Sunday, November 21, 2010

दिनचर्या -बुदापे की

दिनचर्या -बुदापे की
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुढ़ापे में
          १
खोल एल्बम हर फोटो पर आँख  गाढ़ते है
कुरते की बाहों से सबकी धूल झाड़ते है
भूल्भुलेया में यादो की खोया करते है
कभी कभी हँसते है या फिर रोया करते है
धुंधली आँखों से ये दुनिया लगती मैली है
लगता है ये जीवन एक अनभूझ पहेली है
सिसक सिसक बौरा जाते ना रहते आपे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
              २
खोल रेडियो बहुत पुराने गाने सुनते है
फीके खाने के संग तीखे ताने सुनते है
सास बहू के सभी सीरियल देखा करते है
'बागवान' सी फिलम देख कर आहे भरते है
बार बार अख़बार  चाट कर वक्त बिताते है
डूबा चाय में यादो के कुछ बिस्किट खाते है
एकाकीपन खो जाता है हँसते गाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे  में
             ३
बी.पी.हार्ट, शुगर की गोली, यही नाश्ता है
जितने है भगवान सभी में बड़ी आस्था है
आर्थे राइ टिस हे घुटनों में,चलना भारी है
कथा भागवत टी वी पर ही सुनना जारी है
छड़ी उठा कर सुबह पार्क में टहला करते है
खिलती कलिया फूल देख कर ,बहला करते है
वक्त गुजरता हमदर्दों के संग बतियाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                ४
याददास्त भी साथ निभाने में कतराती है
ताज़ी नहीं पुरानी बाते मन में छाती है
होता मन उद्विग्न आँख से आंसू बहते है
फिर भी मन की पीर छुपा कर हँसते रहते है
जीवन की आपाधापी में ये सब चलता है
पर अपनों का बेगानापन ज्यादा खलता है
कब तक यादे रखे दबा कर, बंद लिफाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                      ५
मोह माया में अब भी ये मन उलझा रहता है
कहता है मष्तिष्क औरये दिल कुछ कहता है
haatho में जब लिए सुमरनी प्रभु को जपते है
भटके मन में जाने क्या क्या ख्याल उभरते है
नाती,पोते,पोती,बच्चे,याद सताती है
किसको क्या दे, करे वसीयत चिंता खाती है
कितनी देर लगा करती मृत्यु को आते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                               ६
कभी रात को सोते में जब नीद उचटती है
डनलप की गद्दी भी हमको चुभने लगती है
करवट बदल बदल मुश्किल से ही सो पाते है
जाने कैसे गंदे गंदे सपने आते है
अपने जन की यादे  आकर जब तड फाती  है
 मन की पीड़ा आंसू बन कर बह बह जाती है
कितना वक्त लगेगा इस दिल को समझाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                            ७
अच्छे बुरे सभी कर्मो कियादे आती है
सच्चा झूठा,भला बुरा, सब बाते आती है
किसने धोका दिया और किसने अपनाया है
कौन पराया अपना, अपना कौन पराया है
लेखे जोखे का हिसाब जब जाता आँका है
जीवन की बलेंस शीट का बनता  खाका है
क्या खोया क्या पाया, कितने रहे मुनाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

अपने ही दूरस्थ हो गए

    अपने ही दूरस्थ हो गए
     उम्र बड़ी हम पस्त हो गए
    थे हम प्रखर सूर्य चमकीले
    लगता है अब अस्त हो गए
देखे थे जो हमने मिल कर
     वो सब सपने ध्वस्त हो गए
    हमको छोड़ किसी कोने में
     सब अपने में मस्त हो गए
रोटी, कपडा, खर्चा, पानी
      दे कर के आश्वस्त हो गए
अपनों के बेगानेपन की
    बीमारी से ग्रस्त हो गए
   अब तो जल्दी राम उथले
  हम तो इतने त्रस्त हो गए

संत

संत
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा, इच्छाओ का बस अंत हो गया
जब से मेरी प्राण प्रिया ने करी ठिठोली
राम करू क्या बूढ़ा मेरा कंत हो गया

purane chawal

पुराने चावल
पकेगा तो महकेगा खिल खिल के दाना
क्योकि ये चावल पुराना बहुत है
नहीं प्यार करने की हिम्मत बची है
कैसे भी नजरे चुराना बहुत है
कभी पेट में दर्द,खांसी कभी है
सरदर्द का फिर बहाना बहुत है
भले ही हमारी,है ये जेब खली
तजुरबो का लेकिन खजाना बहुत है