ,शक का बीज बो दिया करती 
थोड़ा वक़्त प्यार का मिलता, यूं ही उसे खो दिया करती 
पति आये तो जेब टटोले ,ढूंढें काँधे पड़े बाल को 
जासूसों सी पूछा करती ,है दिन भर के हालचाल को 
होटल से खाना मंगवाती ,जिसे रसोईघर से नफरत 
व्यस्त रहे शॉपिंग,किट्टी में ,पति के लिए न पल भर फुर्सत 
ऐसी पत्नी के जीवन में ,नहीं प्रेम की सरिता  बहती 
मैंने देखा ऐसी पत्नी ,हरदम बहुत दुखी है रहती 

और एक सीधीसादी सी ,भोली सूरत ,सीधे तेवर 
पतिदेव की पूजा करती ,उसे मानती है परमेश्वर 
करती जो विश्वास पति पर ,जैसा भी है ,वो अच्छा है 
उससे कभी विमुख ना होगा ,उसका प्यार बड़ा सच्चा है 
इधर उधर पति नज़रें मारे ,तो हंस कर है टाला  करती 
सब का मन चंचल होता है ,कह कर बात संभाला करती 
ना नखरे ना टोकाटाकी ,ना ही झगड़े ,ना ही अनबन 
अपने पति पर प्यार लुटाती,करके खुद को पूर्ण समर्पण 
अच्छा पका खिलाती ,दिल का रस्ता सदा पेट से जाता 
ऐसा प्यार लुटानेवाली ,पत्नी पर पति बलिबलि  जाता 
पति के परिवार में रम कर ,संग हमेशा सुख दुःख सहती 
मैंने देखा ,ऐसी पत्नी ,अक्सर सुखी और खुश रहती 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
प्रयोजन और भोजन 


आस्था में प्रभु की मंदिर गए ,
चैन मन को मिलेगा ,विश्वास था 
श्रद्धानत ,आराधना में लीन थे ,
लगा होने शांति का आभास था 
व्यस्त हम तो रहे करने में भजन ,
लोग आ पूरा प्रयोजन कर गए 
हमें चरणामृत और तुलसीदल मिला ,
लोग पा परशाद ,भोजन कर गए 

घोटू 
मगर बिस्कुट कुरकुरे ही चाहिए 


भले खाएंगे डुबो कर चाय में ,
मगर बिस्कुट कुरकुरे ही चाहिए 
कल सुबह होगी जलन, देखेंगे कल ,
पर पकोड़े चरपरे ही चाहिये 
उनकी ना ना बदल देंगे हाँ में पर,
नाज नखरे मदभरे ही चाहिए 
प्रेम करने में उतर जाएंगे सब ,
वस्त्र लेकिन सुनहरे ही चाहिये 

घोटू 

माथुर साहेबकेँ जन्मदिवस पर 

व्यक्तित्व आपका अति महान 
माथुर साहब ,तुमको प्रणाम 

शीतल स्वभाव ,तुम गरिमामय ,
मुख पर बिखरी  पूरनमासी 
मुस्काते ,खिले खिले हरदम ,
हो नमह नमह तुम इक्यासी 
ओ  भातृभाव  के अग्रदूत ,
हो मौन ,तपस्वी,शांत,सिद्ध 
ओ ज्ञानपीठ के मठाधीश ,
ओ दंत चिकित्सक तुम प्रसिद्ध 
तुमने कितने कोमल कपोल ,
को खोल,हृदय की पीर हरी 
हो समयसारिणी ,अनुशासित ,
तुम सदा समय के हो प्रहरी 
गरिमा की माँ ,ममता की माँ ,
है छुपी हुई तुम  माथुर में 
साक्षर स्नेह की  मूरत हो  ,
सबके प्रति प्रेम भरा उर में 
ये आलम अगर बुढ़ापे में ,
क्या होगा हाल जवानी में 
निश्चित ही आग लगा देते,
 होंगे बर्फीले पानी में  
तुम जिसका मुख छूते होंगे,
निःशब्द हुआ करती होगी 
ले जाती होगी प्रेम रोग ,
सब भुला दन्त की वह रोगी 
ये खंडहर साफ़ बताते है ,
कितनी बुलंद थी इमारत 
गायक,लायक ,नायक कर्मठ ,
तुम सबके मन की हो  चाहत 
है यही दुआ सच्चे दिल से ,
सौ वर्ष जियो तुम अविराम 
माथुर साहब ,तुमको  प्रणाम 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
 

Tuesday, October 23, 2018

            नारी जीवन


                                       कितना मुश्किल नारी जीवन

उसे बना कर रखना पड़ता,जीवन भर ,हर तरफ संतुलन

                                       कितना मुश्किल नारी जीवन

जिनने जन्म दिया और पाला ,जिनके साथ बिताया  बचपन

उन्हें त्यागना पड़ता एक दिन,जब परिणय का बंधता बंधन 

माता,पिता,भाई बहनो की , यादें  आकर  बहुत  सताए

एक पराया , बनता  अपना , अपने बनते ,सभी  पराये

नयी जगह में,नए लोग संग,करना पड़ता ,जीवन व्यापन

                                       कितना मुश्किल नारी जीवन

कुछ ससुराल और कुछ पीहर ,आधी आधी वो बंट  जाती

नयी तरह से जीवन जीने में कितनी ही दिक्कत   आती

कभी पतिजी  बात  न माने , कभी  सास देती है ताने

कुछ न  सिखाया तेरी माँ ने ,तरह तरह के मिले उलाहने

कभी प्रफुल्लित होता है मन, और कभी करता है क्रंदन 

                                     कितना मुश्किल नारी जीवन

इसी तरह की  उहापोह में ,थोड़े  दिन पड़ता  है  तपना

फिर जब बच्चे हो जाते तो,सब कुछ  लगने लगता अपना

बन कर फिर ममता की मूरत,करती है बच्चों का पालन

कभी उर्वशी ,रम्भा बन कर,रखना पड़ता पति का भी मन

 किस की सुने,ना सुने किसकी ,बढ़ती ही जाती है उलझन    

                                        कितना मुश्किल नारी जीवन

बेटा ब्याह, बहू जब आती  ,पड़े सास का फर्ज निभाना

तो फिर, बेटी और बहू में ,मुश्किल बड़ा ,संतुलन लाना

बेटा अगर ख्याल रखता तो, जाली कटी है बहू सुनाती

पोता ,पोती में मन उलझा ,चुप रहती है और गम खाती

यूं ही बुढ़ापा काट जाता है  ,पढ़ते गीता और  रामायण

                                 कितना मुश्किल नारी जीवन


मदन मोहन बाहेती'घोटू'

लक्ष्मीजी का बिजली अवतार 

होती देखी जब घर घर नारी की पूजा 
लख कर महिमा कलयुग की ,प्रभु को यह सूझा 
फॉरवर्ड होती जाती नारी दिन प्रतिदिन 
करदे ना मेरे खिलाफ वह यह आंदोलन 
जितने भी अवतार लिए ,सब पुरुष रूप धर
लक्ष्मीजी को बिठा रखा है घर के अंदर 
वह नारी है ,उसको आगे लाना होगा 
लक्ष्मीजी को अब अवतार दिलाना होगा 
किया विचार,तनिक कुछ सोचा ,मन में डोले 
पर क्या करते ,जाकर लक्ष्मीजी से बोले 
सुनो लक्ष्मी धरती पर छाया अँधियारा 
आवश्यक है अब होना अवतार हमारा 
होगा दूर अँधेरा ,उजियारा लाने से 
पर मैं तो डरता हूँ पृथ्वी पर जाने से 
कृष्ण रूप धर प्रकटूं ,आफत हो जायेगी 
सेंडिल खा खा मुफ्त हजामत हो जायेगी 
राम बनूँगा ,लोग कहेंगे ,कैसा  पागल 
मान बाप की बात अरे जाता है जंगल 
गर नरसिंह बनू तो भी आफत कर देंगे 
निश्चित मुझे अजायबघर में सब धर देंगे 
मैं डरता हूँ ,सुनो लक्ष्मी ,मेरी मानो 
जरा पति के दिल के दुःख को भी पहचानो 
अबके से तो तुम ही लो अवतार धरा पर 
तुम भी दुनिया को देखो  पृथ्वी पर जाकर
सूरज सी चमको और तम को दूर भगाओ 
मेरी कमले ,कमली से बिजली बन जाओ 
मेरी मत सोचो ,मैं काम चला लूँगा 
मैं कैसे भी अपनी दाल गला लूँगा 
मगर प्रियतमे ,कभी कभी मुझ तक भी आना 
बारिश की बदली के संग मुझ से मिल जाना 
कहते कहते आंसूं की बौछार हो गयी 
पति की व्यथा देख लक्ष्मी तैयार हो गयी 
बिदा  लक्ष्मी हुईऑंख से आंसू टपके 
 पहले समुद्र से प्रकटी थी वह लेकिन अबके 
नारी थी ,उसने नारी का ख्याल किया 
ना समुद्र पर नदिया से अवतार लिया 
तो बंधे बाँध से टकरा प्रकति बिजली देवी 
किया अँधेरा दूर सभी बन कर जनसेवी 
चंद दिनों में ही फिर इतना काम बढ़ाया 
दुनिया के कोने कोने में नाम बढ़ाया 
बिजली को अवतार दिला सच सोचा प्रभु ने 
बिन बिजली के तो है सब काम अलूने 
रातों को चमका करती ,कितनी ब्यूटीफुल 
बटन दबाते ,जल जाती  ,सचमुच वंडरफुल 
बिन बिजली के तो सूनी है महफ़िल सारी 
महिमा कितनी महान ,धन्य बिजली अवतारी 
इतनी लिफ्ट मिली लेकिन फिर भी ना फूली 
वह नारी है ,अपना नारीपन ना भूली 
चूल्हे चौके में ,बर्तन, सीने धोने में 
बाहर और भीतर घर के कोने कोने में 
बिजली जी ने अपना आसन जमा लिया है 
सच पूछो  ,नारी को कितना हेल्प किया है 
उल्लू से ये तार बने विजली के वाहन 
अब दीपावली पर होता बिजली का पूजन 
इतनी जनप्रिय ,किन्तु पतिव्रता धर्म निभाती 
जो छूता ,धक्का दे उसको दूर भगाती 
जब थक जाती है तो फ्यूज चला जाता है 
भक्तों यह बिजली, वही लक्ष्मी माता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

लक्ष्मी जी का परिवार प्रेम
(समुद्र मंथन से १४ रत्न प्रकट हुए थे-शंख,एरावत,उच्च्श्रेवा ,धवन्तरी,
कामधेनु,कल्प वृक्ष,इंद्र धनुष,हलाहल,अमृत,मणि,रम्भा,वारुणी,चन्द्र और लक्ष्मी
-तो लक्ष्मी जी के तेरह भाई बहन हुए,और समुद्र पिताजी-और क्योंकि
विष्णु जी समुद्र में वास करते है,अतः घर जमाई हुए ना )

एक दिन लक्ष्मी जी,अपने पति विष्णु जी के पैर दबा रही थी

और उनको अपने भाई बहनों की बड़ी याद आ रही थी

बोली इतने दिनों से ,घरजमाई की तरह,

रह रहे हो अपने ससुराल में

कभी खबर भी ली कि तुम्हारे तेरह,

साला साली है किस हाल में

प्रभु जी मुस्काए और बोले मेरी प्यारी कमले

मुझे सब कि खबर है,वे खुश है अच्छे भले

तेरह में से एक 'अमृत 'को तो मैंने दिया था बाँट

बाकी बचे चार बहने और भाई आठ

तो बहन 'रम्भा'स्वर्ग में मस्त है

और दूसरी बहन 'वारुणी'लोगों को कर रही मस्त है

'मणि 'बहन लोकर की शोभा बड़ा रही है

और 'कामधेनु'जनता की तरह ,दुही जा रही है

तुम्हारा भाई 'शंख'एक राजनेतिक पार्टी का प्रवक्ता है
और टी.वी.चेनल वालों को देख बजने लगता है
दूसरे भाई 'एरावत'को ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं होगी
यू.पी,चले जाना,वहां पार्कों में,हाथियों की भीड़ होगी
हाँ ,'उच्च्श्रेवा 'भैया को थोडा मुश्किल है ढूंढ पाना
पर जहाँ अभी चुनाव हुए हो,ऐसे राज्य में चले जाना
जहाँ किसी भी पार्टी नहीं मिला हो स्पष्ट बहुमत
और सत्ता के लिए होती हो विधायकों की जरुरत
और तब जमकर 'होर्स ट्रेडिंग' होता हुए पायेंगे
उच्च श्रेणी के उच्च्श्रेवा वहीँ मिल जायेंगे
'धन्वन्तरी जी 'आजकल फार्मा कम्पनी चला रहे है
और मरदाना कमजोरी की दवा बना रहे है
बोलीवूड के किसी फंक्शन में आप जायेंगी
तो भैया'इंद्र धनुष 'की छटा नज़र आ जाएगी
और 'कल्प वृक्ष'भाई साहब का जो ढूंढना हो ठिकाना
तो किसी मंत्री जी के बंगले में चली जाना
और यदि लोकसभा का सत्र रहा हो चल
तो वहां,सत्ता और विपक्ष,
एक दूसरे पर उगलते मिलेंगे 'हलाहल'
अपने इस भाई से मिल लेना वहीँ पर
और भाई 'चंद्रमा 'है शिवजी के मस्तक पर
और शिवजी कैलाश पर,बहुत है दूरी
पर वहां जाने के लिए,चाइना का वीसा है जरूरी
और चाइना वालों का भरोसा नहीं,
वीसा देंगे या ना देंगे
फिर भी चाहोगी,तो कोशिश करेंगे
तुम्हारे सब भाई बहन ठीक ठाक है,कहा ना
फिर भी तुम चाहो तो मिलने चले जाना

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

द्रौपदी

पत्नी जी,दिन भर,घर के काम काज करती

एक रात ,बोली,डरती डरती

मै सोचती हूँ जब तब

एक पति में ही जब हो जाती ऐसी हालत

पांच पति के बीच द्रौपदी एक बिचारी

होगी किस आफत की मारी

जाने क्या क्या सहती होगी

कितनी मुश्किल रहती होगी

एक पति का 'इगो'झेलना कितना मुश्किल,

पांच पति का 'इगो ' झेलती रहती होगी

उसके बारे में जितना भी सोचा जाए

सचमुच बड़ी दया है आये

उसकी जगह आज की कोई,

जागृत नारी,यदि जो होती

ऐसे में चुप नहीं बैठती

पांच मिनिट में पाँचों को तलाक दे देती

या फिर आत्मघात कर लेती

किन्तु द्रौपदी हाय बिचारी

कितनी ज्यादा सहनशील थी,

पांच पुरुष के बीच बंटी एक अबला नारी

सच बतलाना,

क्या तुमको नहीं चुभती है ये बात

कि द्रौपदी के साथ

उसकी सास का ये व्यवहार

नहीं था अत्याचार?

सुन पत्नी कि बात,जरा सा हम मुस्काये

बोले अगर दुसरे ढंग से सोचा जाए

दया द्रौपदी से भी ज्यादा,

हमें पांडवों पर आती है,जो बेचारे

शादीशुदा सभी कहलाते,फिर भी रहते,

एक बरस में साड़े नौ महीने तक क्वांरे

वो कितना दुःख सहते होंगे

रातों जगते रहते होंगे

तारे चाहे गिने ना गिने,

दिन गिनते ही रहते होंगे
कब आएगी अपनी बारी
जब कि द्रौपदी बने हमारी
और उनकी बारी आने पर ढाई महीने,
ढाई महीने क्यों,दो महीने और तेरह दिन,
मिनिटों में कट जाते होंगे
पंख लगा उड़ जाते होंगे
और एक दिन सुबह,
द्वार खटकाता होगा कोई पांडव ,
भैया अब है मेरी बारी
आज द्रौपदी हुई हमारी
और शुरू होता होगा फिर,वही सिलसिला,
साड़े नौ महीने के लम्बे इन्तजार का
और द्रौपदी चालू करती,
एक दूसरे पांडव के संग,
वही सिलसिला नए प्यार का
तुम्ही बताओ
पत्नी जब महीने भर मैके रह कर आती,
तो उसके वापस आने पर,
पति कितना प्रमुदित होता है
उसके नाज़ और नखरे सहता
लल्लू चप्पू करता रहता
तो उस पांडव पति की सोचो,
जिसकी पत्नी,उसको मिलती,
साड़े नौ महीने के लम्बे इन्तजार में
पागल सा हो जाता होगा
उस पर बलि बलि जाता होगा
जब तक उसका प्यार जरा सा बासी होता,
तब तक एक दूसरे पांडव ,
का नंबर आ जाता होगा
निश्चित ही ये पांच पांच पतियों का चक्कर,
स्वयं द्रोपदी को भी लगता होगा सुख कर,
वर्ना वह भी त्रिया चरित्र दिखला सकती थी
आपस में पांडव को लड़ा भिड़ा सकती थी
यदि उसको ये नहीं सुहाता,
तो वह रख सकती थी केवल,
अर्जुन से ही अपना नाता
लेकिन उसने,हर पांडव का साथ निभाया
जब भी जिसका नंबर आया
पति प्यार में रह कर डूबी
निज पतियों से कभी न ऊबी
उसका जीवन रहा प्यार से सदा लबालब
जब कि विरह वेदना में तडफा हर पांडव
तुम्ही सोचो,
तुम्हारी पत्नी तुम्हारे ही घर में हो,
पर महीनो तक तुम उसको छू भी ना पाओ
इस हालत में,
क्या गुजरा करती होगी पांडव के दिल पर,
तुम्ही बताओ?
पात्र दया का कौन?
एक बरस में ,
साड़े साड़े नौ नौ महीने,
विरह वेदना सहने वाले 'पूअर'पांडव
या फिर हर ढाई महीने में,
नए प्यार से भरा लबालब,
पति का प्यार पगाती पत्नी,
सबल द्रौपदी!

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मुसीबत ही मुसीबत
———————–
मौलवी ने कहा था खैरात कर,
रास्ता है ये ही जन्नत के लिये
वहां जन्नत में रहेंगी हमेशा,
हूरें हाज़िर तेरी खिदमत  के लिये
ललक मन में हूर की ऐसी लगी,
आ गये हम मौलवी की बात में
सोच कर जन्नत में हूरें मिलेगी,
लुटा दी दौलत सभी खैरात में
और आखिर वो घडी भी आ गयी,
एक दिन इस जहाँ से रुखसत हुए
पहुंचे जन्नत ,वेलकम को थी खड़ी,
बीबी बन कर हूर,खिदमत के लिये
हमने बोला यहाँ भी तुम आ गयी,
हो गयी क्या खुदा से कुछ गड़बड़ी
अरे जन्नत में तो मुझ को बक्श दो,
इस तरह क्यों हो मेरे पीछे पड़ी
बोली बीबी मौलवी का शुक्र है,
दिया जन्नत का पता मुझको  बता
कहा था उसने की तू खैरात कर,
पांच टाईम नमाज़ें करके    अता
बताया था होगी जब जन्नत नशीं,
हूर बन कर फरिश्तों से खेलना
मुझको क्या मालूम था जन्नत में भी,
पडेगा मुझको ,तुम्ही को झेलना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गृह लक्ष्मी


गृह लक्ष्मी

नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृहलक्ष्मी है
जीवन को करती ज्योतिर्मय
उससे ही है घर का वैभव
जगमग जगमग घर करता है
खुशियों से आँगन भरता है
दीवाली की सभी मिठाई
उसके अन्दर रहे समाई
गुझिये जैसा भरा हुआ तन
रसगुल्ले सा रसमय यौवन
और जलेबी जैसी सीधी
चाट चटपटी ,दहीबड़े सी
फूलझड़ी सी वो मुस्काती
और अनार सा फूल खिलाती
कभी कभी बम बन फटती है
आतिशबाजी सी लगती है
आभूषण से रहे सजी है
प्रतिभा उसकी ,चतुर्भुजी है
दो हाथों में कमल सजाती
खुले हाथ पैसे बरसाती
मै उलूक सा ,उनका वाहन
जाऊं उधर,जिधर उनका मन
इधर उधर आती जाती है
तभी चंचला कहलाती है
मेरे मन में मगर रमी है
नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृह लक्ष्मी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, October 21, 2018

बुढ़ापे का प्रणय निवेदन 


तुम भी बूढी हो गयी हो ,और मैं भी हुआ बूढा 
चलो अब मिल कर करें हम ,एकता का स्वप्न पूरा 

कुछ हमारे,कुछ तुम्हारे,ख़्वाब कितने ही अधूरे 
वक़्त ने बेबस बनाया ,कर नहीं  हम  पाये पूरे 
अगर हमतुम जाएँ जो मिल,कर उन्हें साकार देंगे
और हमारी विवशता को ,एक नया  आकार देंगे 
अकेलापन, मन कचोटे ,काटती तन्हाईयाँ है 
ढक रही मन का उजाला ,भूत की परछाइयां है 
हमारी मजबूरियों का ,किया सबने बहुत शोषण 
आओ मिल कर,प्यार का हम ,करें पौधा ,पुनर्रोपण 
और फिर सिंचित करेंगे ,फलेगा जीवन अधूरा 
चलो अब मिल कर करें हम ,एकता का स्वप्न पूरा 

तुम्हारे मन में हिचक है ,लोग जाने क्या कहेंगे 
काम लोगों का यही है ,वो तो बस कहते रहेंगे 
क्या किसी ने कभी आकर ,हाल भी पूछा तुम्हारा 
बुढ़ापे की विवशता में ,क्या तुम्हे देंगे सहारा
 दूसरों की बात छोडो ,तुम्हारे परिवार वाले    
ढूंढते मौका है तुमको, किस तरह घर से निकाले 
जिंदगी के बचे कुछ दिन ,मिले बोनस में हमें है 
एक दूजे ,संग मिल कर ,अब ख़ुशी से काटने है 
नहीं तो  होगा हमारा ,बुढ़ापे में ,बहुत कूड़ा 
चलो अब मिल कर करें हम ,एकता का स्वप्न पूरा 
 तुम भी बूढी हो गयी हो ,और मैं भी हुआ बूढा 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Friday, October 19, 2018

डांडिया 

आओ 
हम रहें मिलजुल कर 
नहीं चलायें लाठियां ,एकदूजे पर 
सोच बड़ी करें 
लाठियां छोटी करे 
क्योंकि छोटी होने पर लाठियां 
बन जाती है डांडिया 
और डांडिया का खेल 
बढ़ाता है आपसी मेल 
माँ दुर्गा का यही आदेश है 
विजयदशमी का यही सन्देश है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, October 17, 2018

चुनाव का चक्कर 

पहले चुनाव के नेताजी ,तुम करते  हाथी के वादे 
जीता  चुनाव तो वो वादे ,रह जाते चूहे से आधे 
कोई ऋण माफ़ करा देगा ,कोई सड़कें बनवा देगा 
दे देगा बिजली कोई मुफ्त ,कोई पेंशन दिलवादेगा 
कोई देगा सस्ता गल्ला ,कोई दो रूपये में खाना 
कोई साईकिल ,टीवी बांटे ,कोई को साडी दिलवाना 
मांगे किसान, दो बढ़ा दाम ,खेती की लागत ज्यादा है 
कैसे घर खर्च चलाएं हम ,जब होता नहीं मुनाफा है 
तुम दाम बढाते फसलों के ,मंहगी बेचो ,मंहगी खरीद 
तो जनता चिल्लाने लगती है,भूखे मरने लगते गरीब 
करने उत्थान गरीबों का ,बैंकों से कर्ज दिला देते 
अगले चुनाव में वोटों हित ,तुम कर्जा माफ़ करा देते 
ऐसे लुभावने मन भावन ,वादे हर बार चुनावों में 
आश्वासन देकर हरेक बार ,फुसलाया इन नेताओं ने 
एक बात बताओ नेताजी ,ये पैसा कहाँ  से लाओगे 
तुम सिर्फ  टेक्स की दरें बढ़ा ,हम से ही धन निकलाओगे 
है पात्र छूट का निम्न वर्ग ,वो ही सब लाभ उठाएगा 
और उच्च वर्ग ,कर दंदफंद ,पैसे चौगुने कमायेगा 
बस बचता मध्यम वर्ग एक ,हर बार निचोड़ा जाता है 
करता वो नहीं टेक्स चोरी,सर उसका फोड़ा जाता है 
तुमने चुनाव के वक़्त किये  जिन जिन सुविधाओं के वादे 
सबकी छोडो,गलती से भी,यदि पूर्ण पड़े करना आधे 
भारत की अर्थव्यवस्था पर ,कितना बोझा पड़ सकता है
ऋण भी जो लिया विदेशो से ,कितना कर्जा चढ़ सकता है 
तुम सत्ता में काबिज होने ,क्यों जनता को भरमाते हो 
सत्ता पा भूल जाओगे सब ,क्यों झूठे सपन दिखाते हो 
और जीते तो सब भूल गए ,जब रात गयी तो गयी बात 
हम कुर्सी पर ,अब तो होगी ,अगले चुनाव में मुलाकात 
बन रामभक्त ,शिव भक्त कभी ,पहने जनेऊ बनते पंडित 
कह हो आये कैलाश धाम करते अपनी महिमा मंडित 
तुम बहुत छिछोरे छोरे हो ,तुम्हारा पप्पूपन न गया 
करते हो बातें अंटशंट ,तुम्हारा ये बचपन न गया 
और बनने भारत का प्रधान ,तुम देख रहे हो दिवास्वपन 
वो कभी नहीं पूरे होंगे ,करलो तुम चाहे लाख यतन 
आरक्षण आंदोलन करवा ,तुम हिन्दू मुस्लिम लडवा दो  
तुम घोल जहर प्रांतीयता का ,दंगे और झगड़े करवादो 
यूं गाँव गाँव मंदिर मंदिर ,क्या होगा शीश झुकाने से 
ठेले पर पीकर चाय ,दलित के घर पर खाना खाने से 
तुम सोच रहे इससे होगी ,बारिश तुम पर वोटों  वाली
है जनता सजग तुम्हारे इन झांसों में ना आने वाली 
वह समझ गयी है तुम क्या हो ,हो कितने गहरे पानी में  
तुम ऊल  जुलूल बना बातें ,बकते रहते नादानी में 
है जिसे देश से प्रेम जरा ,वो भला देश का सोचेगा  
कोई भी समझदार तुमको ,भूले से वोट नहीं देगा 
तुम जीत गए यदि गलती से ,दुर्भग्य देश का क्या होगा 
चमचे मलाई चाटेंगे सब ,और बचे शेष का क्या होगा 
मैं सोच सोच ये परेशान ,कि मेरे वतन का क्या होगा 
हर शाख पे उल्लू बैठेंगे ,तो मेरे चमन का क्या होगा 

घोटू  
मुर्गा नंबर सात 

एक नामी स्कूल में ,पढ़ता है मेरा भतीजा 
एक दिन स्कूल  से लौटा तो था बहुत खीजा 
मैंने पूछा बेटे ,क्यों हो इतने नाराज़ 
क्या भूखे हो ,मम्मी ने टिफिन नहीं दिया था आज 
वो भन्ना कर बोला चाचू ,ये भी होती है कोई बात 
बड़ी शैतान होती है ये लड़कियों की जात 
मैं बोलै क्या बात हुई,जरा खुल कर बता 
किस लड़की ने तुझे दिया है सता 
वो बोला ' मैं खड़ा था ,कुछ लड़कियां आई 
कनखियों से मेरी ओर देखा और मुस्कराई 
आगे चल एक लड़की के हाथ से एक रुमाल गिरा 
मैंने देखा तो शराफत का मारा ,मैं सिरफिरा 
दौड़ कर गया और रुमाल उठाया 
और उन लड़कियों के हाथ में पकड़ाया 
पर किसी ने भी नहीं दिया मुझको धन्यवाद 
उल्टा सब की सब खिलखिला कर हंस पड़ी ,
और बोली,'आज का मुर्गा नंबर सात '
और उन्होंने जोर से लगाया कहकहा 
सच चाचू ,आजकल तो शराफत का जमाना ही नहीं रहा '
ये लड़किया ,जानबूझ कर रुमाल गिरा देती है 
और शरीफ लड़कों को सता कर ,मज़ा लेती है 
ये लड़कियां भी अजब होती है 
शैतान ,सब की सब होती है 
इन्हे समझना बड़ा मुश्किल काम है 
हम बोले हाँ बेटे ,इसी चक्कर में ,
हमने गुजार दी ,उमर तमाम है 

घोटू 
उस रावण को कब मारोगे 

यह पर्व विजयदशमी का है ,मन में क्या तनिक विचारोगे 
इस रावण को तो जला दिया उस रावण को कब मारोगे 

ये तो कागज का पुतला था ,बस घास फूस से भरा हुआ 
तुम इसे जला क्यों खुश होते ,यह पहले ही मरा  हुआ 
कह इसे प्रतीक बुराई का ,निज कमी छुपाते आये हो 
अपने मन का भूसा न जला ,तुम इसे जलाते  आये हो 
तुम क्यों न जलाया करते हो ,सारी बुराइयां जीवन की 
फैला समाज का दुराचार ,बिगड़ी प्रवर्तियाँ  जन जन की 
बारह महीने में जो फिर फिर ,दूनी हो बढ़ती जाती है 
हो जाती पुनः पुनः जीवित ,हर बार जलाई  जाती है 
हर बस्ती में क्यों बार बार ,रावण बढ़ते ही जाते है 
साधू का भेष दिखावे का ,और जनता को  भरमाते है 
इस बढ़ती हुई बुराई को , कब तक ,कैसे संहारोगे 
इस रावण को तो जला दिया उस रावण को कब मारोगे 

वो कई बुराई का पुतला ,थे उसके कंधे ,दस आनन
पर बुद्धिमान ,तपस्वी था ,पंडित और ज्ञानी वो रावण 
वह अहंकार का मारा था ,जिससे थी बुद्धि भ्रष्ट हुई 
सीता का हरण किया उसने ,सोने की लंका नष्ट हुई 
अब गाँव गाँव और गली गली ,कितने रावण विचरा करते 
उसने थी सीता एक हरी ,ये सदबुद्धि  सबकी हरते 
कुछ सत्तामद में चूर हुए ,कुछ व्यभिचार में डूबे है 
कुछ लूटे देश ,कोई अस्मत ,गंदे सबके मंसूबे है 
कुछ ईर्ष्या द्वेष भरे रावण ,तो कुछ पापी,भ्रष्टाचारी 
कुछ रावण भेदभाव वाले,कुछ गुंडे,लंफट ,व्यभिचारी 
असली त्योंहार तभी जब तुम ,इनसे  छुटकारा पा लोगे  
इस रावण को तो जला दिया ,उस रावण को कब मारोगे 

तुम नज़र उठा कर तो देखो ,कितने रावण है आसपास
एक रावण भूख गरीबी का ,देता है पीड़ा और त्रास  
एक रावण है मंहगाई का ,कुपोषण और कमजोरी का 
एक रावण चोरबाज़ारी का ,बेईमानी ,रिश्वत खोरी का 
एक रावण काट रहा वन को ,एक जहर हवा में घोल रहा 
एक छुपा बगल में छुरी रखे ,पर मीठा मीठा बोल रहा 
एक रावण काला धन लेकर ,पुष्पक में  जाता है विदेश 
एक जाति  ,धर्म में बाँट रहा ,करवाता दंगे और कलेश  
हिम्मत हनुमान सरीखी हो और तीखे तेवर लक्ष्मण से 
तब ही छुटकारा मुमकिन है ,इन दुष्ट बढ़ रहे  रावण से 
तुम इनका हनन करो , भारत माता  का क़र्ज़ उतारोगे 
इस रावण को तो जला दिया ,उस रावण को कब मारोगे 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
कोई मुझे कहे जो बूढा 


कोई मुझे कहे जो बूढा ,तो मुझको खलता है 
बाकी कोई कुछ भी कह दे,वो सब चलता है 

धुंधलाइ  आँखों ने आवारागर्दी  ना है छोड़ी 
देख हुस्न को उसके पीछे,भगती फिरे निगोड़ी 
मेरा मोम हृदय ,थोड़ी सी , गर्मी जब पाता  है  
रोको लाख ,नहीं रुकता है ,पिघल पिघल जाता है 
तन की सिगड़ी,मन का चूल्हा ,तो अब भी जलता है 
कोई मुझे कहे जो बूढा ,तो मुझको खलता है 

आँखों आगे ,छा जाती है ,कितनी यादें बिछड़ी 
स्वाद लगा मुख बिरयानी का ,खानी पड़ती खिचड़ी 
वो यौवन के ,मतवाले दिन ,फुर्र हो गए कबके 
पाचनशक्ती क्षीण ,लार पर देख जलेबी टपके 
मुश्किल से पर ,मन मसोस कर,रह जाना पड़ता है 
कोई मुझे ,कहे जो बूढा ,तो मुझको खलता है  

ढीला तन का पुर्जा पुर्जा ,घुटनो में पीड़ा है 
उछल कूद करता है फिर भी ,मन का यह कीड़ा है 
लाख करो कोशिश कहीं भी दाल नहीं गलती है 
कोई सुंदरी ,अंकल बोले ,तो मुझको खलती है 
आत्मनियंत्रण ,मन खो देता ,बड़ा मचलता है 
कोई मुझे कहे जो बूढा ,तो मुझको खलता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 हौंसले -माँ के 

भले उम्र ने अपना असर दिखाया है 
जीर्ण और कमजोर हो गयी काया है 
श्वेत हुए सब केश ,बदन है  झुर्राया 
आँखें धुंधली धुंधली,चेहरा मुरझाया 
बिना सहारा लिए ,भले ना चल पाती 
मुश्किल से ही आधी रोटी ,बस खाती 
और पाचनशक्ति भी अब कुछ मंद है 
मगर हौंसले ,माँ के बहुत बुलंद  है 

कमजोरी के कारण थोड़ी टूटी  है 
चुस्ती फुर्ती ,उसके तन से रूठी है 
हालांकि कुछ करने में मुश्किल पड़ती 
काम कोई भी हो ,करने आगे बढ़ती 
ऊंचा बोल न पाती,ऊंचा सुनती है 
लेटी लेटी ,क्या क्या सपने बुनती है 
कोई आता मिलता उसे आनंद है 
मगर हौंसले माँ के बहुत बुलंद है 

हाथ पैर में ,बची न ज्यादा शक्ति है 
मोह माया से ,उसको हुई विरक्ति है 
तन में हिम्मत नहीं मगर हिम्मत मन में 
कई मुश्किलें ,हंस झेली है जीवन में 
अब भी किन्तु विचारों में अति दृढ़ता है 
उसको कुछ समझाना मुश्किल पड़ता है 
खरी खरी बातें ही उसे पसंद  है 
मगर हौंसले ,माँ के बहुत बुलंद है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Sunday, October 14, 2018

      चौहत्तरवें जन्मदिन पर -जीवन संगिनी से


उमर बढ़ रही ,पलपल,झटझट

 हुआ तिहत्तर मैं   ,तुम अड़सठ 

एक दूसरे पर अवलम्बित ,

एक सिक्के के हम दोनों पट

      सीधे सादे ,मन के सच्चे    

      पर दुनियादारी में कच्चे

     बंधे भावना के बंधन में,

    पर दुनिया कहती हमको षठ

कोई मिलता ,पुलकित होते 

याद कोई आ जाता ,रोते

तुम भी पागल,हम भी पागल,

 नहीं किसी से है कोई घट

       पलपल जीवन ,घटता जाता

      भावी कल ,गत कल बन जाता

       कभी चांदनी है पूनम की,

      कभी  अमावस का श्यामल पट

इस जीवन के  महासमर में

हरदम हार जीत के डर  में

हमने हंस हंस कर झेले है,

पग पग पर कितने ही संकट

      मन में क्रन्दन ,पीड़ा  ,चिंतन

      क्षरण हो रहा,तन का हर क्षण

      अब तो ऐसे लगता जैसे ,

      देने लगा  बुढ़ापा   आहट

मैं गधे का गधा ही रहा 


प्रियतमे तुम बनी ,जब से अर्धांगिनी ,

      मैं हुआ आधा ,तुम चौगुनी बन  गयी 

मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,

         गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 


मैं तो कड़वा,हठीला रहा नीम ही,

     जिसकी पत्ती ,निबोली में कड़वास है 

पेड़ चन्दन का तुम बन गयी हो प्रिये ,

  जिसके कण कण में खुशबू है उच्छवास है 

मैं तो पायल सा खाता रहा ठोकरें ,

    तुम कमर से लिपट ,करघनी बन गयी 

मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा ,

       गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी

 

मैं था गहरा कुवा,प्यास जिसको लगी ,

     खींच कर मुश्किलों से था पानी पिया 

तुम नदी सी बही ,नित निखरती गयी ,

     सबको सिंचित किया ,नीर जी भर दिया  

मैं तो कांव कांव, कौवे सा करता रहा ,

            तुमने मोती चुगे ,हंसिनी बन  गयी    

मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,

        गाय थी तुम प्रिये, शेरनी बन गयी

 

मैं तो रोता रहा,बोझा ढोता रहा ,

         बाल सर के उड़े, मैंने उफ़ ना करी 

तुम उड़ाती रही,सारी 'इनकम' मेरी,

        और उड़ती रही,सज संवर,बन परी   

मैं फटे बांस सा ,बेसुरा  ही रहा,

          बांसुरी तुम मधुर रागिनी बन गयी

मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा,

          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी

  

फ्यूज ऐसा अकल का उड़ाया मेरी ,

        तुम सदा मुझको कन्फ्यूज करती रही 

मैं कठपुतली बन  नाचता ही रहा ,

          मनमुताबिक मुझे यूज करती रही

मैं तो कुढ़ता रहा और सिकुड़ता रहा ,

          तुम फूली,फली,हस्थिनी  बन गयी 

मैं गधा था गधे का गधा ही रहा ,

          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी

   

प्यार का ऐसा चस्का लगाया मुझे,

        चाह में जिसकी ,मैं हो गया बावला 

अपना जादू चला ,तुमने ऐसा छला ,

           उम्र भर नाचता मैं रहा मनचला 

मैं तो उबली सी सब्जी सा फीका रहा ,

        प्रियतमे दाल तुम माखनी बन गयी 

 मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,

          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन  गयी 

हम सीधेसादे 'घोटू 'है 


ना तो कुछ लागलगावट है 

ना मन में कोई बनावट  है 

हम है सौ प्रतिशत खरी चीज,

ना हममे कोई मिलावट है

          हम सदा मुस्कराते रहते 

          हँसते  रहते , गाते  रहते 

         जियो और जीने दो सबको ,

         दुनिया को समझाते रहते 

कितना ही वातावरण भले ,

गंदा,दूषित ,दमघोटू  है 

हम सीधेसादे  'घोटू ' है 


ना  ऊधो से लेना  कोई 

ना माधो  का देना कोई 

है हमे पता जो बोयेंगे ,

हम काटेंगे फसलें वो ही 

        इसलिए सभी से मेलजोल 

        बोली में  मिश्री सदा घोल 

        हम सबसे मिलते जुलते है 

        दिल के दरवाजे सभी खोल 

ना  मख्खनबाज ,न चमचे है ,

ना ही चरणों पर लोटू  है 

हम सीधेसादे 'घोटू ' है 


मिल सबसे करते राम राम 

है हमे काम से सिरफ काम 

ना टांग फटे में कोई के ,

ना ताकझांक ना तामझाम 

           हम सीधी राह निकलते है 

           कुछ लोग इसलिए जलते है 

           है मुंह में राम ,बगल में पर ,

           हम छुरी न लेकर चलते है 

अच्छों के लिए बहुत अच्छे ,

खोटो के लिए पर खोटू  है 

हम सीधेसादे 'घोटू ' है 

Tuesday, October 9, 2018

मुझे इन्द्रासन नहीं चाहिए 

जो अपने किसी भी  प्रतिद्वंदी को उभरता देख कर 
उसके चरित्रहनन के लिए,सुन्दर स्त्रियां  भेज कर 
उसका ध्यान  विचलित कर ,उसे पथ भ्रष्ट करे 
अपनी कुर्सी बचाने को ,उसकी तपस्या नष्ट करे 
अगर  इंद्र बनने पर ,ये सब करना पड़ता है  
तो मुझे वो इन्द्रासन नहीं चाहिए 

अगर उसके  भक्त  ,किसी के प्रभाव में आकर
रोक दे उसकी पूजा तो इसे अपना अपमान समझ कर 
रुष्ट होकर ,क्रोध में उनकी बस्ती में ला दे जल प्रलय 
उन्हें फिर अपनी शरण में लाने को दिखलाये  भय 
अगर इंद्र बनने पर ,ये सब करना पड़ता है ,
तो मुझे वो इन्द्रासन नहीं चाहिए 

जो सोमरस पीता रहे और  अप्सराओं संग मौज मनाये 
पर किसी पराई स्त्री की सुंदरता पर इतना आसक्त हो जाए 
कि अपनी काम वासना मिटाये ,उसके पति का रूप धर 
उसके सतीत्व का हरण  करे ,उसके साथ व्यभिचार  कर 
अगर इंद्र ये सब करतूतें करता रहता है 
तो मुझे वो इन्द्रासन नहीं चाहिए 

मैं किसी बृजवासी को ,जल के प्रकोप से डराना नहीं चाहता 
मैं किसी विश्वामित्र का ,तप भंग  करवाना  नहीं चाहता 
मैं  किसी अहिल्या को ,पत्थर की शिला बनवाना नहीं चाहता 
इसलिए मैं जो भी हूँ ,जैसा भी हूँ ,खुश हूँ ,
मुझे इन्द्रासन नहीं चाहिए 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
 
निर्मल आनंद 

मेरे मन में जो उलझे थे ,
छंद सभी स्वछन्द होगये 
दुःख पीड़ा से मुक्त हो गए ,
एक निर्मल आनंद हो गए 
कवितायेँ सब ,सरिताएं बन ,
बही ,हुई विलीन सागर में 
लगा उमर का ताप ,भाव सब ,
 बादल बने ,उड़े  अंबर में 
ऐसी दुनियादारी बरसी ,
चुरा सभी जज्बात ले गयी 
जिन्हे समय की हवा बहा कर ,
इत उत  अपने साथ ले गयी 
अब तो बस, मैं हूँ और मेरी ,
काया दोनों मौन पड़े है 
जहाँ वृक्ष ,पंछी कलरव था ,
कांक्रीट के भवन खड़े है 
मैं खुद बड़ा अचंभित सा हूँ ,
इतना क्यूँ बदलाव आ गया 
मेरे  हँसते गाते मन में ,
क्यों बैरागी भाव छा  गया 
मै तटस्थ हूँ ,लहरें आती, 
जाती मुझको फर्क न पड़ता 
इस उच्श्रृंखल चंचल मन में ,
क्यों आ छायी है नीरवता 
मोह माया से हुई विरक्ति ,
हुआ कभी ना पहले ऐसा 
क्या यह आने वाली कोई ,
परम शांति का है संदेशा 
बस अब तो ये जी करता है ,
अंतरिक्ष में ,मैं उड़ जाऊं 
मिले आत्मा ,परमात्मा से ,
परमशक्ति से मैं जुड़ जाऊं 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

भटकाव 

जिधर ले गयी हवा 
बस उसी तरफ बहा 
मैं तो बस बादल बन ,
यूं ही भटकता रहा
  
न तो अंबर में ही रहा 
न ही धरती पर बहा 
मैं तो बस बीच में ही ,
यूं ही लटकता रहा 

जहाँ मिली शीतलता 
बरसा रिमझिम करता 
सौंधा  सा , माटी में,
मिल कर महकता रहा 

यहाँ वहां ,कहाँ कहाँ 
सुख दुःख ,सभी सहा 
कभी आस ,कभी त्रास 
बन कर खटकता रहा 

मैं तो बस जीवन में 
यूं ही भटकता रहा 

घोटू 
सुंदरता 


सुंदरता ,
न तन के रंग  में होती है 
न किसी अंग में होती है 
वो तो बस ,आपके ,
मन की तरंग में होती है 
विचारों की सादगी  और 
जीने के ढंग में होती है 
लक्ष्य की लगन ,उत्साह 
और उमंग में होती है
मिलजुल कर मनाई हुई , 
खुशियों के रंग में होती है 
अपने  अच्छे और सच्चे ,
मित्रों के संग में होती है 

घोटू 

Monday, October 8, 2018

कैसे कैसे लोग 
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यह ऐसा है ,वह वैसा है
उसके बारे में मत पूछो,वह कैसा है
सदा चार की बातें करनेवाले,
     जब सदाचार की  बातें करते है
            तो कैसे लगते है?

कुछ विष इसके खिलाफ उगला
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
जब जब जिसकी भी बात चली,
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
  साँस साँस में जिसके विष का वास रहे
      वो विश्वास की बातें करते है
            तो कैसे लगते है?

जरुरत पर इसके चरण छुए
मतलब पर उसके चरण छुए
जब जब भी जिससे काम पड़ा
हरदम बस उसके चरण छुए
    सदा चरण छूने वाले कुछ चमचे
       जब सदाचरण की  बातें करते है
           तो कैसे लगते है?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'
मकई  का भुट्टा और कॉर्न 

जबसे मकई का भुट्टा ,
अमेरिकन कॉर्न बन गया है 
गर्व से तन गया है 
देसी मकई की धानी ,
अब 'पॉपकॉर्न 'बन कर इतराने लगी है 
उसकी पौबारह हो गयी है क्योंकि ,
नयी जनरेशन भी उसे चाव से खाने लगी है 
अमरीकन कॉर्न के दाने 
हो गए है मोतियों से सुहाने 
कभी रोस्ट कर ,कभी उबाल कर ,
मसाला मिला कर खाये जाते है 
पिज़्ज़ा पर बिखराये जाते है 
इन्ही से  'कॉर्न फ्लेक्स 'बनाया जाता है 
जो की एक सेहतमंद नाश्ता कहलाता है 
और तो और ,नए नए बोर्न 
बेबी कॉर्न ,
भी मोहते सबका मन है 
स्नेक्स और सब्जी के रूप में ,
सबका प्रिय भोजन है 
मक्का की राबड़ी भी ,
अब विदेशी स्वाद के अनुरूप बन गयी है 
वो अब स्वीटकॉर्न सूप बन गयी है 
मकई का भुट्टा ,
कितने ही विदेशी रंग में रंग जाए मगर 
अंगारों पर सेक ,नीबू नमक लगा कर 
खाने का मज़ा ही कुछ और होता है 
तृप्त मन का पौर पौर होता है 
और मक्का की रोटी ,
सरसों के साग और गुड़ के साथ  
देती है गजब का स्वाद 
हम हिन्दुस्थानियों को इससे बड़ा प्यार है 
इसके आगे अमेरिकन कॉर्न से बने ,
सब के सब व्यंजन बेकार है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
सौभाग्य काअंकगणित 

जैसे अंक गणित में 
एक संख्या के आगे एक बिंदी लगाने पर 
उसकी कीमत दस गुनी ,
दो बिंदी लगाने पर सौ गुनी,  
तीन बिंदी लगाने पर हज़ार गुनी हो जाती है 
और जितनी बिंदी लगाओ ,
उतनी ही बढ़ती ही जाती है 
वैसे ही कनक छड़ी सी कामिनी ,
जब एक बिंदी अपने मस्तक पर लगाती है 
उसकी आभा बढ़ कर दस गुनी हो जाती है 
और बिंदी सी गोल सगाई की अंगूठी पहन ,
वो सौभग्यकांक्षिणी  बन जाती है 
शादी कर बिंदी सी गोल बिछियाए पहन 
वो कहलाती है सुहागन 
कानो की बाली या सोने का कंगन 
नाक की नथुनी या और अन्य आभूषण 
सब गोल गोल बिंदी से ,जब नारी तन पर सजते है 
उसकी शोभा और सौभाग्य को 
कई गुना बढ़ा देते है 
खनखनाती गोल गोल चूड़ियां भी 
सुहाग की निशानी है ,ऐसा माना जाता है 
इससे बिंदी का महत्व स्पष्ट नज़र आता है 
यही सौभाग्य का अंकगणित कहलाता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '  

Sunday, October 7, 2018

बुलंद हौंसले 

आते नहीं है हमको ज्यादा दंद फंद है 
दिखते जलेबी ,दिल से मगर कलाकंद है 
आती न चमचागिरी ना ही मख्खन मारना ,
मुहफट्ट है ,कुछ लोगों को हम नापसंद है 
हमने किसी के सामने ना हाथ पसारे ,
अल्लाह का करम है कि हम हुनरमंद है 
ना टोकते ,ना रोकते रास्ता हम किसीका ,
ना बनते दाल भात में हम मूसरचंद  है 
है नेक इरादे तो सफलता भी मिलेगी ,
करके रहेंगे साफ़ ,ये फैली जो गंद  है 
कुछ करने की जो ठान ले ,करके ही रहेंगे ,
जज्बा है मन में ,हौंसले अपने बुलंद है 

घोटू 
चार पंक्तियाँ -६ 

दीवारें  चमकदार थी और सेहतमंद थी 
रहती थी लगी रौनकें ,सबको पसंद थी 
इन खंडहरों को देख कर अंदाज लगा लो ,
था एक जमाना ,जब ये इमारत  बुलंद थी 

घोटू 
जल में रह कर कछुवे का विद्रोह  
      
तालाब भर में खौफ था ,मगरूर मगर का ,
       सब डरते थे ,मैंने भी उनकी बात मान ली 
कुछ दिन दबाये पैर ,दुबक कर पड़ा रहा ,
        एक दिन खुले में तैरने की ,ख़ुशी जान ली 
       यूं कायरों की  जिंदगी से मौत भली है 
       जीने को अपने ढंग से आजाद सभी है, 
 मन में मेरे विद्रोह के स्वर जागृत हुये 
              जल में रह बैर मैंने मगर से थी ठान ली ,
      देखा निडर सा तैरता मुझको तालाब में 
    कुछ मछलियां भी आ गयी थी मेरे साथ में 
अपने खिलाफ होती बगावत को देख कर ,
          जालिम मगर ने बंद कर अपनी जुबान ली 
     कोई से कभी भी नहीं डरने की बात थी 
     सीना उठा ,मुकाबला ,करने की बात थी 
मिल कर लड़ोगे ,आतयायी भाग जाएंगे ,
               एकता की शक्ति थी सबने ही जान ली 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
ना जाने क्यूँ ?

ना जाने क्यूँ ,मेरे संग  ही ,ऐसा सदा गुजरता है 
तन का शेर दहाड़ मारता,मन का चूहा डरता  है 

जब भी लड़की कोई देखता ,मेरा ध्यान भटक जाता 
उसके रूप ,चाल,यौवन में ,मेरा हृदय  अटक जाता 
पर बीबीजी की  नज़रों  में ,मेरा  कृत्य  खटक  जाता
और उस रात ,मुझे सोफे पर ,भूखा  सोना पड़ता है 
तन का शेर दहाड़ मारता  ,मन का चूहा डरता  है 

मेरी पत्नी ,सदा उँगलियों पर ही मुझे नचाती है 
पा टीवी  रिमोट भावना ,बदले की जग जाती है 
ख़ुश होता  मैं ,बटन दबा ,तस्वीर बदलती जाती है 
कोई तो है ,जो कि इशारों पर मेरे भी ,चलता  है 
तन का शेर दहाड़  मारता ,मन का चूहा डरता है 

मोबाईल पा ,बड़ी कुलबुलाहट ,हाथों को लगती है 
टच स्क्रीन देख कर ऊँगली अपने आप फिसलती है 
नये फेसबुक फ्रेंड बनाने ,तबियत मेरी मचलती है 
पर बीबी के डर  के मारे ,चुप ही रहना  पड़ता है  
तन का शेर दहाड़ मारता ,मन का चूहा डरता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
करवा चौथ पर -पत्नी जी के प्रति
मद भरा मृदु गीत हो तुम,सुहाना संगीत हो तुम
प्रियतमे तुम प्रीत मेरी और जीवन गीत हो तुम 
बंधा जब बंधन सुहाना ,लिए मुझ संग सात फेरे 
वचन था सुख ,दुःख सभी में  ,रहोगी तुम साथ मेरे 
पर समझ में नहीं आता ,जमाने की रीत क्या है 
मै सलामत रहूँ ,तुमने ,आज दिन भर व्रत रखा है 
खूब मै ,खाऊँ पियूं और दिवस भर निर्जल रहो तुम 
कुछ न  खाओ ,इसलिए कि  ,उम्र मेरी रहे अक्षुण 
तुम्हारे इस कठिन व्रत से ,कौन सुख मुझको मिलेगा 
कमल मुख कुम्हला गया तो ,मुझे क्या अच्छा लगेगा 
पारिवारिक रीत ,रस्मे , मगर पड़ती  है  निभानी 
रचा मेहंदी ,सज संवर के ,रूप की तुम बनी रानी 
बड़ा मनभावन ,सुहाना ,रूप धर ,मुझको रिझाती 
शिथिल तन,दीवार व्रत की ,मगर है मुझको सताती 
प्रेम की लौ लगी मन में ,समर्पण , चाहत बहुत है 
एक व्रत जो ले रखा है ,बस वही पतिव्रत  बहुत है 
चन्द्र का कब उदय होगा ,चन्द्रमुखी तुम खड़ी उत्सुक 
व्रत नहीं क्यों पूर्ण करती ,आईने में देख निज  मुख

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
शिकायत पत्नी की -जबाब पति का 

पत्नी की शिकायत  
  
दुबली पतली मै कनक की थी छड़ी ,
                      क्या थी मै और आपने क्या कर दिया 
प्यार कुछ अपना दिखाया इस तरह ,
                       देखो मुझको कितना मोटा कर दिया 
       रोज अपने प्यार का टोनिक पिला 
        बदन मेरा कर दिया है थुलथुला 
        मांस देखो कितना तन पर चढ़ गया  
       वजन मेरा देखो कितना बढ़  गया 
       अंग सारे इस कदर है बढ़ गए 
        सभी कपडे मेरे छोटे पड़ गये 
        कभी रबडी और जलेबी खिलाई 
        तली चीजें और मख्खन मलाई 
       प्यार का एसा चलाया सिलसिला 
       फूल मेरा तन गया ,अच्छा भला 
और मैंने शिकायत जब भी करी ,
                      प्यार से बस एक चुम्बन जड़ दिया 
दुबली पतली मै कनक की थी छड़ी ,
                       क्या थी मै और आपने क्या कर दिया 

जबाब पति का -

कौन कहता है की तुम मोटी  हुई हो ,
                        सिर्फ यह तो तुम्हारे मन का भरम है 

  आई थी,सकुचाई सी दुल्हन बने जब ,
                          उस समय तुम एक थी कच्ची कली  सी 
मुख म्रदुल था ,बड़ा भोलापन समेटे ,
                             और चितवन भी बड़ी चंचल भली थी 
किन्तु मेरे प्यार का आहार पाकर ,
                               अब विकस पाया तुम्हारा तन सलोना 
गाल भी फूले हुए लगते भले है ,
                                गात का गदरा गया है हरेक कोना 
तो कली से फूल बन कर अब खिली हो ,
                                 अब निखर  पाया तुम्हारा रूप प्यारा 
अब कली वाली चुभन चुभती नहीं है ,
                                  अब हुआ कोमल बदन ,कंचन तुम्हारा 
बढ़ गया यदि भार थोडा नितंबों का,
                                    रूप निखरा है भली सेहत हुइ है   
पड़  गए छोटे अगर कपडे पुराने ,
                                    है खुशी मेरी सफल चाहत हुई है  
और मोटापा समझती हो इसे तुम ,
                                    देख कर के आइना आती शरम है 
कौन कहता  है कि तुम मोटी हुई हो,
                                   सिर्फ यह तो तुम्हारे मन का बहम है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, October 5, 2018

वणिक पुत्र

            
मैंने तुम्हारी महक को,
प्यार की ऊष्मा देकर
अधरों के वाष्प यन्त्र से,
इत्र बना कर,
दिल की शीशी में,एकत्रित कर लिया है,
ता कि उम्र भर खुशबू ले सकूँ
मैंने तुम्हारा यौवन रस,
मधुमख्खी कि तरह,
बूँद बूँद रसपान कर,
दिल के एक कोने में
मधुकोष बना कर,संचित कर लिया है,
ता कि जीवन भर ,रसपान कर सकूँ
मैंने तुम्हारे अंगूरी अधरों से,
तुम्हारी मादकता का आसवन कर
एकत्रित कि गयी मदिरा को,
पर्वतों के शिखरों में,छुपा कर भर दिया है
ताकि उम्र भर पी सकूँ
क्योंकि संचय करना,मेरा रक्त गुण है
मै एक वणिक पुत्र हूँ

Wednesday, October 3, 2018

बदलते हालात 

इस तरह मौसम बदलने लग गये है 
चींटियों के पर निकलने  लग गये है 
अपना सिक्का जमाने की होड़ में ,
खोटेसिक्के भी अब चलने लग गये है 
खोलने दूकान एक बजाज की ,
चिन्दी पा ,चूहे  उछलने लग गये है 
चंद पत्थर बन स्वयंभू  देवता ,
आस्था लोगो की छलने लग गये है 
हाथ उनके एक जुगनू क्या लगा ,
चाँद पाने को मचलने लग  गये  है 
कांव कांव छोड़ 'कुहू कू 'करे ,
कव्वे ,कोयल में बदलने लग गये है 
आसमां पर चढ़ गया उनका अहम ,
गर्व के मारे उछलने लग गये  है 
' घोटू '  मौसम आगया बरसात का ,
टरटरा मेंढक  निकलने लग गये है 

घोटू 
ऑउटडेटेड  रिश्ते 

दादा दादी ,नाना नानी 
ये सब है अब चीज पुरानी 
इनके दिन अब 'फेड 'हो गए 
ये 'ऑउटडेटेड' हो गये 

बीते दिन जब सभी पर्व में 
इन्हे पूजते सभी गर्व में 
सब 'रिस्पेक्ट ' दिया करते थे 
आशीर्वाद लिया करते थे 

लेकिन अब ये बूढ़े,खूसट 
सदा टोकना जिनकी आदत 
हरेक बात में टांग अड़ाते 
उंच नीच हमको समझाते 

'गेप' हो गया 'जनरेशन ' का 
इन्हे क्या पता न्यू फैशन का 
करना है यदि 'सेलिब्रेशन '
हम न चाहते है 'रिस्ट्रिक्शन '

इनके आगे लगता 'फियर '
खुल कर कह ना सकते 'चीयर '
हमें समझते अब भी बच्चा 
इन्हे 'अवॉइड 'करना अच्छा 

शायद इन्हे बुरा लगता है 
मौजमस्ती में सब चलता है 
दुखी मगर कुछ न बोलेंगे 
आशीर्वाद फिर भी ये देंगे 

घोटू 
चार पंक्तियाँ -५ 

उनकी हाँ में हाँ मिलाओ तुम सदा ,
बात हर एक पर  बजाओ तालियां 
अगर उनकी करी  ये चमचागिरी ,
समझो आशीर्वाद उनका पा लिया 
वो करे जो भी और जैसा भी करे ,
जरूरी, पुल तारीफों के बांधना 
बात उनके मन मुताबिक ना करी ,
लगेंगे  देने  तुम्हे  वो  गालियां 

घोटू 
बूंदी और सेव 

मोती सी गोलमोल,पीली एक मीठी बूंदी ,रसासिक्त 
और एक चरपरे,मनभावन ,कुरमुरे सेव है स्वादिष्ट 
दोनों ही सबको प्यारे है ,दोनों ने मोहा सबका मन 
है रूप भले ही अलग अलग ,ये भी बेसन ,वो भी बेसन 

जब गीला बेसन बूँद बूँद,था तला गया देशी घी में 
रसभरी चासनी उसने पी तो बदल गया वो बूंदी में 
मिल मिर्च मसाले संग बेसन ,निकला छिद्रों से झारी की 
और गर्म तेल में तला गया ,बन गया सेव वह प्यारी सी 
जैसी जिसकी संगत होती ,वैसी ही रंगत जाती बन 
है रूप भले ही अलग अलग ,ये भी बेसन ,वो भी बेसन 

सज्जन का साथ अगर मिलता ,मानव सज्जन बन जाता है 
मिलती जब दुर्जन की संगत ,तो वह दुर्जन कहलाता है 
पानी के संग घिसे चंदन ,तो वह प्रभु के मस्तक चढ़ता 
अग्नि का साथ अगर पाता ,तो किसी चिता में जा जलता 
संगत से एक राख बनता ,संगत से एक बने पावन 
है रूप भले ही अलग अलग ,ये भी चंदन,वो भी चंदन 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Tuesday, October 2, 2018

Sunday, January 22, 2012

अहो रूप-महा ध्वनि

अहो रूप-महा ध्वनि 
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इक दूजे की करे प्रशंसा,हम तुम ,आओ
मै तुम्हे सराहूं,  तुम मुझे  सराहो
ऊंटों की शादी में जैसे,आये गर्दभ,गायक बन कर
ऊँट सराहे गर्दभ गायन,गर्दभ कहे  ऊँट को सुन्दर
सुनकर तारीफ,दोनों पमुदित,इक दूजे का मन बहलाओ
मै तुम्हे सराहूं,तुम मुझे सराहो
काग चोंच में जैसे रोटी, नीचे खड़ी लोमड़ी, तरसे 
कहे  काग से गीत सुनाओ,अपने प्यारे मीठे स्वर से
तारीफ़ के चक्कर में अपने ,मुंह की रोटी नहीं गिराओ
मै तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो
इन झूंठी तारीफों से हम,कब तक खुद को खुश कर लेंगे
ना तो तुम ही सुधर पाओगे,और हम भी कैसे सुधरेंगे
इक दूजे की  कमी बता कर ,कोशिश कर ,सुधारो,सुधराओ
मै  तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 
              साडू  भाई 

एक ही कुए से,बाल्टी भर भर के ,
     प्यास को जिन्होंने ,अपनी बुझाया है 
एक ही चूल्हे से,लेकर के अंगारा,
    सिगड़ियां अपनी को,जिनने  जलाया है 
एक ही चक्की का,पिसा हुआ आटा और ,
      एक  हलवाई की ही,  खाते मिठाई    है          
एक ही दूकान पर,ठगे गए दो ग्राहक,
       आपस में   कहलाते, वो साडू भाई    है 

घोटू