Friday, September 28, 2018

न नौ मन तेल होगा,न राधा नाचेगी
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(कुछ प्रतिक्रियाएं )
                  १
राधा को नाचना तो नहीं आता,
मगर बहाने बनाती है
कभी आँगन को टेढ़ा बताती है
तो कभी नौ मन तेल मांगेगी
क्योंकि वो जानती है,
न नौ मन तेल होगा होगा,
न राधा नाचेगी
   २
राधा, नाचने के लिए,
अगर नौ मन तेल लेगी
तो इतने तेल का क्या करेगी?
क्या पकोड़ियाँ तलेगी?
और अगर इतनी पकोड़ियाँ खायेगी
तो खा खा कर मोटी हो जाएगी 
फिर कमर कैसे मटकायेगी
और क्या नाच भी पाएगी?
       3 
  हमारे कृष्ण कन्हैया
 कितने होशियार थे
बांसुरी बजा देते थे
और बिना नौ मन तेल के,
राधा को  नचा देते थे 
जैसे मिडिया वाले,
टी.वी. बजा बजा देते है
सत्ता की राधा को,
नचा नचा देते है 
         ४
अगर नौ मन तेल बचाना है,
और राधा को नचाना है
तो कोई आइटम सोंग बजा दो
खुद भी नाचने लगो,
और राधा को भी नचा दो
           ५
शादी के पहले,
तुमने नौ मन तेल देकर ,
राधा को खूब नचाया
पर शादी के बाद,
जब रुक्मणी आएगी
तो तुम्हे इतना नचाएगी
की मज़ा आ जायेगा
तुम्हारा,नौ मन से भी ज्यादा,
तेल निकल जायेगा
            6
गोकुल में,
जब थे कृष्ण और राधा
दूध ,दही,मक्खन खाते थे
और दोनों,गोप गोपियों के संग,
नाचते गाते थे
मक्खन और घी इतना होता था,
की हर कोई,
पुए,पूरी और पकवान,
देशी घी ने पकाता होगा
तेल कौन खाता होगा?
 इसलिए मेरा ये मत है 
की ये मुहावरा ही गलत है
          ७
नाचने के लिये,
नौ मन तेल की मांग करना,
एक दम,ना इंसाफी है
राधा को नचाने के लिये,
तो बांसुरी की धुन,
और कान्हा का प्यार ही काफी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'  
चार पंक्तियाँ-४ 

लाख छुट्टियां काटो ,फाइव स्टार  होटल में ,
सुकून तो अपने घर ,जाकर ही मिलता है  
पचीसों व्यंजन का ,बफे डिनर खालो पर ,
चैन अपने घर  रोटी ,खाकर ही मिलता है 
म्यूजिक के बड़े बड़े ,कन्सर्ट तुम सुन लो पर ,
असली मज़ा ,बाथरूम में ,गाकर ही मिलता है 
रंग बिरंगी परियां, बहलाती मन ,पर सुख तो ,
 बीबी की बाहों में ,आकर ही मिलता है 

घोटू 
शिकायत 

इस तरह आप हमको सतायेंगे जो 
दूरियां हमसे इतनी बनाएंगे  जो 
जिंदगी के तरीके बदल जाएंगे 
हाथ से आपके हम निकल जाएंगे 

सज संवर कर के जलवा दिखाते हमे 
रूप का फेंक पासा ,लुभाते  हमें 
आग मन में मिलन की सुलग जाती जब ,
कुछ बहाने बना कर सताते हमे 
देखिये ऐसे हम ना बहल पाएंगे 
हाथ से आपके हम निकल जाएंगे 

हाथ जो मैं रखूँ तो हटा देते तुम 
फेर कर मुंह हमसे ,पलट जाते तुम 
ऐसा क्या है पता ना तुम्हे हो गया  
कोई जिद मैं करूँ तो बिगड़ जाते तुम 
कोई और मिल गया ,हम फिसल जाएंगे 
हाथ से आपके हम निकल जाएंगे 

घोटू 
चार पंक्तियाँ -३ 

निश्चित ही उनके मन में कोई चोर छुपा था ,
आहट  जरा सी क्या  हुई ,वो चौंकने लगे
आदत से अपनी इस तरह लाचार हो गए ,
हमने कहा जो कुछ भी , हमे टोकने लगे 
डरते थे निकल जाए नहीं उनसे हम आगे ,
अटका के रोड़े ,राह को वो  रोकने लगे 
हमने जो उनके 'डॉग 'को कुत्ता क्या कह दिया ,
कुत्ता तो चुप रहा मगर वो भोंकने लगे 

घोटू  
चार पंक्तियाँ -२ 

हमने ये कहा रात चुरा चाँद ले गयी ,
बदली के संग झोंके हवा के फरार है 
तितली हो मधुमख्खियाँ हो चाहे भ्र्मर हो,
फूलों का रस चुराने को सब बेकरार है 
उनने समझ लिया इसे इल्जाम स्वयं पर ,
कितने है चौकन्ने और वो होशियार है 
कहते है इसको तिनका है दाढ़ी में चोर की ,
खुजला रहे वो अपनी दाढ़ी ,बार बार है 

घोटू 
चार पंक्तियाँ -१ 

होता है राहुकाल कभी या है दिशा शूल, 
चक्कर ये शुभअशुभ का ऐसा सर पे चढ़ गया
पंडित से पूछ मुहूरत ,निकले थे काम पर ,
रस्ते में सामने था, काणा एक पड़ गया 
बैठे हम थोड़ी देर, फिर निकले तो ये हुआ ,
रस्ता हमारा निगोड़ी बिल्ली से कट गया 
फिर निकले ,छींक आ गयी ,अब कोई क्या करे ,
सब काम उहापोह में,यूं ही  बिगड़ गया 
 
घोटू