Sunday, June 23, 2019

इज्जत

किसी ने मुझसे पूछा यार ये इज्जत क्या है
सभी की नाक में दम ,इसने कर के रख्खा है
कहा हमने किसी के, जब भी छुए जाते चरण
इसका मतलब है कि उसकी इज्जत करते हम
कोई धनवान है तो उसकी बड़ी इज्जत है  
कोई बलवान है तो उसकी बड़ी इज्जत है
कोई सत्ता में है तो लोग करते है  इज्जत
कोई को दिलवाता इज्जत है उसका ऊंचा पद
देश की इज्जत को  सैनिक शहीद हो  जाते
बढ़ती इज्जत ,खिलाड़ी ,जीत पदक जब लाते
किसीको सर झुकाओ ,नमस्कार प्रणाम करो
कहो आदाब अर्ज ,झुक के या सलाम करो
ये तो इज्जत के प्रदर्शन के सब तरीके है
जो कि सब हमने अपने बुजुर्गों से सीखे है
ये इज्जत क्या है और ये रहती कहाँ पर है
किसी के सर की पगड़ी इज्जत का उसकी घर है
कोई की नाक ऊंची ,याने कि इज्जत उसकी
गयी इज्जत तो समझो नाक कट गयी उसकी
कभी घटती है इज्जत तो  नज़र झुक जाती
पकड़ के कान ,बनो मुर्गा तो  इज्जत जाती  
कोई की इज्जत उसकी मूछों में नज़र आती
मूंछ बाल हुआ बांका ,इज्जत घट जाती
टेकना घुटने ,किसी आगे ,घटाता  इज्जत
आपके हाथों में रहती है आपकी इज्जत
आपके वस्त्र भी इज्जत को ढका करते है
गलती की ,दाग फिर इज्जत पे लगा करते है
काम अच्छे करो ,इज्जत कमाई जाती है
गलत हो काम तो इज्जत गमाई जाती है
कहीं  नीलाम होती और कहीं बेचीं जाती
धूल हो जाती कहीं मिट्टी  में ये मिल जाती
जरा  सी भूल से इज्जत पे बट्टा लग जाता
डूब जाती है या फिर उसपे पानी फिर जाता
कभी उतारी कभी लूटी जाती है इज्जत ,
ये घटित होता है माँ और बहनो संग जब तब
फेल बेटा  हुआ ,माँ बाप की इज्जत जाती
अच्छे कॉलेज में पढता है तो इज्जत आती
ये इज्जत अहम् है ,व्यवहार की प्रक्रिया है
बड़ा मुश्किल है समझना कि ये इज्जत क्या है
छोड़ दो शान झूठी ,जड़ है जो फ़जीहत की
चैन से जियो ,खाओ ,दाल रोटी इज्जत की

मदन मोहन बाहेती ;घोटू '
जवानी के बीते दिन


हमें वो प्यार की बातें पुरानी याद आती है
एक राजा याद आता है एक रानी याद आती है
जवानी में कभी ना ख्याल तक आया बुढ़ापे का ,
बुढ़ापा आगया तो अब जवानी  याद आती है
सुनहरे होते थे दिन और रंगीली रात होती थी ,
हवा में उड़ते थे ,साँझें सुहानी याद आती है
बहुत पुश्तैनी दौलत थी,उड़ादी यूं ही मस्ती में ,
अब करना काम पड़ता है तो नानी याद आती है
सुनु में माँ की या फिर बात अपनी बीबी की मानूँ ,
मुसीबत मेरी ,उनकी खींचातानी याद आती है  
बुढ़ापे में सहारे की ,बड़ी उम्मीद थी जिनसे ,
न पूंछें ,बच्चों की हरकत ,बेगानी याद आती है
 तभी कोने से एक दिल के ,आई आवाज ये 'घोटू '
नहीं ये मेरी, घर घर की ,कहानी याद आती है

घोटू 
बचपन की यादें

हमें बचपन की वो बातें सुहानी याद आती है
बेफिकर छुट्टी गरमी की मनानी याद आती है  
जहाँ हम खेलते  थे कंचे और लट्टू घुमाते थे ,
पेड़ की छाँव, वो पीपल पुरानी याद आती है
वो पानी के पताशे ,आलू टिक्की ,दही के भल्ले ,
चाट वो भरती  थी जो मुंह में पानी ,याद आती है
तली जो देशी घी में ,चासनी में डूब इतराती ,
जलेबी वो रसीली और सुहानी याद आती है
तपिश मुंह की मिटाते ,रंगबिरंगे बर्फ के गोले ,
मलाई दूध की कुल्फी जमानी याद आती है
चौकड़ी खेलते थे रोज पत्ते पीसते जिसके ,
हमें वो ताश की  गड्डी ,पुरानी याद आती है
कभी हम तोड़ते थे दूर से ही मार कर पत्थर ,
कभी वो पेड़ पर चढ़ ,जामुन खानी याद आती है
कोई कपडा न बचता ,जिसपे ना हो आम के धब्बे ,
रोज वो डाट  हमको माँ की खानी याद आती है
हमारे हाथ में पकड़ाती थी चुपके से दुअन्नी ,
उमड़ता प्यार आँखों में ,वो नानी याद आती है
वो छत पर पागलों सा भीगना ,बरसात होने पर ,
नाव कागज़ की ,पानी में तैरानी याद आती है
वो लंगड़े भूत के किस्से ,जिन्हे सुनसुन के डर लगता,
चाव से सुनते दादी की ,कहानी याद आती है  
झपकते ही पलक ,छुट्टी का मौसम बीत जाता था ,
खुलते स्कूल ,बढ़ती परेशानी  याद आती है

घोटू