Monday, January 6, 2014

खोदा पहाड़ और निकली चुहिया

 खोदा पहाड़ और निकली चुहिया

पता नहीं क्यों,
मुझे यह मुहावरा ,कुछ प्रेक्टिकल नहीं लगता,
क्योंकि,पहाड़ खोदने पर ,चुहिया नहीं निकलती ,
बल्कि मिटटी या पत्थर है निकलता
 चुहिया तो गरीबों के कच्चे घरों में ,
खेत खलिहानो में ,
या हलवाई की दूकान में ,
या वहाँ ,जहाँ उन्हें कुछ खाने को मिलता है
वहीँ रहती है अपना बिल बना कर
क्या करेगी पहाड़ों में रह कर ,जहाँ मिलते है पत्थर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

गुरु जी गुड ही रहे …

        गुरु जी गुड ही रहे … 

जब गुरु से चेला   आगे निकल जाता था 
'गुरूजी गुड ही रहे ,चेले जी शक्कर हो गए '
ऐसा कहा जाता था
पर आज, जब लाला कि दूकान पर ,
गुड का भाव चालीस रूपये किलो
और शक्कर का भाव तेंतीस रूपये पाया ,
तो समझ में आया
कि गुरु आजकल सचमुच गुरु ही है
मंहगे  ,मीठे ,बंधे और स्वादिष्ट ,खाने में
और चेले,मीठे पर सस्ते, बिखरे दाने दाने में
आजकल 'कोचिंग क्लासेस'में,
 मिलनेवाली,गुरुओं की  कमाई से ,
क्या आपको  ऐसा नहीं लगता ?

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

 

'आप'के आने के बाद

          'आप'के  आने के बाद

एक प्रेमी का अपनी प्रेमिका के लिए ,
कहा गया ये शेर पड़ा प्रसिद्ध है
'वक़्त मेरी जिंदगी में ,दो ही गुजरे है खराब
एक आपके आने से पहले ,एक आप के जाने के बाद'
पर जबसे देहली की राजनीती में ,
आप पार्टी का वर्चस्व हुआ है ,
विरोधी दल यही शेर दूसरे अंदाज में कह रहे है
'वक़्त अपनी जिंदगी में ,ऐसा आया है खराब
हम कहीं के भी रहे ना ,'आप'के  आने के बाद '

'घोटू '     

बोतल में जिन

         बोतल में जिन

बोतल में जिन,व्हिस्की या रम
ये तो जानते है हम
और ये सब शराबें,
हमारे गले भी उतरती है
पर बोतल में ऐसा जिन भी होता है,
जो आपके इशारों पर ,
सारे काम देता है कर
ये बात  गले नहीं उतरती है
पर जबसे ,ये 'लेपटॉप' या 'टेबलेट 'आयी है,
ये बात हमें सच लगने लगी है
जब एक बटन दबाने से ,
सारी दुनिया मुठ्ठी में नज़र आने लगी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

दिन कब बदलेंगे ?

     दिन कब बदलेंगे ?

कभी दिन बड़ा होता है
कभी दिन छोटा होता है
कभी सर्दी का दिन
कभी गर्मी का दिन
कभी बरसात का दिन
यह है प्रकृति का नियम
मौसम के साथ बदलते है दिन
फिर भी हम,
ज्योतिषी,संत,और पंडितो से ,
यह पूछने क्यों जाते है ,
'हमारे दिन कब बदलेंगे ?'

'घोटू '

क्यों ?

          क्यों ?
             १
डेढ़ रूपये का सिनेमा टिकिट ,
डेढ़ सौ का होगया ,
दाम सौ गुना बढ़ गए
पर पब्लिक ने ,न हड़ताल की ,
न प्रदर्शन किये
पर प्याज की कीमत जब ,
थोड़ी बढ़ जाती है
तो इतना हो हल्ला और प्रदर्शन होते है,
कि सरकारे तक गिर जाती है
क्यों?
                २
बड़ी बड़ी होटलों में लाइन लगा कर,
चार सौ रूपये की एक प्लेट ,दाल या सब्जी पाकर ,
और चालीस पचास की एक रोटी खाकर
हम तृप्त होकर,बड़े खुश होते है
पर आलू ,प्याज थोड़े भी मंहगे हुए ,
तो मंहगाई का रोना रोते है
क्यों?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'