Thursday, August 30, 2018

मॉडर्न कवि मिलन 

वो आये ,उनका स्वागत कर ,हमने पूछा भाई 
घर का पता ढूढ़ने में कुछ मुश्किल तो ना आई 
उनने झट से मुस्कराकर निज मोबाईल दिखलाया 
बोले 'जी पी एस 'लगा है,'गूगल 'ने पहुँचाया 
हमने पूछा थके हुए हो ,चाय वाय  मँगवाये 
बोले अपने 'वाई फाई 'का ,पहले कोड बताएं 
फिर पास आये ,फोन उठाकर ,खींची सेल्फी झट से 
'पहुंच गए 'लिख 'व्हाट्स एप'पत्नी को भेजा फट से 
हम बोलै साहित्य जगत की ,क्या खबरें है नूतन 
वो बोले मॉडर्न तखल्लुस रखने का अब फैशन 
चंद्रमुखी ने नाम बदल कर ,'फेस बुकी 'कर डाला 
सर्वेश्वर ने नया तखल्लुस 'गूगली 'है रख डाला 
डायरी में कविता लिख कर रखना सबने छोड़ा 
मोबाईल लख ,कविता पढ़ते ,ऐसा नाता जोड़ा 
अपना ब्लॉग बना निज रचना लोग पोस्ट है करते 
पढ़ने वाले दिखा अंगूठा ,लाइक उसको करते 
साहित्यिक पत्रिका बंद सब ,पेपर भी ना छापे 
टी वी वाले ,कविसम्मेलन करते कभी बुलाके 
हास्य कवि ,चुटकुले सुना कर ,है ताली बजवाते 
अब ना बच्चन की मधुशाला ,अब ना नीरज गाते 
कविसम्मेलन में भी देखी  है गुटबाजी छाई 
एक  दूजे की कविता सुन कर ,करते वाही वाही
फिर बोले,छोडो ये किस्से ,तुम कैसे बतलाओ 
ये तो चलता सदा रहेगा ,अब तुम चाय मँगाओ 

मदन मोहन बाहेती ' घोटू ' 
मैं डॉग लवर हूँ 

मैं भी कुत्ते सा भौंका करता अक्सर हूँ 
                             मैं डॉग लवर हूँ 
मैं कुत्ते सा, मालिक आगे पूंछ हिलाता 
रोज रोज ही ,सुबह घूमने  को मैं  जाता 
स्वामिभक्त श्वान सा ,मेरी बात निराली 
मैं भी पूरे घरभर की करता  रखवाली 
झट जग जाता,श्वान सरीखी निद्रा रखता 
मैं हूँ घर में ,कोई अजनबी ,नहीं फटकता 
खड़े कान रहते ,चौकन्ना रहता हरदम 
बंधे गले में, पट्टे से   सामजिक बंधन  
हो जब अपनी गली. स्वयं को शेर समझता 
हड्डी डालो ,खुद का खून ,स्वाद ले चखता 
रोटी कोई डाल दे ,रखता नहीं सबर हूँ 
                              मैं डॉग लवर हूँ 
   
घोटू 
ओरंज कॉउंटी -अपना घर 

एक साथ हम रहें सभी मिल ,भाई भाई 
जैसे सोलह फांक ,संतरे बीच समाई 
ये ओरंज काउंटी है ,ये है अपना घर  
दिन दिन इसे बनाना है अब सबसे बेहतर  

हमे त्यागनी होगी सबको निज हठधर्मी 
बात बात, करना विवाद और गर्मागर्मी 
एक  दूजे के दोष नहीं ,ढूंढें  अच्छाई 
झूंठ न टिकता ,सदा जीतती है सच्चाई 
देना यही संदेशा हमको है अब घर घर  
दिन दिन इसे बनाना है अब सबसे  बेहतर  

अपने 'मैं 'को त्याग जब तलक 'हम 'ना होंगे 
तब तक बैरभाव और झगड़े  कम ना होंगे 
ध्यान सफाई का सबको मिल रखना होगा 
और सुरक्षा की कमियों को ढकना होगा 
हराभरा हो महके अपना प्यारा परिसर 
दिन दिन इसे बनाना है अब सबसे बेहतर 

यहीं कटेगी उमर ,यहीं जीना मरना है 
इसीलिये इस परिसर में खुशियां भरना है 
बच्चे सब मिल खेले कूदे ,नाचे,  गाये 
हंसीखुशी सब मिल ,सारे त्योंहार मनायें 
दिल से दिल मिल ,आपस में हो प्रेम परस्पर 
दिन दिन इसे बनाना है अब सबसे बेहतर 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
औरतों  का जादू 

ना जाने ,सभी औरतों को ,ये कैसा जादू आता है 
जो मर्द किसी की ना सुनता ,बीबी के काबू आता है 

वह थोड़ा पुचकारा करती ,सहला थोड़ा बहलाती है 
फिर इतना काबू कर लेती ,ऊँगली पर उसे नचाती है 
वह इतना खौफजदा रहता , सब रौब दफ़ा हो जाता है 
ये एक बार की बात नहीं ,ये हरेक दफा  हो  जाता  है 
बीबी जब हुकम चलाती है तो हाकिम भी घबराता है 
ना जाने सभी औरतों को ,ये कैसा जादू आता  है 

एजी,ओजी,के चक्कर में ,फौजी हथियार डाल देता 
पत्नी की बात न टाल सके,औरों की बात टाल देता 
जाता है रोज रोज दफ्तर ,मेहनत करता है महीने भर 
अपनी कमाई सारी पगार ,पत्नी हाथों पर देता धर 
नित खर्चे को पत्नी आगे ,वह हाथ अपने फैलाता है 
ना जाने सभी औरतों को ,ये कैसा जादू  आता है 

पत्नी का मूड नहीं बिगड़े ,परवाह उसे सबसे ज्यादा 
पत्नी पसंद के वस्त्र पहन ,पत्नी पसंद खाना खाता 
कंवारेपन का उड़ता पंछी ,पिंजरे में बंद तड़फता है 
गलती से भी वो इधर उधर ,ना ताकझांक कर सकता है 
था कभी शेर ,अब हुआ ढेर ,भीगी बिल्ली बन जाता है 
ना जाने सभी औरतों को ,ये कैसा जादू  आता है  

जो बात जरा सी ना मानी ,तो बस समझो कि मुश्किल है 
ना चाय ,नाश्ता ना खाना ,कुछ भी तो ना पाता मिल है 
वह अश्रुबाण चला कर जब ,आँखों से मोती  बरसाती 
रखने ना देती हाथ तुम्हे ,और चिढ़ा चिढ़ा कर तरसाती 
फिर हार मान बेचारा पति ,उसके चरणों झुक जाता है 
ना जाने सभी औरतों को ,ये कैसा जादू आता  है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'