Thursday, June 26, 2014

खुशनुमा मौसम

               खुशनुमा मौसम

बहुत दिनों के बाद आज फिर ,ठंडी ठंडी हवा चली ,
बहुत दिनों के बाद आज फिर ,मौसम हुआ खुशनुमा है
कभी कड़कती है बिजली और कभी गरजते है बादल,
आसमान में उनकी हरकत ,बढ़ने लगी सौगुना है 
फिर से कुछ मृदुता आयी है ,आग उगलते सूरज में,
फिर से  उमड़ उमड़ कर छाये ,बादल के दल है नभ में 
फिर से इठला रही हवाएँ,पाकर बूंदों का चुम्बन ,
लहराती है शीतल होकर ,प्यार जगाती है सब में
तपिश कभी थी जो तड़फ़ाती चुभती तन पर लू बन कर ,
पा बारिश स्पर्श हो गयी ,फिर से शीतल मतवाली
फिर से नवजीवन आया है ,सूखे पौधों,पादप में,
फिर से फ़ैल गयी है भू पर ,सुन्दर ,मनहर हरियाली
फिर से बादल,प्यार नीर भर ,है बैचेन बरसने को,
फिर से मधुर मिलन की आशा ,जागी धरती के मन में
यादें  मधुर मिलन की,कड़क रही है बिजली बन,
फिर से होगा ,पिया मिलन और फूल खिलेंगे आँगन में
 फिर से सौंधी सौंधी खुशबू से माटी महकाई  है ,
रिमझिम रिमझिम की स्वरलहरी ,बादल रहे गुनगुना है
बहुत दिनों के बाद आज फिर ठंडी ठंडी हवा चली,
बहुत दिनों के बाद आज फिर ,मौसम हुआ खुशनुमा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


उमर के साथ साथ

     उमर के साथ साथ

कभी जब उनके कन्धों की,दुपट्टा शान होता था ,
      वो चलते थे तो लहराता ,हमें वो लगती  थी तितली
खुले बादल से जब गेसू,हवा में,उनके,उड़ते थे ,
       अदा से जब वो मुस्काते  ,चमकते दांत बन बिजली
जवानी में ये आलम था ,ठुमक कर जब वो चलते थे,
        थिरकता जिस्म मतवाला  , बना  देता  था  दीवाना
उमर ने करदी ये हालत, रही ना जुल्फ काली अब ,
         पाँव में आर्थराइटिस है,बड़ा मुश्किल है  चल  पाना
मगर एक बात है अब भी,कशिश जो पहले उन में थी,
          अभी तक वो ही कायम है,लुभाती हमको उतना ही
हमारी उनकी चाहत में,न आया कोई  भी अंतर ,
            गयी बढ़ती उमर जैसे ,बढ़ा है प्यार उतना ही

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

चोरी चोरी -चुपके चुपके

        चोरी चोरी -चुपके चुपके

कुछ चीजें ,आम होकर भी,
हो जाती है  बड़ी ख़ास
जब वो नहीं मिल पाती तुम्हे ,
या तुम्हे नहीं जाने दिया जाता उनके पास
जैसे आम ,
इतने सारे तमाम ,
हर तरफ नज़र आते  है खुले आम
पर क्योंकि हमारे खून में है शकर
इसलिए डाक्टर के कहने पर,
हम आम खा नहीं सकते  है
सिर्फ तरसते हुये दूर से  तकते है
 बस खुशबूवें लेते हुए ,
अपनी मजबूरी पर करते है अफ़सोस
और रह जाते है मन को मसोस
जिसे कभी काट काट कर,
कभी गिलबिला कर,
रसपान किया  करते थे जी भर
आजकल बस दूर से निहार लेते है
और ,चोरी चोरी ,चुपके चुपके,
बीबी से नज़रें बचा,
कभी कभी डंडी मार लेते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'