Thursday, December 5, 2019

अधिकार

हमे पता तुमने कितना कर्तव्य निभाया
अपनाया ना किन्तु शुक्र है ,ना ठुकराया
पत्नी डर से ,पुत्र धर्म तुम निभा न पाये
पूर्ण आस्था से पर पति का धर्म निभाये
किंन्तु पिता मै ,तुम मेरी आँखों के तारे
जिसको ले,  मैंने पाले थे , सपने सारे
हंसी ख़ुशी से कटे बुढ़ापा ,आस कहीं थी
टूट गए सब सपने ,शायद नियति यही थी
मैंने ऊँगली पकड़ सिखाया ,तुमको चलना
मुझे याद है तुम्हारी जिद और मचलना
ऐसे मचले देख एक ललना का आनन
किया इशारों पर ऊँगली के उसके नर्तन
भुला दिए माँ बाप जिन्होंने प्यार लुटाया
पा पत्नी का साथ ,अलग संसार बसाया
निज जनकों से तुमने बना रखी दूरी थी
तुम कर्तव्य निभा ना पाए ,मजबूरी थी
हम रिश्तों का मोह नहीं अपना खो सकते
और न ही हम तुम जैसे निष्ठुर हो सकते
हुआ विछोह ,पुत्र का मोह ,हमें ये गम था
त्योहारों पर छूटे पैर  ,यही क्या कम था
हम भोले है ,हमने सारा प्यार दे दिया
तुम्हे वसीयत में सारा अधिकार दे दिया


घोटू 
लोग है कितने सयाने हो गये


लाभ हानि देखते हर काम में ,लोग है कितने सयाने हो गए
दिख न पाता  सूर्य सुबहोशाम का ,काम में इतने दीवाने हो गए
प्रेमपत्रों का जमाना लद गया , शुरू अब ई मेल आने हो गए
मैं और मेरी दुनिया ही संसार है ,बाकी सब रिश्ते अजाने हो गए
गूंथें थे ,शोभित गले  का हार थे ,ऐसे बिखरे दाने दाने हो गए
शहर में दो रूम का एक फ्लेट है ,गाँव के बंगले बिराने हो गए
 चाचा मामा ताऊ सब अंकल बने ,बाकी सब रिश्ते पुराने हो गए
नहीं फुर्सत मिलने की ,माँ बाप से ,सैंकड़ों ही अब बहाने हो गए
'घोटू 'कुछ अनजान तो अपने बने ,और अपने अब बेगाने हो गए

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '