Friday, April 30, 2021

Re:

वाह वाह


On Fri, Apr 30, 2021, 7:06 PM madan mohan Baheti <baheti.mm@gmail.com> wrote:
बिटिया से

कल का सूरज ,अच्छी सेहत ,खबर ख़ुशी की लाएगा
मत घबरा बिटिया रानी सब ठीक ठाक हो जाएगा

परेशानियां तो जीवन के साथ लगी ही रहती है
कभी गर्म तो सर्द हवायें ,बासंती भी बहती  है
तिमिर हटेगा ,फिर प्राची से ,उजियारा मुस्काएगा
मत घबरा ,बिटिया रानी सब ठीकठाक हो जाएगा

ज्यादा दिन तक,कभी नहीं टिकते, ये दिन दुखयारे है
धीरज धर ,बैचैन न हो तू ,हम सब साथ तुम्हारे है
कठिन समय बीतेगा ,ईश्वर ,खुशियां भी बरसायेगा
मत घबरा ,बिटिया रानी ,सब ठीक ठाक हो जाएगा

पापा 
बिटिया से

कल का सूरज ,अच्छी सेहत ,खबर ख़ुशी की लाएगा
मत घबरा बिटिया रानी सब ठीक ठाक हो जाएगा

परेशानियां तो जीवन के साथ लगी ही रहती है
कभी गर्म तो सर्द हवायें ,बासंती भी बहती  है
तिमिर हटेगा ,फिर प्राची से ,उजियारा मुस्काएगा
मत घबरा ,बिटिया रानी सब ठीकठाक हो जाएगा

ज्यादा दिन तक,कभी नहीं टिकते, ये दिन दुखयारे है
धीरज धर ,बैचैन न हो तू ,हम सब साथ तुम्हारे है
कठिन समय बीतेगा ,ईश्वर ,खुशियां भी बरसायेगा
मत घबरा ,बिटिया रानी ,सब ठीक ठाक हो जाएगा

पापा 
वो दिन कहाँ गये

जब रोज गाँव के कूवे से ,आया करता ताज़ा पानी
मिटटी के मटके में भर कर ,रखती जिसको दादी,नानी
घर में एक जगह ,जहां रखते ,मटका, ताम्बे का हंडा थे
रहता पानी पीने का था ,हम कहते उसे परिंडा थे
धो हाथ इसे छुवा  करते ,यह जगह बहुत ही थी पावन
घर में जब दुल्हन आती थी ,तो करती थी इसका पूजन
अब आया ऐसा परिवर्तन ,बिगड़ी है सभी व्यवस्थायें
प्लास्टिक की बोतल में  कर ,अब बिकने को पानी आये  
था नहीं प्रदूषण उस युग में ,जब हम निर्मल जल पीते थे
आंगन में नीम और पीपल की ,हम शुद्ध हवा में जीते थे
तुलसी ,अदरक कालीमिर्ची ,का काढ़ा होता एक दवा
जिसको दो दिन पी लेने से ,हो जाता था बुखार  हवा
ना एक्सरे ,ना ही खून टेस्ट ,ना इंजेक्शन का कोई ज्ञान
कर नाड़ी परीक्षण वैद्यराज ,करते थे रोगों  का निदान
पर जैसे जैसे प्रगति पर हम हुए अग्रसर ,पिछड़ गये
करते इलाज सब मर्जों का ,वो देशी नुस्खे बिछड़ गये
आती है जब जब याद मुझे ,अपने गाँव की ,बचपन की
मुझको झिंझोड़ती चुभती है, जगती अंतरपीड़ा मन की
शंशोपज में डूबा ये मन ,ये निर्णय ना ले पाया  है
ये कैसी प्रगति है जिसमे ,कितना ,कुछ हमने गमाया है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '


हर दिन को त्योंहार किया है पत्नी ने

होली रंग में रंगा ,दिवाली दीप जला ,
हर दिन को त्यौहार किया है पत्नी ने
जीवन बगिया को महका ,मुस्कानो से ,
सपनो को साकार किया है पत्नी  ने

वादा हर सुखदुख में साथ निभाने का  ,
सिर्फ किया ही नहीं ,निभाया है उसने ,
प्रेम नीर से ,भरी हुई सी ,बदली बन ,
सदा प्रेम रस सब पर बरसाया उसने
मैं एकाकी था ,मुझको जीवन पथ पर ,
साथ दिया ,उपकार किया है पत्नी ने
होली रंग में रंगा, दिवाली दीप जला ,
हर दिन को त्यौहार किया है पत्नी ने

शिक्षक कभी सहायक ,परामर्शदात्री ,
बन कर मुझको सदा रखा अनुशासन में
कभी अन्नपूर्णा बन किया भरण पोषण ,
बनी सहचरी ,सुख सरसाये जीवन में
कभी हारने लगा ,मुझे ढाढ़स बाँधा ,
ममता दे ,उपचार किया है पत्नी ने
होली रंग में रंगा ,दिवाली दीप जला ,
हर दिन को त्योंहार किया है पत्नी ने

अब तो यही प्रार्थना मेरी ईश्वर से
ऐसा सब पर प्यार लुटाती रहे सदा
जैसा अब तक साथ निभाती आई है ,
अंतिम क्षण तक साथ निभाती रहे सदा
जैसी मुझको मिली ,मिले सबको वैसी ,
प्यार भरा संसार दिया है पत्नी ने
होली रंग में रंगा ,दिवाली दीप जला
हर दिन को त्यों हर किया है पत्नी ने

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 दिन न रहे

मदमाती मनमोहक ,चंचल ,चितवन वाले दिन न रहे
इठलाते और इतराते वो ,यौवन वाले दिन न रहे
अब तो एक दूजे को सहला अपना मन बहला लेते ,
मस्ती और गर्मजोशी के चुंबन वाले दिन न  रहे
संस्कारों के बंधन में बंध ,दो तन एक जान है हम ,
बाहुपाश में बंधने वाले ,वो बंधन के दिन न रहे
नजदीकी का सबसे ज्यादा ,वक़्त बुढ़ापे में मिलता ,
इधर उधर की ताकझाँक और विचरण वाले दिन न रहे
सूर्य जा रहा अस्ताचल को ,आई सांझ की बेला है ,
प्रखर किरण की तपन जलाती तनमन वाले दिन न रहे
मैं अपना 'मैं 'भूल गया और तू अपना 'मैं 'भूल गयी ,
अब समझौता समाधान है ,अनबन वाले दिन न रहे
यह तो है त्योंहार उमर का ,जिसे बुढ़ापा कहते है ,
संग जीने मरने के वादे और प्रण वाले दिन न रहे
जैसा होगा, जो भी होगा ,लिखा भाग्य  का भोगेंगे ,
मौज मस्तियाँ ,अठखेली के जीवन वाले दिन न रहे

 मदन मोहन  बाहेती 'घोटू '