Tuesday, February 8, 2011

एक कहानी -एक कविता - पारस पत्थर


     (बाल कविता)
श्रम से डरता एक किसान
करता संतों का सन्मान
धरम करम में था विश्वास
गया एक साधू के पास
साधू  बाबा का ध्यान
सेवा करने लगा किसान
साधू बोले आँखे खोल
क्या है इच्छा बच्चा बोल
बोला कृषक ,धन्य जय साधो
एक पारस पत्थर दिलवादो
खेत खोद जा बच्चा अपना
पूरा होगा तेरा सपना
साधू बाबा का वरदान
लगा खोदने खेत किसान
उसने हांके हल और बख्खर
मिला नहीं पर पारस पत्थर
उसने बोया उपजा नाज
आ बोले साधू महाराज
श्रम का पारस पत्थर होना
मिटटी भी बन जाती सोना

शारदे माँ शारदे

शारदे माँ शारदे
मुझे ह्रदय का प्यार दे
वर दे की बनू प्रग्य मै
तू जिंदगी  संवार दे
वीणा वादिनी ,सुर की दाता
हंस वाहिनी बुद्धि प्रदाता
मुझको वर दे स्वर दे माता
नव बसंत बहार दे
शारदे माँ शारदे
कर दे माँ इच्छा सब पूरी
पिला ज्ञान की जीवन मूढ़ी
रहे न मेरी बुद्धि अधूरी
मिटा तू अन्धकार दे
शारदे माँ शारदे
भटक रहे अंधियारे में हम
नव प्रकाश दे ,हर ले सब तम
माँ तेरी वीणा के स्वर हम
नूतन हमें विचार दे
शारदे माँ शारदे
मधुरिमा दे हमें प्यार दे
हम भूखे है ,प्रीत धार दे
आशीर्वादों से दुलार दे
जीवन तू निखार दे
शारदे माँ शारदे