Thursday, October 8, 2015

अपनी अपनी किस्मत

         अपनी अपनी किस्मत

यूं ही पेड़ पर कच्चा झड़ जाता है कोई
कोई पक जाता तो सड़  जाता है कोई
कोई बेचारे का बन जाता  अचार है,
होता है रसहीन ,निचुड़  जाता है कोई
होता कोई स्वाद और बेस्वाद कोई है,
कोई किसी को भाता और कोई ना भाता
हर एक फल की कब होती ऐसी किस्मत है,
साथ उमर के वह सूखा  मेवा बन जाता
      कोई फूल डाल  पर बैठा इठलाता  है 
     कोई निज खुशबू से बगिया महकाता है
     कोई प्रभु पर चढ़ता ,कोई लाश पर चढ़ता , 
     कोई पंखुड़ी पंखुड़ी कर के खिर  जाता है  
         कोई सजता सेहरे या सुहाग सेज पर  ,
        और भोर तक,दबा हुआ, है कुम्हला जाता
       हरेक फूल की किस्मत कब होती गुलाब सी ,
       मिश्री संग मिल,बन गुलकंद ,सभी मन भाता
        हर एक फल की कब होती है ऐसी किस्मत ,
           साथ उमर के वह सूखा मेवा  बन जाता   
कोई की औलाद निकम्मी है नाकाबिल
लायक कोई होती,कर लेती सब हासिल
कोई की औलाद न पूछे मातपिता को,
तिरस्कार करती है और जलाती है दिल
कितने ही माबाप यूं ही घुट घुट कर जीते ,
और किन्ही को बेटा ,सर आँखों बैठाता 
कब होती सबके नसीब में वो औलादें ,
जिनसे उनका नाम और यश है बढ़ जाता
हर एक फल की कब होती है ऐसी किस्मत ,
साथ उमर के ,वह सूखा  मेवा बन जाता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जाने क्यूँ है ऐसा होता ?

     जाने क्यूँ है ऐसा होता ?

कुछ करने को मन ना करता ,
मन करता  ,हिम्मत ना होती  ,
हिम्मत होती ,थक जाता हूँ,
परेशान फिर मन है  रोता
                जाने क्यूँ है  ऐसा होता?
जी  ये करता , थोड़ा टहलूं
सुनु किसी की,अपनी कहलूं 
हंसलूँ  मैं भी मार ठहाका,
कल कल कर नदिया सा बहलूं
    घर से निकल न पाता पर बस
    कुछ करने में आता  आलस
    हो ना पाता मैं  टस  से  मस
            और मेरा धीरज है खोता 
              जाने क्यूँ है ऐसा होता?  
मन खोया रहता यादों में
डूबा रहता  अवसादों में
करवट यूं ही बदलता रहता,
नींद नहीं आती  रातों में
      जी न करे खाने पीने का
      मज़ा गया सारा जीने का  
      छुपा दर्द मेरे सीने  का ,
       आंसूं बन है मुझे भिगोता
         जाने क्यूँ है  ऐसा होता  ?
दिन दिन  बढ़ती हुई उमर है
क्या ये उसका हुआ असर है
दिन भर खोया खोया रहता,
चैन नहीं मुझको पल दो पल है
         कोई भी मन ना बहलाता
        कोई प्यार से ना सहलाता 
         भूल गए सब रिश्ता ,नाता
               यही सोच कर मन है रोता
                  जाने क्यों है ऐसा  होता  ?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आशिकाना मिजाज -बचपन से

      आशिकाना मिजाज -बचपन से

पैदा होते ही पकड ली थी नर्स की ऊँगली ,
      और फिर बाहों में उसने हमे झुलाया था
कोई आ  नर्स बदलती थी हमारी नैप्पी ,
     गोद में ले के ,बड़े प्यार से खिलाया था
हम मचलते थे ,कोई देखने जब आती थी,
       बाहों में हमको भर के ,सीने से लगाती थी
हमारे घर के आजू बाजू की हसीनाएं ,
       आती जाती  हमारे गाल चूम जाती   थी
बीज जो आशिक़ी के पड़ गए थे बचपन में ,
      फसल को अच्छी बन के फिर तो उग ही आना है
बताएं आपको क्या ,ये मगर हक़ीक़त है,
      अपना मिजाज तो बचपन से आशिकाना  है 

घोटू

जीवन चुनाव

           जीवन चुनाव

ये जीवन क्या ,ये जीवन तो एक चुनाव है ,
        इसमें हम तुम ,और कितने ही प्रत्याशी है
इसमें कोई तो है झगड़ालू प्रकृति  वाला,
        तो कोई ,सीधासादा  और मृदुभाषी   है
सबसे पहले अपने इस जीवन चुनाव में ,
        अच्छा क्या है और बुरा क्या चुनना होगा
केवल अपनी ही हाँकोगे ,नहीं चलेगा ,
        बात दूसरों की भी तुमको  सुनना  होगा
तुम्हारा 'मेनिफेस्टो',क्या है ,कैसा है ,
        सोच समझ कर तुमको इसे बनाना होगा
हो सकता है ,बहुत विरोध तुम्हे मिल जाए ,
        विपदाओं से ,बिलकुल ना घबराना  होगा
अगर जीतना है तुमको यदि इस चुनाव में ,
         और नाव है यदि जो अपनी पार लगानी
कितना भी मिल जाय तुम्हे मौसम तूफानी,
          धीरज अगर धरोगे तो होगी  आसानी
कितने ही लालू ,तुमको आ गाली देंगे,
         कितने ही पप्पू ,विरोध आ, जतलायेंगे
लोग मिलेंगे ऐसे भी तुम्हारे बन कर,
         छेद  करें  उस   थाली में ,जिसमे खाएंगे
लेकिन ये सब एक हक़ीक़त है जीवन की,
         उतर अखाड़े में ,मलयुद्ध ,तुम्हे है लड़ना  
सिर्फ शक्ति ही नहीं ,युक्ति भी काम आएगी ,
         सीख दूसरों के अनुभव से होगा  चलना
 आलोचक भी कई मिलेंगे ,यदि जो तुमको ,
           कई चाहने वाले भी तो  मिल जाएंगे         
उनका सब सहयोग भुनाना होगा तुमको,
          इस चुनाव को तब ही आप जीत पाएंगे
और जीत के बाद बहुत रस्ता मुश्किल है,
         वादे जितने किये ,निभाने  होंगे  सारे    
इसीलिए ,ये उचित करो तुम वो ही वादे ,
         जिनको पूरा करना हो बस में तुम्हारे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गौमाता और मातापिता

         गौमाता और मातापिता

बचपन से अब तक तुमको, दूध पिलाया,पोसा,पाला
दूध हमारा ही पी पी कर ,हुआ हृष्ट पुष्ट ,बदन तुम्हारा
जब तक देती रही दूध हम,गौमाता कह,चारा डाला
दूध हमारा बंद हुआ तो, हमको भेज दिया  गौशाला
हम पशु है पर संग हमारे ,क्या ये अत्याचार नहीं है
हम क्या,अपने मातपिता संग,तुम्हारा व्यवहार यही है
जिनने खून पसीना देकर ,तुम्हे बनाया इतना काबिल
तिरस्कार करते हो उनका ,उनसे सब कुछ करके हासिल
तुमको लेकरउनने मन में ,क्या क्या थे अरमान जगाये
अपने पैरों खड़े क्या हुए ,वो लगते अब तुम्हे पराये
बहुत दुखी,पछताते होंगे,और सोचते होंगे मन में
निश्चित ही कुछ कमी रह गयी ,उनके ही लालन पालन में
दुर्व्यवहार देख तुम्हारा , डूबे रहते होंगे गम में
हमको भेजा गौशाला ,उनको भेजोगे  वृद्धाश्रम में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'