Monday, April 12, 2021

दबदबा पत्नी का

रखती तू मुझको दबाकर ,तुझसे दब कर रहता मैं ,
किन्तु जब सर दर्द करता ,तो दबाती है तू ही
थके पावों को दबा कर ,देती है राहत मुझे ,
मानसिक सब दबाबों में ,मुझको समझाती तू ही
अपनी बाहों में दबा कर , देती सुख की नींद है ,
बाँध कर निज बाजूवों  में  लगा लेती  जब गले  
प्यार का दबदबा  तेरा ,देता परमानन्द है ,
अच्छा लगता ,दब के रहना  तेरे अहसानो  तले
दबा कर के दर्द पीड़ा और आंसूं आँख में ,
मुस्करा कर ,मिलती जुलती ,काम में रहती फंसी
कभी ममतामयी माँ तू ,तो सुशीला बहू भी ,
कभी घर की व्यवस्थापक ,कभी पति की प्रेयसी
छोटी छोटी बात में ,कितना ही झगड़े रात में ,
प्यार से बस तू ही देती ,सुबह प्याला चाय का
तेरा मेरा रिश्ता सच्चा ,लबालब है प्यार से ,
जिसने चख्खा, वो ही जाने ,दबदबे का जायका
लोग कहते ,तुझसे डरता ,दब्बू और डरपोक मैं ,
मानता हूँ ,सच है ये ,पर मुझे इसका गम नहीं
झांकअपने गिरेबां में देखेगा तो पायेगा
बीबी से दबने में कोई भी किसी से कम नहीं  
पत्नी से दब कर के रहने  का मज़ा ही और है ,
जिसने पाया,सुख उठाया ,ना मिला ,वो बदनसीब
आपकी हर एक  हरकत पे नज़र बीबी की है ,
वो ही सुख दुःख बुढ़ापे में ,आपके रहती करीब

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुम मुझे मंजूर हो

चाँद का टुकड़ा नहीं ,जन्नत की ना तुम हूर हो
यार तुम ,जैसी भी हो,जो हो,मुझे मंजूर हो

रूप परियों सा नहीं तो मेरे मन में गम नहीं
सच्चे दिल से चाहती हो ,तुम मुझे ये कम नहीं
तुममे अपनापन है ,मन में समर्पण का भाव है
गरिमा व्यक्तित्व में  है , सोच में ठहराव है
ना सुरा ना जाम तुम पर नशे से भरपूर हो
यार तुम जैसी भी हो ,जो हो ,मुझे मंजूर हो

 गुलाबों की नहीं रंगत बदन में ,पर महक तो है
लरजते इन लबों पर पंछियों  जैसी ,चहक तो है
तेरी आँखों में तारों सी ,चमक है ,जगमगाहट है
छुवन में प्यार, उल्फत की ,गर्मजोशी की आहट है
तुम बसी हो दिल में मेरे , मेरे मन का नूर हो
यार तुम ,जैसी भी  हो ,जो हो ,मुझे मंजूर हो
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू '