Friday, July 17, 2020

मैं सीनियर सिटिज़न हूँ

अनुभव से भरा मैं ,समृद्ध जन हूँ
लोग कहते सीनियर मैं सिटिज़न हूँ

नौकरी से हो गया हूँ अब रिटायर
इसलिये रहता हूँ बैठा आजकल घर
बुढ़ापे का हुआ ये अंजाम अब है
निकम्मा हूँ ,काम ना आराम अब है
कभी जिनके काम आता रोज था मैं
बन गया हूँ ,अब उन्ही पर बोझ सा मैं
सभी का व्यवहार बदला इस तरह है
नहीं मेरे वास्ते दिल में जगह है
समझ कर मुझको पुराना और कबाड़ा
सभी मुझ पर रौब अब करते है झाड़ा
और करते रहते है 'निगलेक्ट 'मुझको
बुढ़ापे ने कर दिया 'रिजेक्ट' मुझको
काम का अब ना रहा हो गया कूड़ा
हंसी मेरी उड़ाते सब ,समझ बूढा
था कभी बढ़िया अब हो घटिया गया हूँ
लोग कहते है कि मैं सठिया गया हूँ
रोग की प्रतिरोध क्षमता घट गयी है
बिमारी जल्दी पकड़ने लग गयी है
हो गया कमजोर सा है हाल मेरा
कर लिया बीमारियों ने है बसेरा
मगर उनसे लड़ रहा करके जतन हूँ
लोग कहते ,सीनियर मैं सिटिज़न हूँ

बीते दिन की याद कर होता प्रफुल्लित
भूल ना पाता सुनहरे दिन वो किंचित
उन दिनों जब कॅरियर की 'पीक' पर था
कद्र थी ,सबके लिए मैं ठीक पर था
मेहनत ,मैंने बहुत जी तोड़ की थी
सम्पदा ,बच्चों के खातिर जोड़ ली थी
 ऐश जिस पर कर रहे सब ,मज़ा लेते
मगर तनहाई  की मुझको सज़ा देते
हो गए नाजुक बहुत जज्बात है अब
लगी चुभने ,छोटी छोटी बात है अब
किन्तु अब भी लोग कुछ सन्मान करते
पैर छूते ,अनुभव का मान करते
आज भी दिल में है मेरे प्रति इज्जत  
ख्याल रखते ,पूर्ण कर मेरी जरूरत
समझते परिवार का है मुझे नेता
प्यार से मैं  उन्हें आशीर्वाद देता
वृद्ध हूँ ,समृद्ध हूँ और शिष्ट हूँ मैं
देश का एक नागरिक वरिष्ठ हूँ मैं
भले ही ये तन पुराना ,ढल चला है
मगर कायम ,अब भी मुझमे हौंसला है
सत्य है ये उमर का  अंतिम चरण हूँ
 लोग कहते सीनियर मैं सिटिज़न हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बुढ़ापे का रेस्टरां

रेस्ट करने की जगह ये ,बुढ़ापे का रेस्टरां है
ट्राय करके देखिएगा ,बहुत कुछ मिलता यहाँ है

है बड़ा एन्टिक सा लुक ,पुरानी कुर्सी और मेजें
पुरानी यादों के जैसी ,भव्यता अपनी सहेजे
हल्की हल्की रौशनी का ,है बड़ा आलम निराला
पुरानी कुछ लालटेनों, से यहाँ होता उजाला
आप मीनू कार्ड पर भी ,नज़र डालें ,अगर थोड़ी
बुढ़ापे के हाल खस्ता सी यहाँ खस्ता कचौड़ी
चटपटा यदि चाहते कुछ ,मान करके राय देखो
खट्टे मीठे ,अनुभवों की ,चाट करके ट्राय  देखो
बुढ़ापे की जिंदगी सी ,खोखली पानीपुरी  है
अच्छे दिन की आस के स्वादिष्ट पानी से भरी है
दाल से पिस ,तेल में तल ,हुये मुश्किल से बड़े है
मोह माया के दही में ,ठीक से लिपटे पड़े है
दही के ये बड़े काफी स्वाद ,चटनी बहुत प्यारी
जलेबी भी है ,जरा ठंडी ,मगर अब तक करारी
न तो खुशबू गुलाबों की ,स्वाद भी ना जामुनों का
नाम पर गुलाबजामुन ,आप खा जाएंगे धोखा
देखा ये  अक्सर नहीं गुण ,नाम के अनुसार होता
वरिष्ठों से शिष्टता का ,ज्यों नहीं व्यवहार होता
चाय स्पेशल हमारी ,गरम ,कुल्हड़ में मिलेगी
सौंधा सौंधा स्वाद देगी ,ताजगी तुममें भरेगी
देर तक बैठे रहो और मज़ा लो हर आइटम का
वक़्त भी कट जाएगा और बोझ घट जाएगा मन का
जवानी में यहाँ मिलता ,उम्र भर का तजुर्बा है
रेस्ट करने की जगह यह ,बुढ़ापे का रेस्टरां है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
शरारत

इस तरह क्यों देखती हो ,शरारत से नज़र गाड़े
बड़ी लापरवाही से ,थोड़ा बदन ,अपना उघाड़े
ये तुम्हारी मुस्कराहट ,प्यार की दे रही आहट
हो रही मेरे हृदय में ,एक अजब सी सुगबुगाहट
समझ में आता नहीं ये ,क्या इशारा कह रहा है
क्या तुम्हारी बंदिशों का ,किला थोड़ा ढह रहा है
क्या ये कहना चाहती हो ,तुम्हे मुझसे महोब्बत है
या कि फिर ये कोई सोची और समझी शरारत है
छेड़ना मासूम भोले नवेलों को और सताना
क्या तुम्हारा शगल है ये ,मज़ा तंग करके उठाना
क्या यूं ही बस मन किया है ,करने हरकत चुलबुली कुछ
या की फिर मन में तुम्हारे ,हो रही है  खलबली कुछ
या गुलाबी देख मौसम ,ना रहा मन पर नियंत्रण
इसलिए तुम देख ऐसे , दे रही मुझको  निमंत्रण
ऐसा लगता है तुम्हारे ,इरादे कुछ नेक ना है
कितना और आगे  बढ़ोगी ,अब यही बस देखना है
सच बताओ बात क्या है ,चल रहा है क्या हृदय में
क्योंकि नन्हा दिल हमारा ,बड़ा आशंकित है भय में
लगा उठने ,प्यार का है ज्वार मन के समंदर में
हक़ीक़त क्या ,जानने को ,हो रहा हूँ ,बेसबर मैं
अगर ये सब शरारत है ,प्रीत यदि सच्ची नहीं है
ऐसे तड़फाना किसी को ,बात ये  अच्छी नहीं है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तरसाते बादल

अम्बर में छाये है ,बादल के दल के दल
पता नहीं क्या कारण ,बरस नहीं पाते पर
चुगलखोर हवाओं से ,क्या लगता इनको डर
मज़ा ले रहे है या  बस तरसा  तरसा कर
तड़ित सी आँख मार ,घुमड़ करे छेड़छाड़ ,
लगता ये आवारा , निकले  है  तफरी पर
या पृथ्वी हलचल पर ,रखने को खास नज़र ,
अम्बर ने भेजा है ,अपना ये गश्ती दल
या कि थक गया सूरज ,ग्रीष्म में तप तप कर
 ओढ़ कर सोया है ,बादल की यह चादर
या फिर ये वृद्ध हुए ,घुमड़ते तो रहते है ,
क्षीण हुये है  जल से ,बरस नहीं  पाते पर
या कि परीक्षा लेते ,धरती के धीरज की ,
विरह पीड़ में तड़फा ,उसे कर रहे पागल
अम्बर में छाये है ,बादल के दल के दल

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '