Sunday, April 30, 2023

भूलने की बिमारी

बुढ़ापे में मुश्किल यह भारी हुई है 
मुझे भूलने की बीमारी हुई है

नहीं याद रखा रहता ,कहां क्या रखा है 
याददाश्त देने लगी अब दगा है 
किसी का पता और नाम भूल जाता 
करने को निकला वह काम भूल जाता 
समय पर दवा लूं, नहीं याद रहता 
मस्तिष्क , मन में है अवसाद रहता 
यूं ही मुश्किलें ढेर सारी हुई है 
मुझे भूलने की बीमारी हुई है 

मगर याद रहती है बातें पुरानी 
वो बचपन के किस्से ,वो यादें पुरानी 
जवानी के दिन भी ,भुलाए न जाते 
वो जब याद आते ,बहुत याद आते 
अकेले में होती है यादें सहारा 
इन्हीं से गुजरता समय है हमारा 
घटनायें कितनी ही प्यारी हुई है 
मुझे भूलने की बीमारी हुई है 

नहीं भूल पाता वह ममता का आंचल 
मुझे याद आता ,पिताजी का वो डर
याद आती बचपन की शैतानियां सब 
गुजरे दिनों की वो नादानियां सब 
भाई बहन की , वो तू तू , वो मैं मैं
खुल्ली छतों पर , वो सोना मजे में 
बुढ़ापे में यादों से यारी हुई है 
मुझे भूलने की बीमारी हुई है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
किसी का मजाक मत उड़ाओ

अगर नहीं होना चाहते हो जीवन में परेशान 
तो कभी भी किसी का मजाक मत उड़ाओश्रीमान

 किसी की बोलचाल का 
 किसी की चाल ढाल का 
 किसी के भोलेपन का 
 किसी के मोटे तन का 
 किसी की काठी कद का 
 किसी के नीचे पद का 
 किसी के गंजेपन का 
 या किसी भी निर्धन का 
 कभी भी मजाक मत उड़ाओ 
 क्योंकि उसमें यह जो खामियां है 
 सब कुछ ईश्वर ने ही दिया है 
 और इनका मजाक है ईश्वर का अपमान 
 इसलिए किसी का मजाक मत उड़ाओ श्रीमान
 
 कई बार तुम्हारे व्यंग 
 किसी को चुभ जाए तो 
कर सकते हैं तुम्हे तंग 
द्रौपदी का एक व्यंग ,
 कि अंधों का बेटा भी होता है अंधा 
 भरी सभा में द्रोपदी को करवा सकता है नंगा इसी मजाक के कारण 
 हुआ था महाभारत का रण 
 लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक काट कर
  उड़ाया था उसका उपहास 
  और झेलना पड़ा था सीता हरण का त्रास आपका कोई भी मजाक
  कब किस के दिल को ठेस पहुंचा दे 
  पता ही नहीं लगता 
  शब्दों का व्यंग बाण बहुत गहरा है चुभता इसलिए सोच समझकर इस्तेमाल करो अपनी जुबान
  और किसी का मजाक मत उड़ाओ श्रीमान

मदन मोहन बाहेती घोटू

कर्म करो 

जो होना है ,वह है होता 
करो नहीं तुम ,यह समझौता 
तुम तकदीर बदल सकते हो ,
भाग्य जगा सकते हो सोता 

सिर्फ भाग्य का रोना रोकर ,
अगर कर्म करना छोड़ोगे 
बिन प्रयास के आस करोगे 
तो अपना ही सर फाेड़ोगे 
सच्ची मेहनत और लगन से ,
अगर प्रयास किया है जाता 
बाधाएं सारी हट जाती 
ना मुमकिन ,मुमकिन हो जाता 
उसको कुछ भी ना मिल पाता,
 भाग्य भरोसे जो है सोता 
 जो होना है ,वह है होता 
 करो नहीं ,तुम यह समझौता 
 
सच्चे दिल से कर्म करोगे,
 तुम्हें मिलेगा फल निश्चय ही 
 मेहनत करके जीत मिलेगी 
 आज नहीं तो कल निश्चय ही 
 रखो आत्मविश्वास ,सफलता ,
 तब चूमेगी चरण तुम्हारे 
 वो ही सदा जीत पाते हैं ,
 कभी नहीं जो हिम्मत हारे 
 निश्चय उसे विजय श्री मिलती 
 कभी नहीं जो धीरज खोता
  जो होना है ,वह है होता 
  करो नहीं तुम यह समझौता 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
तारा जी के जन्मदिवस पर 

तुम छिहत्तर, मैं इक्यासी
 प्यार हमारा, हुआ न बासी
 
 प्रिय, तुमने मुझको जीवनभर 
 दिए खुशी के कितने ही पल 
 
 आज तुम्हारे जन्मदिवस पर 
 चाहूं लौटाना , दूने कर 
 
 ऐसा कुछ दूं,जो मन भाए 
 तुम्हारा श्रृंगार बढ़ाएं 
 
 जिसे देख कर मन हर्षाये 
 और खुशी चेहरे पर छाये
 
 हीरक हार , भेंट है तुमको 
 मेरा प्यार ,भेंट है तुमको
 
 गोरे तन पर स्वर्ण दमकता
 हर हीरे में, प्यार चमकता 
 
 जैसे गले लगाया मुझको
 गले लगा कर रखना इसको

मदन मोहन बाहेती 

Monday, April 24, 2023

लकीरों का खेल 

कोई अमीर है ,कोई गरीब है 
कोई पास है ,कोई फेल है 
यह सब किस्मत की लकीरों का खेल है 
कहते हैं आपका हाथ, जगन्नाथ है,
पर असल में हाथ नहीं, हाथ की लकीरें जगन्नाथ होती है 
जो आपकी जिंदगी में आपका भविष्य संजोती है 
कुछ लकीरें  सीधी तो कुछ  वक्र होती है 
ये हाथों की लकीरें ही जीवन का चक्र होती है 
जो पूर्व जन्म के कर्मों के से हाथ पर बनती है 
और इस जन्म के कर्मों के अनुसार बनती और बिगड़ती है 
कहते हैं किसी भी आदमी के अंगूठे की सूक्ष्म लकीरें ,
दुनिया के किसी अन्य आदमी से नहीं मिलती है 
जीवन पथ की लकीरें टेढ़ी-मेढ़ी ऊंची नीची हुआ करती है ,
जो कई मोड़ से गुजरती है 
ये लकीरें गजब की चीज है ,
चिंता हो तो माथे पर लकीरें खिंच जाती हैं 
बुढ़ापा हो तो शरीर पर झुर्रियां बनकर बिछ जाती है 
औरत की मांग में भरी सिंदूर की लकीर
 सुहाग का प्रतीक है 
 नयनों को और कटीला बनाती काजल की लीक है 
 कुछ लोगों के लिए पत्नी की आज्ञा पत्थर की लकीर होती है 
 नहीं मानने पर बड़ी पीर होती है 
 लक्ष्मण रेखा को पार करने से, हो जाता है सीता का हरण 
 मर्यादा की रेखा में रहना ,होता है सुशील आचरण 
 कुछ लोग लकीर के फकीर होते हैं 
 पुरानी प्रथाओं का बोझ जिंदगी भर ढोते हैं 
 कुछ लोग सांप निकल जाता है पर लकीर पीटते रहते हैं 
 कुछ पुरानी लकीरों पर खुद को घसीटते रहते हैं भाई भाई जो साथ-साथ पलकर बड़े होते हैं 
 धन दौलत और जमीन के विवाद में उनमें जब लकीर खिंच जाती है ,
 तो अदालत में एक दूसरे के सामने खड़े होते हैं 
 ये लकीरें बड़ा काम आती है 
 बड़े-बड़े प्रोजेक्ट का नक्शा लकीरें ही बनाती है दुनिया के नक्शे में लकीरें सरहद बनाती है 
 नारी के शरीर की वक्र रेखाएं,
 उसे बड़ी मनमोहक बनाती है 
 अच्छा यह है कि हम 
 भाई बहनों के बीच 
 यार दोस्तों के बीच
 पति-पत्नी के बीच 
 विवाद की कोई लकीर खींचने से बचें 
 और चेहरे पर मुस्कान की लकीर लाकर 
 सुख से रहें और हंसे

मदन मोहन बाहेती घोटू

Saturday, April 22, 2023

म की महिमा 

बच्चा जब बोलना सीखता है 
तो सबसे पहले वो म सीखता है 
पाकर मां की ममता और दुलार 
पिता और भाई बहनों का प्यार 
मिलजुल कर रहने का भाव हम सीखता है 
बच्चा सबसे पहले जब बोलना सीखता है 
तो सबसे पहले म सीखता है 

फिर वह सीखता है बारहखड़ी 
पढ़कर किताबें फिर बड़ी-बड़ी 
उसका मैं जागृत हो जाता है 
और वह अहम सीखता है 
बच्चा जब बोलना सीखता है 
तो सबसे पहले वह म सीखता है 

फिर जब जगती किसी के प्रति चाह
 और हो जाता है उसका विवाह 
 तो वह मां की ममता का म भुला देता है 
 भाई बहन के प्यार का हम भुला देता है 
 यहां तक की अपना मैं याने अहम भुला देता है पत्नी के आगे पीछे डोलता है 
और बस यस मैडम यस मैडम ही बोलता है 
बच्चा जब बोलना सीखता है
तो सबसे पहिले वह म सीखता है 

और जब बुढ़ापा आ जाता है 
तो फिर कोई भी म काम नहीं आता है 
और एक ही म करता है मुक्ति देने का काम 
और वह होता है राम का नाम 
बचपन की मां के नाम के साथ सीखा म,
राम के नाम के म में बदल जाता है 
और यह म ही अन्त समय काम आता है
बच्चा जब बोलना सीखता है
तो सबसे पहले वह म सीखता है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
घोटू के पद 

साधो, मान बात निज मन की 
वही करो जिसको मन माने और लगे जो ढंग की साधो,मान बात निज मन की

बहुत सलाहे देने वाले ,मिल जाएंगे तुमको 
लेकिन तुम्हें परखना होगा गुण को और अवगुण को 
कई बार मन और मस्तक में ,होगी खींचातानी 
पर जो सोच समझ निर्णय लें, वह है सच्चा ज्ञानी 
भाव वेग में बहने देते ,हैं जो अपनी नैया
कभी भंवर में फंस जाते तो मिलता नहीं खिवैया 
सद्बुद्धि ही पार कराती है नदिया जीवन की 
साधो,मान बात निज मन की

 घोटू 
शिकायत पत्नी की 

प्रिय मुझको बिल्कुल ना पसंद 
तुम्हारे दोहरे मापदंड 

जब आई तुम्हारी देहरी थी 
मैं दुबली और छरहरी थी 
मैं लगती प्यारी तुम्हें बड़ी 
तुम मुझको कहते कनक छड़ी 
फिर मुझे प्यार आहार खिला 
तुमने तन मेरा दिया फुला 
बढ़ गए बदन के सब घेरे 
और तंग हुए कपड़े मेरे 
तो मोटी मोटी कह कर के 
करते रहते हो मुझे तंग 
प्रिय मुझको बिल्कुल ना पसंद 
तुम्हारे दोहरे मापदंड 

जुल्फें मेरी काली काली 
लगती है तुमको मतवाली 
मोहती है इनकी छटा तुम्हें 
कहते हो काली घटा इन्हे
पर गलती से यदि एक बार 
इन जुल्फों का जो एक बाल
आ जाए दाल में अगर नजर 
तो मुझे कोसते हो जी भर 
तुम थाली छोड़ चले जाते 
मुझको देते इस तरह दंड 
प्रिय मुझको बिल्कुल नापसंद 
तुम्हारे दोहरे मापदंड 

है मेरी ननंद बड़ी प्यारी 
लगती है बहना तुम्हारी 
तुम उसे चिढ़ाते रहते हो 
और उल्टा सुल्टा कहते हो 
लेकिन मेरी बहना प्यारी 
जो लगती तुम्हारी साली 
तुम जान लुटाते हो उस पर 
आधी घरवाली कह अक्सर 
उसके संग फ्लर्टिंग करते हो 
क्या अच्छे हैं यह रंग ढंग
प्रिय मुझको बिल्कुल ना पसंद 
तुम्हारे दोहरे मापदंड

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Thursday, April 20, 2023

प्यार

बीमार हुआ जब से ,रखती है ख्याल पत्नी,
पलकों पर बिठा मुझको,पल-पल वो पालती है

 इंतहा है प्यार की यह ,चलती है छड़ी लेकर,
 खुद तो संभल न पाती, मुझको संभालती है

घोटू 

Sunday, April 16, 2023

मेरी बेटी 

मेरी बेटी ,मुझे खुदा की ,बड़ी इनायत 
हर एक बात में, मेरी करती रहे हिमायत

कितनी निश्चल ,सीधी साधी, भोली भाली 
हंसती रहती, उसकी है हर बात निराली 
कुछ भी काम बताओ ,करने रहती तत्पर
कुछ भी कह दो,नहीं शिकन आती चेहरे पर 
सच्चे दिल से ,मेरा रखती ख्याल हमेशा 
नहीं प्यार करता है कोई उसके जैसा 
कितनी ममता भरी हुई है उसकी चाहत 
मेरी बेटी ,मुझे खुदा की बड़ी नियामत 

जितना प्यार दिया बचपन में मैंने उसको 
उसे चोगुना करके ,बांट रही है सबको 
चुस्ती फुर्ती से करती सब काम हमेशा 
उसके चेहरे पर रहती मुस्कान हमेशा 
कुछ भी काम बता दो ,ना कहना, ना सीखा 
सब को खुश रखने का आता उसे तरीका 
हर एक बात पर ,देती रहती मुझे हिदायत 
मेरी बेटी ,मुझे खुदा की ,बड़ी इनायत 

मैके,ससुराल का रखती ख्याल बराबर 
दोनों का ही रखती है बैलेंस बनाकर 
सबके ही संग बना रखा है रिश्ता नाता 
कब क्या करना ,कैसे करना ,उसको आता जिंदादिल है खुशमिजाज़ है लगती अच्छी 
मुझको गौरवान्वित करती है मेरी बच्ची 
होशियार है ,उसमें है भरपूर लियाकत 
मेरी बेटी ,मुझे खुदा की बड़ी इनायत 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
बुजुर्ग साथियों से 

हम बुजुर्ग हैं अनुभवी हैं और वरिष्ठ हैं 
पढ़े लिखे हैं, समझदार, कर्तव्यनिष्ठ है 
 बच्चों जैसे, क्यों आपस में झगड़ रहे हम
 अपना अहम तुष्ट करने को अकड़ रहे हम 
 हम सब तो ढलते सूरज, बुझते दिये हैं 
 बड़ी शान से अब तक हम जीवन जिये हैं 
 किसे पता, कब कौन बिदा ले बिछड़ जाएगा कौन वृक्ष से ,फूल कौन सा ,झड़ जाएगा 
 इसीलिए जब तक जिंदा , खुशबू फैलाएं 
 मिल कर बैठे हंसी खुशी आनंद मनाएं 
 आपस की सारी कटुता को आज भुलाएं 
 रहें प्रेम से और आपस में हृदय मिलाएं 
 अबकी बार हर बुधवार 
 ना कोई झगड़ा ना तकरार 
 केवल बरसे प्यार ही प्यार
चवन्नी की पीड़ा 

कल मैंने जब गुल्लक खोली 
एक कोने में दबी दबी सी, सहमी एक चवन्नी बोली 
कल मैंने जब गुल्लक खोली 

आज तिरस्कृत पड़ी हुई मैं,इसमें मेरी क्या गलती थी 
मुझे याद मेरे अच्छे दिन ,जोर शोर से मैं चलती थी 
मेरी क्रय शक्ति थी इतनी, अच्छा खानपान होता था 
सवा रुपए की परसादी में ,मेरा योगदान होता था 
अगली सीट सिनेमाघर की ,क्लास चवन्नी थी कहलाती 
सस्ते में गरीब जनता को ,पिक्चर दिखला, दिल बहलाती 
जब छुट्टा होती तो मिलते चार इकन्नी , सोलह पैसे 
मेरी बड़ी कदर होती थी ,मेरे दिन तब ना थे ऐसे 
मार पड़ी महंगाई की पर, आकर मुझे अपंग कर दिया 
मेरी वैल्यू खाक हो गई ,मेरा चलना बंद कर दिया 
अब सैया दिल नहीं मांगते,ना उछालते कोई चवन्नी 
और भिखारी तक ना लेते, मुझे देखकर काटे कन्नी
पर किस्मत में ऊंच-नीच का चक्कर सदा अड़ा रहता है 
कभी बोलती जिसकी तूती, वह भी मौन पड़ा रहता है 
भोग रही मैं अपनी किस्मत ,जितना रोना था वह रो ली 
एक कोने में दबी दबी सी , सहमी एक चवन्नी बोली 
कल मैंने जब गुल्लक खोली

मदन मोहन बाहेती घोटू 
चिंतन 

कल की बातें, कड़वी खट्टी ,याद करोगे, दुख पाओगे 
आने वाले ,कल क्या होगा, यदि सोचोगे ,
घबराओगे 
जो होना है , सो होना है ,व्यर्थ नहीं चिंता में डूबो,
भरसक मजा ,आज का लो तुम , तभी चैन से जी पाओगे

घोटू 

Wednesday, April 12, 2023

मैं पप्पू हूं 

लोग मुझे पप्पू कहते मैं,बचपन से सिरफिरा रहा हूं 
सभी मिलाते हैं हां में हां, मैं चमचों से घिरा रहा हूं

कभी नमाजी टोपी पहनी कभी जनेऊ मैं लटकाता 
अपना धर्म बदलता रहता, ब्राह्मण में खुद को बतलाता 
मैं लोगों को गाली देता, लोग मुझे गाली देते हैं एक प्रतिष्ठित खानदान की, बिगड़ी फसल मुझे कहते हैं 
लंबी-लंबी करी यात्रा ,फिर भी आगे ना बढ़ पाया 
ना तो कुर्सी पर चढ़ पाया, ना ही में घोड़ी चढ़ पाया 
मैंने जो भी काम किया है अपने मन का,
अपने ढंग का
अपनी जिद पर अड़ा रहा मैं ,हार गया सोने की लंका 
अंट शंट मै बकता रहता ,करता रहता हूं गुस्ताखी 
राजघराने का वारिस हूं ,राजा नहीं मांगते माफी 
 कितना लोगों ने समझाया क्षमा मांग लो,हो गई गलती 
लेकिन क्षमा मांग कर कैसे ,कर लूं अपनी मूंछें नीची 
प्राइम मिनिस्टर मैं बन जाऊं, मम्मी जी की यह हसरत है 
मैं विदेश में, बुरा बताता ,भारत को ,मेरी आदत है

अपनी हरकत से मैं अपनी ,पार्टी नीचे गिरा रहा हूं 
लोग मुझे पप्पू कहते मैं बचपन से सिरफिरा रहा हूं

घोटू
कल तक के अंगूर था मैं 

कल तलक अंगूर था मैं ,
आज किशमिश बन गया हूं 

कटा बचपन लताओं संग,
एक गुच्छे में लटकता 
संग में परिवार के मैं ,
समय के संग रहा बढ़ता 

और एक दिन पक गया जब ,
साथियों का साथ छूटा 
त्वचा चिकनी और कसी थी 
स्वाद भी पाया अनूठा 

अगर थोड़ा और पकता 
और मेरा रस निकलता 
समय के संग वारूणी बन,
 मैं नशीला जाम बनता 

उम्र ने लेकिन सुखाया 
वारुणी तो बन न पाया 
बना किशमिश और मीठा ,
सुहाना सा रूप पाया 

तब था जीवन चार दिन का,
 हुई लंबी अब उमर है 
 आदमी में और मुझ में, 
 उम्र का उल्टा असर है 

 आदमी की उम्र बढ़ती 
 अंत उसका निकट आता 
 मुझ में जब आता बुढ़ापा 
उमर है मेरी बढ़ाता 

 उम्र का यह फल मिला है
  अब नहीं मैं फल रहा हूं
  लोग मेवा मुझे कहते,
  सभी के मन भा रहा हूं

  डर न सड़ने, बिगड़ने का,
  स्वाद से मैं सन गया हूं
  कल तलक अंगूर था मैं,
  आज किशमिश बन गया हूं

मदन मोहन बाहेती घोटू 

सीख ले अब तू ढंग से सोना 

भाग दौड़ में जीवन उलझा, लगा कमाने में तू पैसा 
रत्ती भर भी चैन नहीं है रहता है बेचैन हमेशा 
ढंग से अपने मनमाफिक तू, दो रोटी भी ना खा पाता 
सारा दिन भर किसके खातिर ,मेहनत करता और कमाता 
तुझे रात भर, नींद ना आती, सोता करवट बदल बदल कर
बहुत हुआ माया का चक्कर ,अब तो बस कर अब तो बस कर 
चिंताओं से व्यर्थ ग्रसित तू ,होगा वो ही जो है होना 
बहुत हो गया सोना सोना, सीख ले अब तू ढंग से सोना 

बहुत व्यस्त तेरा जीवन तू हरदम रहता परेशान है 
तेरी सारी बीमारी का ,ढंग से सोना ही निदान है 
अगर चैन से नींद आएगी, तुझको बड़ा सुकून मिलेगा 
सुबह उठेगा खुद को हल्का और ताजा महसूस करेगा 
तेरा अगला पूरा दिन ही, रंग, उमंग से भर जाएगा 
नया सवेरा ,तेरे जीवन में खुशियां भर कर लाएगा 
मनचाही भरपूर नींद लें, बंद कर रोज-रोज का रोना 
बहुत हो गया सोना सोना, सीख ले अब तू ढंग से सोना

मदन मोहन बाहेती घोटू
 प्रबल है संभावनाएं 
 
आ रहा चुनाव सर पर 
गहमागहमी है भयंकर 
झूठी झूठी बातें फैला, 
लोग तुमको बरगलायें 
प्रबल है संभावनाएं 

नेता सब हारे पुराने 
आज बनते हैं सयाने 
जुड़े उनकी चौकड़ी और,
 महाभारत ये कराएं 
 प्रबल है संभावनाएं 
 
कई वर्षों बिना खाए 
भूखे बैठे तिल मिलाये 
फिर से हथियाने को सत्ता,
 हाथ आपस में मिलाएं 
 प्रबल है संभावनाएं 
 
कोई नेता बांध मफलर 
भोली भाली छवि दिखाकर 
झूठे वादे करके सबको 
बना बुद्धू ,वोट पाए 
प्रबल है संभावनाएं 

एक पप्पू जो न जाने 
उसे कब क्या बोलना है 
बेतुकी हरकतें कर के, 
तपस्वी खुद को बताए 
प्रबल है संभावनाएं 

सोच अभिमन्यु अकेला 
चाहते हैं खेलें खेला 
राज्य चाहे जल रहा हो,
 पहन टोपी ,पार्टी खाएं 
 प्रबल है संभावनाएं 
 
हमें लेना फैसला है 
क्या बुरा है क्या भला है 
यूं ही झूठे प्रलोभन से ,
कहीं धोखा खा न जाएं 
प्रबल है संभावनाएं 

इसलिए है जरूरी यह
सोचकर हम करें निर्णय 
चुने कर्मठ आदमी को ,
देश जो उन्नत बनाएं 
प्रबल है संभावनाएं 

कई वर्षों देखा भाला 
देश को जिसने संभाला 
योग्य जो है सबसे ज्यादा,
 फिर से मोदी को जिताएं
 प्रबल है संभावनाऐं 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Wednesday, April 5, 2023

सब कुछ सिमट गया बोतल में

बनी अभिन्न अंग जीवन का ,मौजूद जीवन के पल पल में
 सब कुछ सिमट गया बोतल में 
 
 रोज सुबह से शाम तलक हम ,बोतल के ही संग संग जीते 
 बालपने में मां की छाती छोड़ दूध बोतल से पीते सुबह दूध बोतल में आता ,बोतल लेकर जाते जंगल 
 बोतल में बंद कोकोकोला ,बोतल भर कर बिकता है जल 
 बोतल में ही तेल भरा है इत्र, सेंट ,परफ्यूम समाए 
 बोतल भर गंगाजल लाते ,बोतल में है भरी दवाएं बोतल में है मीठा शरबत, शैंपेन है, बियर सोड़ा सास टमाटर का बोतल में, है अचार पर माथा चौड़ा 
 कितने ही सौंदर्य प्रसाधन ,शैंपू ,भरकर बोतल आई 
 हार्पिक,कोलोन ,बोतल में ,भरा फिनाइल करे सफाई 
 गर्मी में फ्रिज खोलो ,पीलो, भरा बोतलों का ठंडा जल 
अलादीन का जिन्न भटकता, अगर नहीं जो होती बोतल  
दारू भरी एक बोतल से ,काम निपट जाते हैं पल में 
सब कुछ सिमट गया बोतल में

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Tuesday, April 4, 2023

आओ खुद के खातिर जी लें

परिवार की जिम्मेदारी 
थी जितनी भी सभी निभा ली
नहीं चैन से पल भर बैठे,
करी उमर भर ,मारा मारी 
बच्चे सभी लगे धंधे पर,
 हाथ किए बेटी के पीले 
 जीवन के अब बचे हुए दिन 
 आओ खुद के खातिर जी लें 
 
ईंट ईंट कर घर बनवाया
धीरे-धीरे उसे सजाया 
जीवन की आपाधापी में ,
उसका सुख पर नहीं उठाया 
आओ अब अपने उस घर में,
हंस कांटे, कुछ पल रंगीले 
जीवन के कुछ बचे हुए दिन 
आओ खुद के खातिर जी लें

 करी उम्र भर भागा दौड़ी
 कोड़ी कोड़ी, माया जोड़ी 
 पर उसका उपभोग किया ना
 यूं ही है वह पड़ी निगोड़ी 
 साथ नहीं जाएगा कुछ भी
 क्यों ना इसका सुख हम भी लें 
 जीवन के अब बचे हुए दिन,
 आओ खुद के खातिर जी लें
  
 खुले हाथ से खर्च करें हम 
 देश विदेशों में विचरें हम 
 करें सहायता निर्धन जन की ,
 थोड़ा संचित पुण्य करें हम 
 जो न कर सके वह मनचाही ,
 कर आनंद का अमृत पी लें 
 जीवन के अब बचे हुए दिन 
 आओ खुद के खातिर जी लें 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
बहुत दिन हुए 

बहुत दिन हुए, तुम पर अपना प्यार लुटाये 
बहुत दिन हुए, फंसा उंगलियां हाथ मिलाये
अब तो सुनती हो ,कह काम निकल जाता है,
 बहुत दिन हुए ,रानी कहकर तुम्हें बुलाये 
 आती नजर घटाएं थी जिनमें सावन की,
 बहुत दिन हुए तुम्हारी जुल्फें सहलाये 
 याद नहीं ,पिछली कब की थी छेड़खानी, 
 बहुत दिन हुए, एक दूजे को हमें सताये 
 संग सोते पर होते मुखड़े इधर-उधर हैं ,
 बहुत दिन हुए होठों पर चुंबन चिपकाये 
 याद नहीं कब पिछली बार बंधे से हम तुम 
 बहुत दिन हुए, बाहुपाश में तुम्हें लगाये 
 बहुत शांति से हम मशीनवत जीवन जीते,
 बहुत दिन हुए, तुमको रुठे ,मुझे मनाये
 इधर उधर की चर्चा में दिन गुजर रहे हैं,
 बहुत दिन हुए प्रेम कथा अपनी दोहराये
 अब ना तो आवेश बचा है ना वह जिद है 
 बहुत दिन हुए, ना कहने की नौबत आये
जितना सुख पा ले संग रह कर, उतने खुश हैं बहुत दिन हुए ,ये बातें ,मन को समझाये

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Monday, April 3, 2023

तब की रिमझिम, अब की रिमझिम

ये होती बात जवानी में
पानी बारिश रिमझिम बरसे
चाहे छतरी हो तान रखी
तुम भी भीगो,हम भी भीगे
तब तन में सिहरन होती थी
हम तुम जाते थे तड़फ तड़फ 
वो मजा भीगने का अपने
होता था कितना रोमांचक 
हम और करीब सिमट जाते
भीगे होते दोनो के तन
हम आपस में सट जाते थे
दूना होता था आकर्षण

अब  है ये हाल बुढापे में
पानी बारिश रिमझिम बरसे 
ना तुम भीगो ,ना हम भीगे 
एक छतरी में हम तुम सिमटे
अब भी हम आपस में सटते
डरते हैं भीग नहीं जाएं 
रहते बौछारों से बचते 
सर्दी बुखार से घबराएं 
तब मजा भीगने में आता
अब लगे भीगने में डर है
यौवन के और बुढापे के
प्यार में ये ही अंतर है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Saturday, April 1, 2023

सफेदपोश नेता 

कई नेता पहनते उजले वसन 
किंतु काला बहुत उनका आचरण
ढोंग करते देश सेवा कर रहे 
मगर वो अपनी तिजोरी भर रहे 
बहुत खोटी पाओगे उनकी नियत 
ढूंढते रह जाओगे इंसानियत

घोटू 
कहानी एक कौवे की 

कौवे की मां चाह रही थी बेटा उसका हंस बने

 फिर से आसमान का राजा,उसका पूरा वंश बने
 
 धोया देश विदेशों में जा, रंग सफेद न हो पाया
 
 और जब भी मौका आया ,वो कांव-कांव ही चिल्लाया
 
घोटू