Monday, August 8, 2011

विरहन की रात

विरहन की रात
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व्योम से आई उतर कर चांदनी,
दिया मुझको गुदगुदी करके जगा
नींद उचटी इस तरह आई नहीं,
करवटें लेती रही मै, सकपका
और उसपर बादलों से झांक कर,
चाँद भी शैतान सा तकता रहा
इधर मै थी शरम से पानी हुई,
उधर वह निर्लज्ज सा हँसता रहा
और उस पर निगोड़ी पागल हवा,
उड़ा आँचल को, सताती ही रही 
इन सभी की छेड़खानी रात भर,
याद तुम्हारी दिलाती ही रही
छटपटाती ,कसमसाती ही रही,
सोच करके कई बातें अटपटी
क्या बताऊँ तुम्हे प्रियतम तुम बिना,
रात मेरी विरह की कैसी कटी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'