Monday, July 30, 2018

           जानवर और मुहावरे 

कितनी अच्छी अच्छी बातें,हमें जानवर है सिखलाते 
उनके कितने ही मुहावरे , हम  हैं  रोज  काम में लाते 
भैस चली जाती पानी में ,सांप छुछुंदर गति हो जाती 
और मार कर नौ सौ चूहे ,बिल्ली जी है हज को जाती 
अपनी गली मोहल्ले में  आ ,कुत्ता शेर हुआ करता है 
रंगा सियार पकड़ में आता ,जब वो हुआ,हुआ करता है 
बिल्ली गले कौन बांधेगा ,घंटी,चूहे सारे  डर जाते है  
कोयल और काग जब बोले , अंतर तभी  समझ पाते है 
बॉस दहाड़े दफ्तर में पर ,घर मे भीगी बिल्ली बनता 
सांप भले कितना टेढ़ा हो,पर बिल में है सीधा घुसता
 काटो नहीं ,मगर फुंफ़कारो ,तब ही सब दुनिया डरती है 
देती दूध ,गाय की  लातें , भी हमको सहनी पड़ती है 
मेरी बिल्ली ,मुझसे म्याँऊ ,कई बार ऐसा होता है 
झूंठी प्रीत दिखाने वाला ,घड़ियाली  आंसू  रोता है 
चूहे को चिंदी मिल जाती ,तो वह है बजाज बन जाता 
बाप मेंढकी तक ना मारी  , बेटा  तीरंदाज  कहाता 
कुवे के मेंढक की दुनिया ,कुवे में ही सिमटी  सब है 
आता ऊँट  पहाड़ के नीचे ,उसका गर्व टूटता  तब है 
भले दौड़ता हो तेजी से ,पर खरगोश हार जात्ता है 
कछुवा धीरे धीरे चल कर ,भी अपनी मंजिल पाता है 
रात बिछड़ते चकवा,चकवी ,चातक चाँद चूमना चाहे 
बन्दर क्या जाने अदरक का ,स्वाद भला कैसा होता है 
रोटी को जब झगड़े बिल्ली ,और बन्दर झगड़ा सुलझाये 
बन्दर बाँट इसे कहते है,सारी  रोटी खुद खा जाए 
कोई बछिया के ताऊ सा ,सांड बना हट्टा कट्टा है 
कोई उल्लू सीधा करता ,कोई उल्लू का पट्ठा  है 
मैं ,मैं, करे कोई बकरी सा ,सीधा गाय सरीखा कोई 
हाथी जब भी चले शान से ,कुत्ते भोंका करते यों  ही  
चींटी के पर निकला करते ,आता उसका अंतकाल है 
रंग बदलते है गिरगट  सा ,नेताओं का यही हाल है
कभी कभी केवल एक मछली ,कर देती गन्दा तालाब है 
जल में रहकर ,बैर मगर से ,हो जाती हालत खराब है 
उन्मादी जब होगा हाथी ,तहस नहस सब कुछ कर देगा 
है अनुमान लगाना मुश्किल,ऊँट कौन करवट  बैठेगा 
जहाँ लोमड़ी पहुँच न पाती,खट्टे वो अंगूर बताती 
डरते बन्दर की घुड़की से ,गीदड़ भभकी कभी डराती 
सीधे  है पर अति होने पर,गधे दुल्लती बरसाते है 
साधू बन शिकार जो करते ,बगुला भगत कहे जाते है 
ये सच है बकरे की अम्मा ,कब तक खैर मना पाएगी 
जिसकी भी लाठी में दम है ,भैस उसी की  हो जायेगी 
कौवा चलता चाल हंस की ,बेचारा पकड़ा  जाता है 
धोबी का कुत्ता ना घर का,और न घाट का रह पाता है 
 घोडा करे  घास से यारी ,तो खायेगा  क्या बेचारा 
जो देती है दूध ढेर सा ,उसी गाय को मिलता चारा 
दांत हाथियों के खाने के ,दिखलाने के अलग अलग है 
बातें कितनी हमें  ज्ञान की ,सिखलाते पशु,पक्षी सब है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

भारत देश महान चाहिए
 
पतन गर्त में बहुत गिर चुके,अब प्रगति,उत्थान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान   चाहिए  

ऋषि मुनियों की इस धरती पर,बहुत विदेशी सत्ता झेली
शीतल मलयज नहीं रही अब ,और  हुई  गंगा भी मैली 
अब ना सुजलां,ना सुफलां है ,शस्यश्यामला ना अब धरती 
पंच गव्य का अमृत देती ,गाय सड़क पर ,आज विचरती 
भूल   धरम की  सब  मर्यादा ,संस्कार भी सब  बिसराये 
 कहाँ गए वो हवन यज्ञ सब,कहाँ गयी वो वेद ऋचाये 
लुप्त होरहा धर्म कर्म अब ,उसमे  नूतन  प्राण चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए  

परमोधर्म  अहिंसा माना ,शांति प्रिय इंसान बने हम 
ऐसा अतिथि धर्म निभाया,बरसों तलक गुलाम बने हम 
पंचशील की बातें करके ,भुला दिया ब्रह्मास्त्र बनाना 
आसपास सब कलुष हृदय है,भोलेपन में ये ना जाना 
मुंह में राम,बगल में छुरी ,रखनेवाले  हमे ठग गए 
सोने की चिड़िया का सोना,चुरा लिया सब और भग गए 
श्वेत कबूतर बहुत उड़ाए ,अब तलवार ,कृपाण चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए 

अगर पुराना वैभव पाना है ,तो हमें बदलना होगा 
जिस रस्ते पर दुनिया चलती उनसेआगे चलना होगा 
सत्तालोलुप कुछ लोगों से ,अच्छी तरह निपटना होगा 
सत्य अहिंसा बहुत हो गयी,साम दाम से लड़ना होगा 
हमकोअब चाणक्य नीति से,हनन दुश्मनो का करना है 
वक़्त आगया आज वतन के,खातिर जीना और मरना है 
हर बंदे के मन में जिन्दा ,जज्बा और  तूफ़ान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान  चाहिए 

कभी स्वर्ग से आयी थी जो,कलकल करती गंगा निर्मल 
हमें चाहिए फिर से वो ही ,अमृत तुल्य,स्वच्छ गंगाजल 
भारत की सब माता बहने ,बने  विदुषी ,लिखकर पढ़कर  
उनको साथ निभाना होगा ,साथ पुरुष के ,आगे बढ़ कर 
आपस का मतभेद भुला कर ,भातृभाव फैलाना  होगा 
आपस में बन कर सहयोगी ,सबको  आगे आना होगा 
हमे गर्व से फिर जीना है ,और पुरानी  शान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए 

सभी हमवतन ,रहे साथ मिल ,तोड़े मजहब की दीवारे 
छुपे शेर की खालों में जो ,कई भेड़िये ,उन्हें  संहारे 
जौहर में ना जले  नारियां ,रण में जा दिखलाये जौहर 
पृथ्वीराज ,प्रताप सरीखे ,वीर यहाँ पैदा हो घर घर 
कर्मक्षेत्र या रणभूमि में ,उतरें पहन बसंती बाना 
कुछ करके दिखलाना होगा,अगर पुराना वैभव पाना 
झाँसी की रानी के तेवर और आत्म सन्मान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला वो ही हिन्दुस्थान चाहिए  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, July 20, 2018

अचार 

कच्ची सी अमिया ,अगर पक जाती 
तो मधुर रस से भर जाती 
निराला स्वाद देती 
खाने वाले को आल्हाद देती 
पर बेचारी को ,बाली उमर में रोना पड़ा 
स्वाद के मारों के लिए ,कुर्बान होना पड़ा 
टुकड़े टुकड़े होकर कटना पड़ा 
चटपटे मसालों से लिपटना पड़ा 
और आने वाले साल भर तक ,
लोगों को चटखारे देने को तैयार हो गयी 
सबका प्यार हो गयी 
कोई भी चीज का ,
जब अधकचरी उमर में ,
इस तरह बलिदान दिया जाता है 
और बाद में दिनों तक ,
उसके स्वाद का मज़ा लिया जाता है 
इसे पूर्णता प्राप्त किया हुआ ,
अधूरा अफसाना कहते है 
जी हाँ इसे अचार बनाना कहते है 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
बारिश की घटायें -कालेज की छाटाएँ 

देखो कितनी छायी घटाएं भरी भरी है 
चंचल है ये ,एक जगह पर कब ठहरी है 
कई बदलियां ,बरसा करती ,कभी नहीं है 
और लड़कियां भी तो पटती ,सभी नहीं है 
कोई बदली घुमड़ घुमड़ कर गरजा करती 
तो कोई बिजली बन कर के कड़का करती 
कोई बदली ,बरसा करती ,रिमझिम रिमझिम 
कोई मूसलाधार लुटाती अपना यौवन 
कोई की इच्छाएं ,अब तक जगी नहीं है 
और लड़कियां भी तो पटती सभी नहीं है 
कोई है बिंदास ,कोई है सहमी सहमी 
कोई रहे उदास ,किसी में गहमा गहमी 
कोई आती ,जल बरसाती ,गुम  हो जाती
कोई घुमड़ घुमड़ कर मन में आस जगाती 
कोई उच्श्रंखल है ,रहती दबी  नहीं है 
और लड़कियां भी तो पटती सभी नहीं है 

मदनमोहन बहती 'घोटू ' 
 
पति ही है वो प्राणी 

कठिन सास का अनुशासन है और ननद के नखरे 
देवर के तेवर तीखे है ,और  श्वसुर सुर  बिखरे 
बेटा  सुनता नहीं जरा भी ,कुछ बोलो तो रूठे 
बेटी  हाथों से मोबाईल , मुश्किल से ही  छूटे 
और देवरानी  देवर से ,चार कदम  है  आगे 
नौकर से जो कुछ बोलो तो काम छोड़ कर भागे
पर जिससे हर  काम कराने में होती है आसानी
पत्नी आगे पीछे   नाचे  ,पति ही है वो  प्राणी 
मेहरी ,कामचोर नंबर वन ,फिर भी है नखराली 
दिन भर खुद ही खटो काम में ,समय न मिलता खाली 
सुनु एक की दस ,सब से ही ,जो मैं बोलूं चालूं  
अपने मन की सब भड़ास मैं ,बोलो कहाँ निकालूँ 
जिसे डाट मन हल्का कर लूं ,और जो सुन ले मेरी 
बिना चूं चपड़ ,बात मान ले ,बिना लगाए  देरी 
सिर्फ पति हर बात मानता ,है बिन आना कानी 
पत्नी आगे पीछे नाचे ,पति ही है वो  प्राणी 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
  
ससुर का सन्मान करना  चाहिए 

मांग में जिसका सिन्दूरी रंग है  
सदा सुख दुःख में जो रहता संग है 
प्यार करता ,तुम्हारा  मनमीत है 
जिंदगी का जो मधुर  संगीत  है 
लहलहाई जिसने जीवन की लता 
लाया है जो जिंदगी में पूर्णता 
जो हृदय से तुम्हे करता स्नेह है  
खुश रहो तुम यही जिसका ध्येय है 
रात दिन खटता  है जो परिवार हित 
करती करवा चौथ तुम जिस प्यार हित 
दिया जिसने सुख तुम्हे मातृत्व का 
लुटाता जो खजाना ,अपनत्व  का 
सुख सदा बरसाता जिसका साथ है 
जिसके कारण सुहागन हर रात है 
जिसके संग ही जिंदगी में है ख़ुशी 
जिसके कारण होठों पर थिरके हंसी 
संवरना सजना सभी जिसके लिए 
मुस्करा तुम संग में जिसके  जिये 
मुश्किलों में साथ जो हरदम खड़ा 
जिसकी बाहों का सहारा है बड़ा 
जो है हमदम ,दोस्त है और हमसफ़र 
जिसके संग बंधन बंधा सारी उमर 
जिसके कारण खनकती है चूड़ियां 
धन्य वो जिनने दिया ऐसा  पिया 
सर्वाधिक अनमोल निधि संसार की 
जो है बहती हुई गंगा प्यार  की 
गंगा से गंगोत्री अति पूज्य है 
पिता माता,पति के, अति पूज्य है 
सास का गुणगान करना चाहिए 
ससुर का सन्मान करना चाहिए 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '

Thursday, July 19, 2018

Re:

thanks dhall saheb

2018-07-19 18:37 GMT+05:30 Ram Dhall <dhall.ram@gmail.com>:
Kyaa baat hai,  Baheti ji.

Bechare nimboo ki vyatha, ati sunder shabdon mein likhi hai.

On Thu, 19 Jul 2018, 18:14 madan mohan Baheti, <baheti.mm@gmail.com> wrote:
बेचारे नीबू 

भले हमारी स्वर्णिम आभा ,भले हमारी मनहर खुशबू 
फिर भी बलि पर हम चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 
सारे लोग स्वाद के मारे ,हमें काटते और निचोड़ते 
बूँद बूँद सब रस  ले लेते ,हमें कहीं का नहीं छोड़ते 
सब्जी,दाल,सलाद  सभीका ,स्वाद बढ़ाने हम कटते है
सभी तरह की चाट बनालो ,स्वाद चटपटा हम करते है 
हमें निचोड़ शिकंजी बनती , गरमी में ठंडक  पाने को 
हमको काट अचार बनाते ,पूरे साल ,लोग खाने को 
बुरी नज़र से बचने को भी ,हमें काम में लाया जाता 
दरवाजों पर मिरची के संग ,हमको है लटकाया जाता 
टोने और टोटके में भी ,बढ़ चढ़ होता  काम हमारा 
नयी कार की पूजा में भी ,होता है  बलिदान हमारा 
कर्मकांड में बलि हमारी ,नज़रें झाड़ दिया करती है 
ढेरों दूध ,हमारे रस की ,बूंदे   फाड़ दिया करती  है 
चूरण और पचन पाचन में ,कई रोग की हम भेषज है 
छोटे है पर अति उपयोगी ,हम मोसम्बी के वंशज है 
हम भरपूर विटामिन सी से ,हर जिव्हा पर करते जादू 
फिर भी हम बलि पर चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '

Re:

Kyaa baat hai,  Baheti ji.

Bechare nimboo ki vyatha, ati sunder shabdon mein likhi hai.

On Thu, 19 Jul 2018, 18:14 madan mohan Baheti, <baheti.mm@gmail.com> wrote:
बेचारे नीबू 

भले हमारी स्वर्णिम आभा ,भले हमारी मनहर खुशबू 
फिर भी बलि पर हम चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 
सारे लोग स्वाद के मारे ,हमें काटते और निचोड़ते 
बूँद बूँद सब रस  ले लेते ,हमें कहीं का नहीं छोड़ते 
सब्जी,दाल,सलाद  सभीका ,स्वाद बढ़ाने हम कटते है
सभी तरह की चाट बनालो ,स्वाद चटपटा हम करते है 
हमें निचोड़ शिकंजी बनती , गरमी में ठंडक  पाने को 
हमको काट अचार बनाते ,पूरे साल ,लोग खाने को 
बुरी नज़र से बचने को भी ,हमें काम में लाया जाता 
दरवाजों पर मिरची के संग ,हमको है लटकाया जाता 
टोने और टोटके में भी ,बढ़ चढ़ होता  काम हमारा 
नयी कार की पूजा में भी ,होता है  बलिदान हमारा 
कर्मकांड में बलि हमारी ,नज़रें झाड़ दिया करती है 
ढेरों दूध ,हमारे रस की ,बूंदे   फाड़ दिया करती  है 
चूरण और पचन पाचन में ,कई रोग की हम भेषज है 
छोटे है पर अति उपयोगी ,हम मोसम्बी के वंशज है 
हम भरपूर विटामिन सी से ,हर जिव्हा पर करते जादू 
फिर भी हम बलि पर चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
बेचारे नीबू 

भले हमारी स्वर्णिम आभा ,भले हमारी मनहर खुशबू 
फिर भी बलि पर हम चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 
सारे लोग स्वाद के मारे ,हमें काटते और निचोड़ते 
बूँद बूँद सब रस  ले लेते ,हमें कहीं का नहीं छोड़ते 
सब्जी,दाल,सलाद  सभीका ,स्वाद बढ़ाने हम कटते है
सभी तरह की चाट बनालो ,स्वाद चटपटा हम करते है 
हमें निचोड़ शिकंजी बनती , गरमी में ठंडक  पाने को 
हमको काट अचार बनाते ,पूरे साल ,लोग खाने को 
बुरी नज़र से बचने को भी ,हमें काम में लाया जाता 
दरवाजों पर मिरची के संग ,हमको है लटकाया जाता 
टोने और टोटके में भी ,बढ़ चढ़ होता  काम हमारा 
नयी कार की पूजा में भी ,होता है  बलिदान हमारा 
कर्मकांड में बलि हमारी ,नज़रें झाड़ दिया करती है 
ढेरों दूध ,हमारे रस की ,बूंदे   फाड़ दिया करती  है 
चूरण और पचन पाचन में ,कई रोग की हम भेषज है 
छोटे है पर अति उपयोगी ,हम मोसम्बी के वंशज है 
हम भरपूर विटामिन सी से ,हर जिव्हा पर करते जादू 
फिर भी हम बलि पर चढ़ते है ,हम तो है बेचारे नीबू 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, July 18, 2018

सागर की लहरों का योवन,सरिता का कल कल स्पंदन ये उन्नत उन्नत युग्म शिखर,जिनमे हर पल हर क्षण कम्पन जैसे पुष्पों में बिकसे फल,फल में भी प�¥8 1ष्पों का सौरभ योवन के उपवन की बहार, माता की ममता के गौरव इन में अपरिमित वात्सल्य ,ममता से भी ज्यादा ममत्व, है घनीभूत इन पुंजों में,सुन्दà A4�ता का सारा रहस्य ये मादकता से भी मादक,ये कोमलता भी कोमल कितने सुंदर चंचल मनहर ,ये स्नेहिल ममता के निर्झर जैसे की �

सागर की लहरों का योवन,सरिता का कल कल स्पंदन
ये उन्नत उन्नत युग्म शिखर,जिनमे हर पल हर क्षण कम्पन
जैसे पुष्पों में बिकसे फल,फल में भी पुष्पों का सौरभ
योवन के उपवन की बहार, माता की ममता के गौरव
इन में अपरिमित वात्सल्य ,ममता से भी ज्यादा ममत्व,
है घनीभूत इन पुंजों में,सुन्दरता का सारा रहस्य
ये मादकता से भी मादक,ये कोमलता भी कोमल
कितने सुंदर चंचल मनहर ,ये स्नेहिल ममता के निर्झर
जैसे की क्षीर सरोवर में ,हो खिले हुए दो श्वेत कमल
या एक साथ हो चमक रहे,ज्यों भुवनभास्कर ,रजनीकर
या सुधा भरे ये युगल कलश,ममता मादकता का संगम
कितना स्निग्ध कितना कोमल,ये गंगा जमुना का उदगम
इनके स्पंदन कम्पन में,मुखरित होते जीवन के स्वर
ये ज्योतिर्पुंज कर रहे है ,आलोकित प्रणय विभा सुंदर
जब खुद अपना ही ह्रदय भेद,कर प्रकटे है ये युग्म शिखर
तो औरों के उर भेदन में,इनको लगता केवल पल भर
मन को चुभ चुभसा जाता है,स्वछंद मचलता सा योवन
पर आलिंगन के बंधन में बढता है इनका तीखापन
सुन्दरता का रस छिपा हुआ है,इन्ही वक्र रेखाओ में
नारी तन का सारा सोश्तव, सिमटा है इनकी बाँहों में
कटी कंचन कट विधि ने जब,ममता की माटी में घोला
अपनी सम्पूर्ण कलाओं को ,पहनाया यह जीवित चोला
गढ़ डाले ये स्तूप युगल, तो अमर हो गयी सुन्दरता
रह गया देखता खुद अपनी ,रचना को वह सृष्टिकर्ता
लख मूर्त रूप सुन्दरता का,यदि दोल गया आराधक मन
कोमल कगार पर फिसल गयी,चंचल दृग की चंचल चितवन
ये दोष नहीं है चितवन का,ये मौन निमंत्रण देते है
ये दो उभरे नवनीत शिखर ,जब खुद आमंत्रण देते है
पुष्पों का सौरभ पाने को,सबका ही मन ललचाता है
इनका आलिंगन पाने को,जी किसका नहीं चाहता है
वह नजर नजर ही नहीं अगर,इनको देखे और न फिसले
वह जिगर जिगर ही नहीं अगर,इनको देखे और न मचले
वह रूप रूप ही नहीं अगर,उसमे कोई आव्हान न हो
सौन्दर्य सार्थक न तब तक,जब तक उसका रसपान न हो

Saturday, July 14, 2018

ये उत्तर प्रदेश है 

ये उत्तम है,सर्वोत्तम है ,इसकी बात विशेष है 
सबसे प्यारा,सबसे न्यारा ,ये उत्तर परदेश  है 
ये मेरा देश है ,उत्तर प्रदेश है 
जन्मभूमि यह श्रीकृष्ण की ,यहीं पे जन्मे राम है 
मथुरा ,वृन्दावन काशी है और अयोध्या धाम है 
गंगा और गोमती बहती सरयू भी अविराम   है 
धर्म कर्म शिक्षा संस्कृती का ,यहीं हुआ उत्थान है 
दिया बुद्ध ने ,सारनाथ में ,यहीं ज्ञान सन्देश है 
सबसे प्यारा ,सबसे न्यारा ,ये उत्तर परदेश है 
ये मेरा देश है ,उत्तरप्रदेश है 
शष्यश्यामला है ये धरती ,सभी तरफ हरियाली है 
है समृद्ध यहाँ के वासी ,सुख शांति, खुशहाली है 
खेत लहलहाते है फसलों से,फलों लदी हर डाली है 
रहनसहन और खानपान में ,इसकी बात निराली है 
प्रगति पथ पर बढ़ता जाता ,बदल रहा परिवेश है 
सबसे प्यारा सबसे न्यारा ये उत्तर परदेश  है 
ये मेरा देश है ,उत्तरप्रदेश है 
बड़ी सुहानी सुबहे बनारस और अवध की शाम है 
 वृन्दावन  की गली गली में ,,राधे राधे   नाम है 
लखनऊ की मशहूर नज़ाकत और चिकन का काम है 
और यहीं पर  ताजमहल है ,जो भारत की शान है   
यहाँ बनारस की साड़ी है ,गंगा घाट विशेष है 
सबसे प्यारा सबसे न्यारा ,ये उत्तर परदेश  है 
ये मेरा देश है,उत्तरप्रदेश है 
गन्ने की खेती होती है ,गुड़ से मीठे लोग है 
मथुरा के पेड़े से लगता ,कान्हा जी का भोग है 
यहां आगरा के पेठे है और खुरजा की खुरचन है 
गरम जलेबी ,पूरी कचौड़ी सबका ही प्रिय भोजन  है
वाराणसी के ठंडाई और मघई पान विशेष है 
सबसे प्यारा ,सबसे न्यारा ,ये उत्तर परदेश है 
ये मेरा देश है ,उत्तर प्रदेश है 
सभी समस्याओं का उत्तर देने में ये सक्षम है 
कहते है उत्तर प्रदेश हम ,पर प्रदेश ये उत्तम है 
यहाँ प्रयाग में गंगा जमुना सरस्वती का संगम है 
भाई भाई से मिल कर रहते ,यहाँ पे हिन्दू मुस्लिम है 
मिल कर मनती  ईद दिवाली ,भातृभाव सन्देश है
सबसे प्यारा सबसे न्यारा ये उत्तर परदेश है 
ये मेरा देश है ,उत्तर प्रदेश है 
 हस्तशिल्प उद्योग यहाँ पर ,गाँव गाँव में विकसित है 
हर बच्चा ,अब कंप्यूटर में ,शिक्षित और प्रशिक्षित है 
सड़क रेल का जाल बिछा है ,वातावरण सुरक्षित है 
नए नए उद्योग यहाँ पर रोज हो रहे विकसित है 
आमंत्रण सरकार दे रही सुविधा कई विशेष है 
सबसे प्यारा ,सबसे न्यारा ,ये उत्तर परदेश है 
ये मेरा देश है ,उत्तर प्रदेश है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Monday, July 9, 2018

मैं हूँ ताबेदार तुम्हारा 

  मेरा घर संसार तुम्ही से 
खुशियां और त्योंहार तुम्ही से 
जो भी है सरकार  तुम्ही से 
सारा दारमदार  तुम्ही से 
मुझमे नवजीवन भरता है ,
मेरी सजनी प्यार तुम्हारा 
मैं हूँ ताबेदार तुम्हारा 

चुटकी भर सिन्दूर मांग में ,
डाल फंसाया प्रेमजाल में 
कैद किया मुझको बिंदिया में,
और सजाया मुझे भाल में 
हाथों की हथकड़ी बना कर ,
मुझे चूड़ियों में है बाँधा 
या फिर पावों की बिछिया में,
रहा सिमिट मैं सीधासादा 
एड़ी से लेकर चोंटी तक ,
फैला कारागार तुम्हारा 
मैं हूँ ताबेदार तुम्हारा 

नहीं मुताबिक़ अपने मन के ,
जी सकता मैं ,कभी चाह कर 
पका अधपका खाना पड़ता ,
मुश्किल से ,वो भी सराह कर 
गलती से ,कोई औरत की ,
तारीफ़ कर दी,खैर नहीं है 
'कोर्ट मार्शल 'हो जाने में ,
मेरा ,लगती देर नहीं है 
तुम्हारे डर आगे दबता ,
मन का सभी गुबार हमारा 
मैं हूँ ताबेदार तुम्हारा
 
तुम सजधज कर ,रूप बाण से ,
घायल करती मेरा तनमन 
मात्र इशारे पर ऊँगली के,
नाच करूं मैं कठपुतली बन 
जाने कैसा आकर्षण है 
तुम्हारी मदभरी नज़र में 
बोझा लदे हुए गदहे सा ,
भागा करता इधर उधर मैं 
तुम को खुश रख कर ही मिलता ,
प्यार भरा व्यवहार तुम्हारा 
मैं हूँ ताबेदार तुम्हारा 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Thursday, July 5, 2018

निराले पिया 

ऐसे प्यारे निराले हमारे पिया 
मैंने पहली नज़र में है दिल दे दिया 
रात पहली मिलन की था उनने कहा ,
पूरे सपने तेरे सारे कर दूंगा  मैं 
चाँद सा मुख लिए आओ आगोश में ,
मांग तेरी सितारों से भर दूंगा मैं 
उनने वादा निभाने की कोशिश करी ,
मुझको साड़ी दी सलमा सितारों भरी 
पांच सितारा एक होटल में लेकर गए ,
'फाइवस्टार 'चॉकलेट दी केडबरी 
उनने दिल से निभाया जो वादा किया 
ऐसे प्यारे निराले हमारे पिया 
मैं सजूं ना सजू ,चाहे कैसी रहूँ 
हुस्न की मुझको कहते सदा मल्लिका 
ऐसे प्यारे डीयर मेरे इंजीनियर ,
बांधते मेरी तारीफ़ के पुल सदा 
उनको जैसा भी दूँ मैं पका कर खिला ,
खाते चटखारे ले प्रेम के साथ है 
उनका हर दिन ही वेलेंटाइन दिवस ,
और हनीमून वाली हरेक रात है 
ढूंढते ना कभी ,मुझमें वो खामियां 
बड़े प्यारे निराले हमारे पिया 

घोटू 
करारे नोट 

कल तलक हम भी करारे नोट थे ,आजकल तो महज चिल्लर रह गए 
कोई हमको पर्स में रखता नहीं ,गुल्लकों में बस सिमट कर रह गये 
था जमाना हमको जब पाता कोई ,जरिया बनते थे ख़ुशी और हर्ष का 
कल तलक  कितनी हमारी पूछ थी ,बन गए हम आज बोझा पर्स का 
छोटे  बटुवे में छुपा कर लड़कियां ,लिपटा अपने सीने से रखती हमे 
उँगलियों से सहला  कर गिनती हमें प्यार वाली निगाह  से तकती हमें 
घटा दी मंहगाई ने क्रयशक्तियाँ ,हुआ अवमुल्यन हम घट कर रह गए
कल तलक हम भी करारे नोट थे ,आजकल तो महज चिल्लर रह गए 
नेताओं ने दीवारों में चुन रखा ,वोट पाने का हम जरिया बन गए 
चुनावों में वोट हित  बांटा हमें ,जीत का ऐसा नज़रिया बन गए 
जाते जब इस हाथ से उस हाथ में ,काम में आ जाती है फुर्ती सदा 
चेहरे पर  झांई बिलकुल ना पड़ी ,लगे कहलाने हम काली सम्पदा 
चलन में थे किन्तु चल पाए नहीं ,लॉकरों में हम दुबक कर रह गए 
कल तलक हम भी करारे नोट थे आजकल तो महज चिल्लर रह गए 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
पके हुए फल 

हम तो पके हुए से फल है ,कब तक डाली पर लटकेंगे 
गिरना ही अपनी नियति है ,आज नहीं तो कल टपकेंगे 
इन्तजार में लोग  खड़े है ,कब हम टपके ,कब वो पायें 
सबके ही मन में लालच है ,मधुर स्वाद का मज़ा उठायें 
देर टपकने की ही है देखो,हमको पाने सब झपटेंगे 
हम तो पके हुए से फल है ,कब तक डाली पर लटकेंगे 
ज्यादा देर रहे जो लटके ,पत्थर फेंक तोड़ देंगे  वो 
मीठा गूदा रस खा लेंगे ,गुठली वहीँ छोड़ देंगे  वो 
ज्यादा देर टिक गए तो फिर ,सबकी आँखों में खटकेंगे 
हम तो पके हुए से फल है ,कब तक डाली पर लटकेंगे 
गिरना ही अपनी नियति है ,आज नहीं तो कल टपकेंगे 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जीवन की फड़फड़ाहट 

उन्मुक्त बचपन की चहचहाहट 
किशोरावस्था की कुलबुलाहट 
जवानी की सुगबुगाहट 
हुस्न की चमचमाहट 
मन में  प्यार की गरमाहट 
पत्नी के कोमल हाथों की थपथपाहट 
हनीमून की खिलखिलाहट 
प्यार और जिम्मेदारियों की  मिलावट 
गृहस्थी की गड़बड़ाहट 
पैसा कमाने की हड़बड़ाहट 
जीवन की गाडी की खड़खड़ाहट 
परेशानिया और छटपटाहट 
आने लगती है थकावट  
जब रूकती है व्यस्तता की फड़फड़ाहट  
आती है बुढ़ापे की फुसफुसाहट 
शिथिल तन की कुलबुलाहट 
नज़रों की धुंधलाहट 
गायब होती मौजमस्ती की गमगमाहट
मन में होती झनझनाहट 
अंकल कहे जाने पर चिड़चिड़ाहट 
स्वास्थ्य  में गिरावट 
हर काम में रुकावट 
ऐसे में भगवान के प्रति झुकावट   
पुरानी  यादों की गरमाहट 
और चेहरे पर मुस्कराहट 
दूर कर देती है बुढ़ापे की गड़बड़ाहट 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
जीवन की फड़फड़ाहट 

उन्मुक्त बचपन की चहचहाहट 
किशोरावस्था की कुलबुलाहट 
जवानी की सुगबुगाहट 
हुस्न की चमचमाहट 
मन में  प्यार की गरमाहट 
पत्नी के कोमल हाथों की थपथपाहट 
हनीमून की खिलखिलाहट 
प्यार और जिम्मेदारियों ली मिलावट 
गृहस्थी की गड़बड़ाहट 
पैसा कमाने की हड़बड़ाहट 
जीवन की गाडी की खड़खड़ाहट 
परेशानिया और छटपटाहट 
आने लगती है थकावट  
जब रूकती है व्यस्तता की फड़फड़ाहट  
आती है बुढ़ापे की फुसफुसाहट 
शिथिल तन की कुलबुलाहट 
नज़रों की धुंधलाहट 
गायब होती मौजमस्ती की गमगमाहट
मन में होती झनझनाहट 
अंकल कहे जाने पर चिड़चिड़ाहट 
स्वास्थ्य  में गिरावट 
हर काम में रुकावट 
ऐसे में भगवान के प्रति झुकावट   
पुरानी  यादों की गरमाहट 
और चेहरे पर मुस्कराहट 
दूर कर देती है बुढ़ापे की गड़बड़ाहट 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
फलती फूलती औरतें 

अहमियत औरतों की ,जिंदगी में ख़ास है 
मगर उनके दर्द का ,हमको नहीं अहसास है 
गुलबदन ,शादी के पहले होती नाज़ुक फूल है
काम जब करती नहीं तो बदन जाता फूल है  
काम ज्यादा अगर करती ,फूल जाती सांस है 
काम यदि कम करे तो मुंह फुला लेती सास है 
फुला देता उन्हें पति के प्यार का आहार है 
उनके बलबूते ही फलता फूलता परिवार है 
देती बच्चों को दुआएं ,उनकी हर एक सांस है 
अहमियत औरतों की ,जिंदगी में ख़ास है 

घोटू