Thursday, June 9, 2011

मै कपास का फूल

मै कपास का फूल
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मै कपास का फूल विकस कर फूट रहा हूँ
मेरा उजला बदन रुई सा झांक रहा है
और बिनोले काले काले ,
छुपे हुए है मुझ में उलझे
मेरी रुई बन जायेगी धागा कत के
और जब कभी कोई ललना,
सुई छेद में ,जब पिरोएगी, कोई धागा,
तो फिर उसके होंठ लगूंगा,मै बढभागा
धागे बुन कर वस्त्र बनेगे
कितनो के ही अंग ढकेंगे
 और बन कर रूमाल ,काम में ,मै आऊंगा
पोंछ पसीना,
कोमल कोमल गालों को, मै सहलाउंगा
और बिनोले,
 बन कर के आहार पशु का,
दूध,दही बन कर बरसेंगे 
कितनो की ही भूख हरेंगे
सर्दी में,मै,ऊष्मा दूंगा,
बन कर रजाई,तन पर छाऊंगा
और गर्मी में,
उजली चादर बन कर ,छत पर बिछ जाऊँगा
मेरा जन्म हुआ है जगती की सेवा को,
हर एक रूप में,काम तुम्हारे मै आऊंगा
मै कपास का फूल,विकस कर फूट रहा हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'