Friday, August 26, 2022

चंदन की हो या बबूल की,
 हर लकड़ी के अपने गुण है 
 लेकिन जब वह जल जाती है 
 सिरफ राख ही रह जाती है 
 
मैली बहती गंदी नाली ,
जब मिल जाती है गंगा से 
अपनी सभी गंदगी खो कर ,
वह भी गंगा बन जाती है  

अगर फूल गिरता माटी पर,
 मिट्टी भी खुशबू दे देती ,
 सज्जन संग सत्संग हमेशा 
 मन को शुद्ध किया करता है 
 
अच्छे कर्म किए जीवन के 
आया करते काम हमेशा 
मानव देव पुरुष बन जाता
 घड़ा पुण्य का जब भरता है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
कटी जवानी लाड़ लढाते,
 कटा बुढ़ापा लड़ते लड़ते 
 गलती कोई ने भी की हो ,
 दोष एक दूजे पर मढ़ते

 रस्ते में कंकर पत्थर थे,
  ठोकर खाई संभल गए हम
  सर्दी धूप और बरसाते,
   झेले कई तरह के मौसम
  लेकिन जब तक रही जवानी ,
  हर मौसम का मजा उठाया 
  मस्ती के कोई पल को भी,
   हमने होने दिया न जाया 
   खाया पिया मौज उड़ाई ,
   घूमे पूरी दुनिया भर में 
   थे जवान हम पंख लगे थे,
   उड़ते फिरते थे अंबर में 
   जोश भरा था और उमंग थी
   पैर नहीं धरती पर पड़ते
   कटी जवानी , लाड़ लढाते,
   कटा बुढ़ापा लड़ते-लड़ते 
     
फिर धीरे-धीरे चुपके से,
 दबे पांव आ गया बुढ़ापा 
 घटने लगी उमंग जोश सब,
 संदेशा लाया विपदा का 
 लाड़ प्यार सब फुर्र हो गया ,
 जब तन था कमजोर हो गया
  तानाकशी एक दूजे पर,
  नित लड़ाई का दौर हो गया 
  किंतु लड़ाई जो भी होती,
   प्यार छुपा रहता था उसमें 
   वक्त काटने का एक जरिया
   यह झगड़ा होता था सच में 
  और जीवन का सफर कट गया 
   अपनी जिद पर अड़ते अड़ते 
   कटी जवानी लाड़ लढाते,
   कटा बुढ़ापा, लड़ते-लड़ते

मदन मोहन बाहेती घोटू