Saturday, June 14, 2014

अच्छे बुरे दोस्त

         अच्छे  बुरे दोस्त

अगर अच्छा हुआ तो यश ,सभी ले लेते है खुद ही,
अगर होता बुरा कहते ,लिखा था ये ही किस्मत में
भिड़ाना एक दूजे को ,लगा कर के  नमक मिर्ची ,
दूर से फिर मज़े लेना ,है होता जिनकी आदत मे
बहुत सारे हितैषी आपको मिल जाएंगे  ऐसे ,
ख़ुशी में सबसे आगे है,छोड़ते संग मुसीबत में
बड़ी मुश्किल से मिलते दोस्त,सच्चे चाहने वाले ,
न होती खोट कोई भी ,कभी भी,जिनकी चाहत में

घोटू 

जैसे जैसे पाप बढ़ता जा रहा है

    जैसे जैसे पाप बढ़ता जा रहा है  

इस तरह से कहर कुदरत ढा  रही है
हर तरफ से मार पड़ती   जा रही है
जैसे जैसे पाप बढ़ता  जा रहा है ,
मंदिरों में भीड़ बढ़ती   जा रही  है
बढ़ रही ऊंचाई जितनी बिल्डिंगों की ,
उतने ही इंसान बौने  हो गए है
अब न बच्चे खेलते है झुनझुनो से,
अब तो 'मोबाइल',खिलोने हो गए है
बच्चा पहला शब्द 'माँ' ना  बोलता है,
सबसे पहले 'हेलो'करना सीखता है       
पैदा होते आँख जब वो खोलता है ,'
'फेस बुक 'पर उसका चेहरा दीखता है
तरक्की की सीडियां हम चढ़ रहे है,
या तरक्की हम पे चढ़ती जा रही है
जैसे जैसे पाप बढ़ता जा रहा  है,
मंदिरों में भीड़ बढ़ती जा रही है
दोस्ताना रोज रुसवा हो रहा है ,
और रिश्ते धुंवा धुंवा हो रहे है
बुजुर्गों को खुदा के मानिंद समझना ,
अदब के वो सब सलीके  खो रहे है
रोज अस्मत औरतों की लुट रही है,
बिक रहा ईमान ,खुल्ले आम  अब है
हम पतन के गर्द में नित गिर रहे है,
हो रहे संस्कार मटियामेट  सब है
आदमी खुदगर्ज होता जा रहा है ,
और इंसानियत  मरती जा रही है
जैसे जैसे पाप बढ़ता जा रहा है ,
मंदिरों में भीड़ बढ़ती जा रही है
सोचता इंसान है मंदिर में जा के ,
सर झुका कर,पाप धुल जाएंगे सारे
एक लोटा दूध शिवलिंग पर चढ़ा कर ,
स्वर्ग के भी द्वार खुल जाएँगे  सारे
पागलों सी भीड़ मन्दिरमे उमड़ती ,
भजन,प्रवचन ,एक धंधा बन गया है ,
करोड़ों का चढ़ावा ,जाता चढ़ाया ,
लोभ में इंसान अँधा बन गया है
पैसे के बल ,काम हो सकते है सारे,
आस्थाएं ,यूं  बदलती जा रही है
जैसे जैसे पाप बढ़ता जा रहा है ,
मंदिरों में ,भीड़ बढ़ती  जा रही है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अंजाम-ए -आशिक़ी

         अंजाम-ए -आशिक़ी

नहीं हमतुम मिले शायद ,लिखा था ये ही किस्मत में,
              तू भी अच्छी तरह होगी ,मैं भी अच्छी तरह से हूँ
खैर ये है नहीं भटके हम  अपने रास्तों से है ,
              तू भी अपनी जगह पे है,मैं भी अपनी जगह पे  हूँ
इश्क़ की दास्ताने सभी की, रहती अधूरी है,
              मिली ना मजनू को लैला,नहीं फरहाद, शीरी को ,
हमारी आशिक़ी का भी, वही अंजाम होना था ,
               दुखी तू बे वजह से है ,दुखी मैं  बे वजह से हूँ

घोटू