Wednesday, September 29, 2021

गुब्बारे 

भैया हम गुब्बारे हैं 
भरी हवा है, फूल रहे हम मगर गर्व के मारे हैं 
भैया हम गुब्बारे हैं 
अभी जवानी है, तनाव है,चमक दमक चेहरे पर है 
उड़े उड़े हम फिरते, जैसे लगे हुए हम पर, पर हैं 
बच्चे हम संग खेल रहे ,हम बच्चों का मन बहलाते
शुभअवसर पर, साज सजावट में हम सबके मनभाते  संग हवा के उड़ते रहते, हम निरीह बेचारे हैं
भैया हम गुब्बारे हैं
दिखने की ढब्बू है लेकिन हम तन के कमजोर बड़े 
जाते फूट,अगर छोटा सा कांटा भी जो हमें गढ़े
यूं भी धीरे-धीरे हवा निकल जाती, मुरझाते हम
क्षणभंगुर है जीवन फिर भी रहते हैं मुस्काते हम 
प्राणदायिनी हवा ,हवा में बसते प्राण हमारे हैं
भैया हम गुब्बारे हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू
मेरी दादी 

आज अचानक याद आ गई मुझको मेरी दादी की 
नेह भरी, प्यारी, मुस्काती,  निश्चल सीधी-सादी की 
गोरा चिट्टा गोल बहुत था, जब हंसती मुस्कुराती थी 
तो हाथों से मुंह ढक अपने, टूटे दांत छुपाती थी 
दादाजी थे स्वर्ग सिधारे ,जब बाबूजी नन्हे थे 
पालपोस कर बड़ा किया,दुख कितने झेले उनने थे 
वात्सल्य की मूरत थी वो, सब के प्रति था प्यार भरा बच्चों खातिर,सबसे भिड़ती,डर था मन में नहीं जरा
हर मुश्किल से टक्कर लेती, उनमें इतनी हिम्मत थी
 संघर्षों से खेली थी वह ,बड़ी जुझारू, जीवट थी 
मुझे सुला अपनी गोदी में, मेरा सर सहलाती थी 
किस्से और कहानी कहती,अक्सर मुझे सुलाती थी 
मैं शैतानी करता कोई ,अगर शिकायत आती थी 
तो बाबूजी की पिटाई से, दादी मुझे बचाती थी 
नन्हें हाथों से दादी की, पीठ खुजाया करता मैं 
तो बदले में दादी से ,एक पैसा पाया करता मैं 
पांव दुखा करते दादी के, उन्हें गूंधता में चढ़कर 
दो पांवों के दो पैसे ,दादी से लेता मैं लड़ कर
सब पर स्नेह लुटानेवाली ,सबके मन को भाती की
आज अचानक याद आगई ,मुझको मेरी दादी की 

मदन मोहन बाहेती घोटू