Wednesday, March 4, 2020

बढ़ती उम्र की पीड़ा

उम्र ज्यों ज्यों हो रही है तीव्रगामी
हो रहा मन ,कुटिल,लोभी और कामी
घट रहा है ओज तन का ,दिन ब दिन है  
क्षरित तन, मन की न कर पाता  गुलामी

भले मन में हौंसला  ,तन खोखला है  
बड़ी  तड़फन ,अब न आता जलजला है
हो रहा अवरुद्ध खुद पर  क्रुद्ध है मन
 लालसा तज ,बन न पाया, बुद्ध ये मन
 
चाहता है उडूं ,पर ये उड़ न पाता
फड़फड़ाता पंख ,लेकिन छटपटाता
याद करता  दिन सुहाने वो उड़न के ,
विचरता  था  गगन में ,गोते लगाता
 
याद कर बीते हुए वो मदभरे  दिन ,
शेष स्मृतियों  में रहे वो सुनहरे  दिन
लाख पुनःरावर्ती करना चाहते हम   ,
आ नही  पाते मगर वो  रसभरे  दिन

मौन हम चुपचाप रहते ,मन मसोसे
भाग्य को या उमर को ,हम किसे कोसें
भूख  है पर ना चबा ,ना पचा पाते ,
सामने थाली  भरे, व्यंजन परोसे

बड़ा ही मन को कचोटे  ,ये विवशता
जिंदगी में आ गयी है एकरसता
क्या पता था ,देखने ये दिन पड़ेगे ,
भाग्य पर मन कभी रोता कभी हँसता

दुखी हो मन ,बाल सर के नोचता है
राम में मन रमाने की सोचता है
जाय मिट उद्विंगता और मिले शांति ,
रास्ता वह उस जगह का खोजता है

ह्रदय की अठखेलियां है रामनामी
लालसाये हुई अब  पूरणविरामी
पीत पड़ती जारही सारी चमक है ,
हो रहा है अब प्रभाकर क्षितिजगामी

मदनमोहन बहती 'घोटू '
माँ की याद में

रह गयी माँ,तुम सुहानी याद बन
एक ममता भरा आशीर्वाद  बन

वो तुम्हारे नयन अनुभव से भरे
वो तुम्हारे बोल सच्चे और खरे
वो तुम्हारा स्वाभिमानी फलसफा
समय के संग संग बदलना हर दफा
रहती थी खुश ,हृदय में संतोष था
कुछ न कहती ,पर तुम्हारा रौब था
सब में खुशियां बांटती आल्हाद बन
रह गयी माँ तुम सुहानी याद बन

वो तुम्हारी नसीहतें और ज्ञान वो
रिश्ते नाते ,रिवाजों का मान  वो
भले तन कमजोर ,मन मजबूत था
हौंसला ,जज्बा सदा मौजूद था
प्यार सब में थी बराबर बांटती
बुरा लगता ,साफ़ कहती,डाटती
हम है गर्वान्वित तेरी औलाद बन
रह गयी माँ ,तुम सुहानी याद बन

वो तुम्हारी ,धर्म प्रभु में आस्था
परेशानी में, दिखाना  रास्ता
नहीं विचलित हुई हरदम दॄढ़ रही
दान सेवा में सदा बढ़ चढ़ रही
वो तुम्हारा आत्मबल , स्वाधीनता
वो तुम्हारी पाक में  परवीनता
अब भी मुंह में डोलती है स्वाद बन
रह गयी माँ तुम सुहानी याद बन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

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अबकी होली
कई रंग से खेली  होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
सुबह उठा बीबीजी बोली,सुनो दर्द है मेरे सर में
वैसे आज तुम्हे छुट्टी है,दिन भर रहना ही है घर में
देखो मुझको नींद आ रही,सुबह हो गयी तो होने दो
प्लीज बुरा तुम नहीं मानना,थोड़ी देर और सोने दो
सच डीयर कितने प्यारे हो,अच्छा सोने दो ना जाओ
सच्चा प्यार तभी जानू जब ब्रेकफास्ट तुम बना खिलाओ
कह उनने तो करवट बदली,नींद हमारी टूट चुकी थी
काफी दिन भी चढ़ आया था,बड़ी जोर की भूख लगी थी
फिर उनकी प्यारी बातों ने,जोश दिया था कुछ एसा भर
हम भी कुछ कर दिखला ही दें,सोच घुसे चौके के अन्दर
कौन जगह क्या चीज रखी है,इसकी हम को खबर नहीं थी
उचका पैर ढूंढते चीनी,आसपास कुछ नज़र नहीं थी
रखा एक डिब्बा गलती से,गिरी मसालेदानी हम पर
पहली होली उसने खेली,कई रंगों से दिया हमें भर
लाल रंग की पीसी मिर्च थी,और हरे रंग का था धनिया
पीला  रंग डाला हल्दी ने, बना अजीब हमारा हुलिया
काला काला गरम मसाला,राई,जीरा अजब रंग थे
हर रंग की अपनी खुशबू थी,मगर मिर्च से हुए तंग थे
छींक छींक हालत खराब थी ,आँखों में थी मिर्च घुल गयी
दुःख तो ये है,छींके सुन कर ,बीबीजी की नींद खुल गयी
उठ आई तो देखा हमको,शक्लो सूरत रंग भरी थी
मै गुस्से में था लेकिन  वो मारे हंसी हुई दोहरी  थी
देख हमारी हालत उनको,प्यार या दया ऐसी आयी
हमें दूसरी होली उनने,अपने रंगों से  खिलवायी
काली काली सी जुल्फें थी,रंग गुलाबी सा चेहरा था
हरा भरा था उनका आँचल ,लाल होंठ का रंग गहरा था
पहली होली भूल गए हम,रंग दूसरी का जब आया
लेकिन इसी समय दरवाजा,आकर यारों ने खटकाया
और तीसरी होली हमने खेली मित्रों की टोली से
बड़ी देर तक धूम मचाई,रंग गुलाल भरी झोली से
पहली थी कुछ तीखी होली
दूजी प्यारी पिय  की होली
और तीसरी  नीकी होली
सच अबके ही सीखी होली
तीन ढंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली  होली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'