Thursday, June 25, 2015

      विवाह की वर्षग्रन्थि पर-जीवनसंगिनी से

उमर बढ़ रही ,पलपल,झटझट
 मैं हूँ छांछट ,तुम हो पेंसठ
 इकतालीस वर्षों से संग है,
हम इक सिक्के के दोनो पट
      सीधे सादे ,मन के सच्चे   
      पर दुनियादारी में कच्चे
     बंधे भावना के बंधन में,
    पर दुनिया कहती हमको षठ
कोई मिलता ,पुलकित होते
याद कोई आ जाता ,रोते
तुम भी पागल,हम भी पागल,
 नहीं किसी से है कोई घट
       पलपल जीवन ,घटता जाता
      भावी कल ,गत कल बन जाता
       कभी चांदनी है पूनम की,
      कभी  अमावस का श्यामल पट
इस जीवन के  महासमर में
हरदम हार जीत के डर  में
हमने हंस हंस कर झेले है,
पग पग पर कितने ही संकट
      मन में क्रन्दन ,पीड़ा  ,चिंतन
      क्षरण हो रहा,तन का हर क्षण
      अब तो ऐसे लगता जैसे ,
      देने लगा  बुढ़ापा   आहट

आदित्य साबू

बदरंगी भाईजान

                बदरंगी भाईजान

इतने बरसों थे सत्ता में ,तब नहीं किसी का रखा ख्याल
बस लिप्त रहे घोटालों में, और रहे कमाते  खूब माल
अब उतर गए जब कुर्सी से ,तो बदल गयी है चाल ढाल
कोई की फसल खराब हुई,पूछा करते हो ,दौड़, हाल
इस हालचाल के तामझाम में जितने पैसे लूटा रहे
पेपर और टी वी वालों की,तुम भीड़ ढेर सी जुटा रहे
यदि उसका पांच प्रतिशत भी,तुम उस गरीब के घर देते
उसकी सब चिंता हर लेते,उसको निहाल  तुंम कर देते
उस त्रसित दुखी के बच्चों को ,मिलती दो रोटी खाने को
तुम बहा रहे हो घड़ियाली ,ये आंसू सिर्फ दिखाने को
हर जगह दौड़ कर जाते हो तुम सहानुभूति दिखलाने को
ये सारा नाटक करते हो तुम अपनी छवि  चमकाने   को
सात आठ साथ में चमचे है ,दो चार रट  लिए है जुमले
जनता का हिती बता खुद को ,सत्तादल पर करते हमले
ये फल है सभी कुकर्मों का ,जनता ने मारी तुम्हे लात
नाकारा समझ नकार दिया ,हर जगह करारी मिली मात
जब हार गए तो भाग गए ,कितने दिन तक लापता रहे
खुद को मुश्किल के मारों का ,तुम आज मसीहा बता रहे
जनता ने काफी झेल लिया ,अब और झेल ना पाएगी
 झूंठे वादों ,आश्वासन के ,बहकावे में ना  आएगी
अब है  तूणीर में तीर नहीं ,और पड़ी हुई ढीली कमान
कल थे बजरंगी भाईजान,अब  हो बदरंगी  भाईजान

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बरसात-तेरे साथ

         बरसात-तेरे साथ
                     १
जब भी   बारिश की  बूँदें छूती  मेरा तन
मुझको आता याद तुम्हारा पहला चुम्बन
ऐसे भिगो दियां करती है ये मेरा तन
जैसे मन को भिगो रहा तेरा अपनापन
                         २
जब जब भी ये मौसम होता है बरसाती
साथ  हवा के होती ,  हल्की  बूंदा बांदी
हाथ पकड़ कर ,तेरे साथ भीगता हूँ जब ,
तब रह रह कर ,ये मन होता है उन्मादी
                           ३
भीगी अलकों से बूँदें ,टपके ,बन मोती 
मधुर कपोलों  पर आभा है दूनी होती
आँचल भी चिपका चिपका जाता है तन से ,
जब ये बूँदें बारिश की  है तुम्हे  भिगोती
                             ४
मौसम ,भीगा भीगा ,आग लगाता तन में
कितने ही अरमान ,भड़क जाते है मन में
मदिरा से ज्यादा मादक ,बारिश की बूँदें ,
रिमझिम रिमझिम जब बरसा करती सावन में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अच्छे दिन

             अच्छे दिन
                     १
प्रगति का पैमाना है जो अगर ऊंचाई
तो फिर हमने बहुत प्रगति कर ली है भाई
सब चीजों के दाम छू  रहे आसमान को ,
दिन  दिन दूनी बढ़ती जाती है  मंहगाई 
                         २
ग्राफ कीमतों का निश दिन है ऊपर चढ़ता
पानी भी अब तो ख़रीद कर  पीना पड़ता 
परिवार का पेट पालना अब मुश्किल है,
क्या ऐसे ही देश प्रगति के पथ पर बढ़ता
                            ३
दालें मंहगी ,अब सूखे पड़  गए निवाले
जीना हुआ  मुहाल ,पड़े  खाने के लाले
फिर भी हम है मन में बैठे आस लगाए ,
आज नहीं कल, अच्छे दिन है आने वाले

घोटू